दो साल में ही 80 प्रतिशत स्टार्टअप दम तोड़ देते हैं : प्रशांत सिंह

स्टार्टअप एक कौशल नहीं, जीने का तरीका है… स्टार्टअप्स के इस दौर में रोज कोई न कोई स्टार्टअप इस देश में मूर्त रुप ले रहा है लेकिन कितने स्टार्ट अप अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहें हैं और कितने बीच रास्ते में ही हांफने लग रहें हैं कोई नहीं जानता. नया स्टार्ट अप शुरु करते समय आंत्रप्रेन्योर के दिमाग में फ्लिपकार्ट जैसे स्टार्ट अप चलते रहते हैं लेकिन वास्तविक दुनिया में बहुत से स्टार्टअप छोटी-छोटी कमियों के चलते बंद होते जा रहें हैं. सरकार अपनी नीतियों के माध्यम से स्टार्टअप को बढ़ावा देने के सभी उपाय कर रही है. सरकार ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘स्टैंडअप इंडिया’ और‘मुद्रा योजना’ जैसी नीतियों के जरिये उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए हरसंभव उपाय कर रही है. करीब साढ़े सात करोड़ लोगों को कारोबार शुरू करने के लिए सरकार की विभिन्न योजनाओं के द्वारा अब तक ऋण दिया जा चुका है. किसी भी स्टार्टअप की शुरुआत करने में एक तरफ भरपूर लाभ कमाने की सम्भावना होती है तो दूसरी तरफ अनिश्चितता अन्य खतरे की भी प्रबल संभावना होती है. आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि 80 प्रतिशत स्टार्टअप दो साल के भीतर ही बंद हो जाते हैं.

दिल्ली के लोधी रोड स्थित इस्लामिक सेंटर में आंत्रप्रेन्योर के लिए आयोजित एक वर्कशाप में इंटरनेशनल आंत्रप्रेन्योर मेंटर प्रशांत सिंह ने बताया कि बहुतेरे स्टार्ट-अप अपने खुलने के पहले या दूसरे साल में ही बंद हो जाते है. इनके बंद होने के तमाम कारण हो सकतें हैं जिनके बारे में मुख्य वक्ता प्रशांत सिंह ने विस्तार से बताया. मेंटर प्रशांत के अनुसार किसी आंत्रप्रेन्योर की सफलता में 75 प्रतिशत उसका अपनी मनोवैज्ञानिक स्किल्स और बाकी के 25 प्रतिशत बिजनेस के वही टूल्स होते हैं जिन्हें सभी लोग इस्तेमाल करते हैं. लेकिन उद्यमी के दिमाग में चलता इसका उल्टा है. दरअसल ज्यादातर लोग अपने आईडिया को लेकर बहुत पजेसिव रहते हैं. उन्हें लगता है कि मेरा अईडिया इन्नोवेटिव और यूनीक है और ये जब मार्केट में आयेगा तो धमाका करेगा लेकिन अधिकतर मामलों में ऐसा होता नहीं है. ऐसे में उद्य़मी को अपनी स्किल्स का उपयोग करते हुए अपने आईडिया को दूसरे का आईडिया मानते हुए कमियां निकालने की कोशिश करनी चाहिए.

जो स्टार्टअप जो बंद हो रहें हैं, ऐसा नहीं कि उनका आईडिया खराब था या फिर वो डेडिकेटेड नहीं थे. दरअसल उन्होंने अपने स्टार्टअप के उस मनोवैज्ञानिक पक्ष पर कम काम किया होता है. मेंटर प्रशांत के अनुसार आप को अपने आईडिया के मार्केट में टेस्ट करना चाहिए और कस्टमर्स के फीडबैक के अनुसार उसमें परिवर्तन करते रहना चाहिए. पिछले दिनों आयोजित इस सेमिनार में उपस्थित 300 से ज्यादा उद्यमियों में से ज्यादातर इन्वेस्टमेंट की समस्या से जूझ रहे थे. इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय उद्यमिता सलाहाकार और बिजनेश परिवर्तन में उत्प्रेरक की भूमिका में ख्याति हासिल कर चुके प्रशांत सिंह ने कहा कि आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि इन्वेस्टर के लिए आपके आईडिया का रोल मात्र 7-10प्रतिशत ही होता है. इन्वेस्टर का मेन फोकस आपके डेडिकेशन और टीम की मजबूती पर होता है. सेमिनार के दौरान “सेवेन स्टेप सक्सेस सिस्टम फॉर स्टार्ट अप” पर चर्चा करते हुए प्रशांत ने बताया कि  स्टार्टअप एक कौशल नहीं है बल्कि जीने का तरीका है.

पत्रकार राहुल सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : mail2rahul30@gmail.com

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