नई दिल्ली। भारत में स्ट्रोक अब केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गया है। नेशनल स्ट्रोक रजिस्ट्री के ताजा विश्लेषण के अनुसार देश में हर सात में से एक स्ट्रोक मरीज की उम्र 45 वर्ष से कम है। अध्ययन में यह भी सामने आया है कि लक्षण शुरू होने के तीन महीने के भीतर आधे से अधिक मरीज या तो जान गंवा देते हैं या गंभीर दिव्यांगता का शिकार हो जाते हैं।
यह निष्कर्ष 2020 से 2022 के बीच देश के 30 अस्पतालों में दर्ज 34,792 स्ट्रोक मामलों के विश्लेषण पर आधारित है। यह अध्ययन भारत के सबसे बड़े अस्पताल-आधारित स्ट्रोक रजिस्ट्री डाटा पर आधारित बताया गया है, जिसमें स्ट्रोक के पैटर्न, उपचार में देरी और परिणामों का विस्तृत आकलन किया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक 13.8 प्रतिशत मरीजों की उम्र 45 वर्ष से कम थी, जो युवाओं में बढ़ते स्ट्रोक के खतरे की ओर संकेत करता है। औसत आयु 59.4 वर्ष दर्ज की गई, जबकि करीब 63.4 प्रतिशत मरीज पुरुष थे और 72.1 प्रतिशत मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से आए थे। यह आंकड़े जागरूकता, रोकथाम और समय पर इलाज की पहुंच में असमानता को भी उजागर करते हैं।
इलाज में देरी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है। करीब 37.8 प्रतिशत मरीज लक्षण शुरू होने के 24 घंटे बाद अस्पताल पहुंचे, जबकि केवल 20.1 प्रतिशत मरीज ही 4.5 घंटे की महत्वपूर्ण समय-सीमा के भीतर अस्पताल पहुंच सके। विशेषज्ञों के अनुसार स्ट्रोक में शुरुआती 4.5 घंटे को ‘गोल्डन पीरियड’ माना जाता है, जिसमें उपचार से जान बचने और दिव्यांगता कम होने की संभावना अधिक रहती है।
जोखिम कारकों में हाई ब्लड प्रेशर सबसे प्रमुख कारण पाया गया, जो 74.5 प्रतिशत मरीजों में मौजूद था। इसके अलावा 27.3 प्रतिशत मरीजों में डायबिटीज और 28.5 प्रतिशत में बिना धुएं वाले तंबाकू का सेवन दर्ज किया गया। तंबाकू सेवन और शराब का उपयोग भी महत्वपूर्ण जोखिम कारकों के रूप में सामने आए।
तीन महीने के परिणामों में 27.8 प्रतिशत मरीजों की मौत हो गई, जबकि 29.7 प्रतिशत मरीज गंभीर दिव्यांगता के साथ जीवित रहे। इस तरह कुल मिलाकर आधे से अधिक मरीजों को गंभीर परिणाम झेलने पड़े।
विशेषज्ञों का कहना है कि युवाओं में बढ़ते स्ट्रोक मामलों को देखते हुए हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की नियमित जांच, तंबाकू से परहेज और स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों की पहचान के बारे में व्यापक जनजागरूकता अभियान की आवश्यकता है, ताकि मरीज समय पर अस्पताल पहुंच सकें और मौत व दिव्यांगता के खतरे को कम किया जा सके।
इसका सबसे बड़ा कारण भारी जनसंख्या का शाकाहारी होना होगा। प्रोटीन की कमी से डायबिटीज़ हो रहा है। दिल-दिमाग़ को पोषक खुराक नहीं मिल पाता। और टहलना, व्यायाम फालतू का काम माना जाता है। जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ अकेले मैं टहलने निकलता हूँ।
-विभाष कुमार श्रीवास्तव


