एक न्यूज़ चैनल का स्ट्रिंगर… जो दिन-रात अपने जिले की गलियों, सड़कों और घटनास्थलों पर घूमता है। खबर छोटी हो या बड़ी, वह हर सूचना को जुटाने में अपनी पूरी मेहनत लगा देता है। कई बार अपना समय, अपना पैसा और अपनी निजी जिंदगी तक दांव पर लगा देता है—सिर्फ इसलिए कि उसके चैनल तक सबसे पहले और सही खबर पहुंच सके।
लेकिन स्ट्रिंगर का दर्द तब शुरू होता है, जब उसके जिले में कोई बड़ी खबर नहीं होती।
उस वक्त चैनल को उसकी खबरों की जरूरत महसूस नहीं होती। उसकी भेजी हुई कई खबरें चलती तक नहीं हैं। लेकिन जैसे ही जिले में कोई बड़ी या प्रमुख खबर सामने आती है, अचानक उसी स्ट्रिंगर से उम्मीद की जाती है कि वह अपना घर-परिवार छोड़कर रात-दिन घटनास्थल पर डटा रहे।
“वहां पहुंचो… लाइव दो… वॉकथ्रू चाहिए… अपडेट भेजो… वीडियो चाहिए…”
डेस्क से लगातार निर्देश आते हैं।
स्ट्रिंगर भी पीछे नहीं हटता। वह रात के अंधेरे में निकलता है, कई किलोमीटर का सफर करता है, घंटों घटनास्थल पर खड़ा रहता है और हर अपडेट चैनल तक पहुंचाता है।
लेकिन सवाल यह है कि उसके इस समय और मेहनत की कीमत कौन देगा?
जब स्ट्रिंगर किसी जरूरी मदद के लिए असाइनमेंट डेस्क से बात करता है, तो अक्सर जवाब मिलता है— “उच्च अधिकारियों से बात करके बताते हैं।”
और जब वही स्ट्रिंगर अपनी मेहनत की कमाई या किसी खर्च के भुगतान की बात करता है, तो मामला फिर टल जाता है।
विडंबना देखिए—जब स्ट्रिंगर को चैनल की जरूरत होती है तो उसे इंतजार करने के लिए कहा जाता है, लेकिन जब चैनल को स्ट्रिंगर की जरूरत होती है तो उससे तत्काल हर सुविधा और हर कवरेज की उम्मीद की जाती है।
मैं यह नहीं कहता कि हर न्यूज़ चैनल ऐसा करता है। लेकिन कुछ प्रमुख चैनलों के साथ काम करने के अपने अनुभव के आधार पर मैं यह सवाल जरूर उठाना चाहता हूं।
बड़ी खबर आने पर चैनल को शानदार लाइव, वॉकथ्रू, एक्सक्लूसिव वीडियो और लगातार अपडेट चाहिए होते हैं। इसके लिए स्ट्रिंगर से उम्मीद की जाती है कि वह अपना सब कुछ छोड़कर मौके पर मौजूद रहे।
लेकिन उस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।
- कैमरा उठाकर घंटों खड़ा रहने वाला कैमरामैन भी एक इंसान है।
- उसके भी घर का खर्च है।
- उसके कैमरे का भी खर्च है।
- उसकी मेहनत की भी एक कीमत है।
एक स्ट्रिंगर सिर्फ फोन उठाकर खबर भेजने वाला व्यक्ति नहीं है। वह चैनल का स्थानीय चेहरा और आंख-कान होता है। वह सबसे पहले घटनास्थल तक पहुंचता है, स्थानीय लोगों से बात करता है, जानकारी जुटाता है और कई बार ऐसी परिस्थितियों में काम करता है जहां सामान्य व्यक्ति जाने से भी बचता है।
इसलिए जरूरत सिर्फ यह सोचने की नहीं है कि “हमारे चैनल को इस खबर के लिए क्या चाहिए?”
जरूरत इस बात को समझने की भी है कि— “जो व्यक्ति हमारे लिए यह खबर ला रहा है, उसे अपना काम करने के लिए क्या चाहिए?”
- स्ट्रिंगर भी सम्मान चाहता है।
- वह भी समय पर जवाब चाहता है।
- वह भी अपनी मेहनत का उचित भुगतान चाहता है।
क्योंकि खबर की कीमत सिर्फ स्क्रीन पर चलने वाले कुछ मिनट नहीं होते।
उस खबर के पीछे किसी स्ट्रिंगर की कई घंटे की मेहनत, उसका पेट्रोल, उसका कैमरा, उसका समय और कई बार उसके परिवार से दूर बिताई गई रात भी होती है। और शायद न्यूज़ इंडस्ट्री को इस दर्द को थोड़ा और समझने की जरूरत है।
क्योंकि स्ट्रिंगर खबर का सबसे कमजोर हिस्सा नहीं, बल्कि उस खबर तक पहुंचने वाली सबसे पहली कड़ी है।


