एक गोल्डमेडलिस्ट का बेरोजगारी में सुशील सिद्धार्थ बन जाना

-दयानंद पांडेय-

ज़माने ने मारे जवां कैसे कैसे , ज़मीं खा गई आसमां कैसे कैसे । सुशील सिद्धार्थ को मैं जब भी देखता मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा यह गीत याद आ जाता। लेकिन उन की फक्क्ड़ई , उन की फकीरी उन के गम के निशान धो डालती थी। लेकिन बेरोजगारी का दंश उन्हें जीवन भर सताता रहा था। इस की कुंठा और हताशा में वह आकंठ डूबे रहे। एक गोल्ड मेडलिस्ट नौकरी के लिए दर -दर ठोकर खाता फिरे यह हिंदी जगत में ही मुमकिन है। हिंदी को जितना सुशील सिद्धार्थ ने दिया उस का शतांश भी हिंदी जगत ने उन्हें नहीं दिया। अब क्या देगा भला। जो भी कोई उन का शरणदाता बना , अंतत: उन का शोषक बना। वह चाहे लखनऊ के लोग हों , मुंबई के लोग हों या अब दिल्ली के लोग। किन-किन का नाम लूं , किन-किन का छोड़ दूं ?

हिंदी जगत के जाने कितनों का चेहरा सुशील सिद्धार्थ ने साफ़ किया , संवारा-सजाया , बच्चों की तरह उन के पोतड़े धोए , उन्हें स्थापित करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया लेकिन वही लोग उन के मुंह पर थूकते हुए निकल गए। नतीज़तन सुशील के जीवन में इतनी तल्खी आ गई , इतना तनाव आ गया कि वह निरंतर बिखरते गए। बिखरते गए और समझौतों की नदी में गहरे और गहरे उतरते गए। छोटी-छोटी नौकरियां , छोटे-छोटे दैनंदिन समझौते। वह टूट कर रह गए थे।बेरोजगारी के दंश ने उन्हें क्या से क्या बना दिया था , अब ज़रा ठहर कर सोचता हूं तो दहल जाता हूं। सोचता हूं कि अगर मैं सुशील सिद्धार्थ की जगह होता तो क्या इतना जी पाता ? इतना सक्रिय रह पाता , इतना कुछ कर पाता भला ? शायद बिलकुल नहीं। यहां तो ज़रा-ज़रा सी ठेस पर भी ठहर जाता हूं और फिर उस राह पर नहीं जाता हूं। हालां कि कभी सिर उठा कर , सीना तान कर जीने वाला मैं भी कुछ ठोकरों के बाद झुकने लगा। परिवार पालने की गरज से नौकरी के लिए बहुत से समझौते मैं ने भी बाद के दिनों में किए हैं , छल और कपट झेले हैं। लेकिन सुशील सिद्धार्थ तो जैसे समझौतों के सागर थे। उन के झुकने की कोई सीमा नहीं रह गई थी। अंततः संघर्ष का समुद्र ही असमय उन्हें बहा ले गया।

लेखक दयानंद पांडेय, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी और सुशील सिद्धार्थ. 

सुशील सिद्धार्थ अब के दिनों में कभी किसी को कुछ भी मना नहीं करते थे। आप कुछ भी काम उन्हें सौंपिए वह सहर्ष स्वीकार कर लेते थे। लेकिन कंप्यूटर भी एक सीमा के बाद हैंग कर जाता है , सुशील सिद्धार्थ तो फिर भी आदमी थे। स्वीकार कर लेना और काम कर देना , आसान नहीं होता। वह भी लिखना। कितनी किताबों पर कितना लिखते वह। अब उन की छवि बन गई गच्चा देने की। बल्कि बयाना लेना , गच्चा देना और फिर पंगा लेना सुशील सिद्धार्थ की जैसे नियति बनती गई। झूठ बोलना भी। संपादन और फुटकर लेखन ने उन के रचनाकार को जैसे खा लिया। यह ज़िंदगी में एक बार , एक नहीं कहने की क़ीमत थी। कह सकते हैं प्रेम में डूब कर नहीं कहने की क़ीमत थी। सुशील सिद्धार्थ ने इस एक नहीं कहने की क़ीमत ज़िंदगी भर चुकाई। ऐसे , जैसे कोई हिंदी फ़िल्म की कथा हो उन की ज़िंदगी। और वह उस के मुख्य किरदार। तब के दिनों वह सुशील अग्निहोत्री हुआ करते थे। उन के पिता डाक्टर चंद्रशेखर अग्निहोत्री प्रतिष्ठित डी ए वी डिग्री कालेज में हिंदी के प्राध्यापक थे और सुशील सिद्धार्थ लखनऊ यूनिवर्सिटी में विद्यार्थी। उन दिनों प्रोफेसर हरेकृष्ण अवस्थी हिंदी विभाग में आचार्य थे।


लोग बताते हैं कि सुशील अग्निहोत्री के पिता की कक्षा में छात्र खिड़कियों तक में बैठ जाते थे , उन से पढ़ने के लिए। बाद में सुशील अग्निहोत्री ने एम ए हिंदी में दाखिला लिया। और यह देखिए योग्य पिता के योग्य पुत्र ने यूनिवर्सिटी टॉप कर लिया। पी एच डी में रजिस्ट्रेशन करवा लिया। पी एच डी के आचार्य सुशील की मेधा पर मुग्ध थे। पी एच डी आनर होने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में उन की नियुक्ति की बात हो गई। ज्वाइनिंग का दिन आ गया। फूल माला , मिठाई आ गई। पर ऐन वक्त पर सुशील अग्निहोत्री की ज्वाइनिंग पर रोक लग गई। किसिम-किसिम की बातें। मुख्य बात सामने आई कि एक आचार्य ने अपनी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा था जिसे सुशील अग्निहोत्री ने विनय पूर्वक मना कर दिया। नहीं कह दिया। क्यों कि सुशील अग्निहोत्री आशा गुप्ता जी के साथ प्रेम में थे। इस प्रेम में ईमानदारी का तकाजा यही था। सुशील अग्निहोत्री इस नहीं की कीमत ज़िंदगी भर कई सारे मूर्खता भरे हां में गुज़ारने के लिए अभिशप्त रहे। अब यह यूनिवर्सिटी टॉपर छोटे-छोटे स्कूलों में पढ़ा रहा था। उस का गोल्ड मेडल उस पर हंस रहा था।

अब इस सुशील अग्निहोत्री को हिंदी जगत सुशील सिद्धार्थ नाम से जान रहा था। जिस डी ए वी डिग्री कालेज में पिता सम्मानित प्राध्यापक थे , पुत्र वहां संविदा पर पढ़ाने लगा। इस आस में कि कभी तो नियमित नियुक्ति भी मिल जाएगी , जो कभी नहीं मिली। लोक सेवा आयोग के मार्फत भी कुछ नहीं हो पाया। क्यों कि आचार्य के लोग हर जगह मुस्तैद थे। वर्धा में आचार्य के लोग नहीं थे पर वर्धा में भी कोशिश नाकाम रही। नतीज़तन वह इसप्वायल जीनियस बन कर रह गए। अब कोई भी छोटा-मोटा कार्य उन को मिल जाता , वह मना नहीं करते। उन का विशद अध्ययन सर्वदा उन के काम आता। बोलना हो , लिखना हो , पढ़ाना हो , प्रूफ पढ़ना हो , संपादन करना हो सुशील हर कार्य के लिए हाजिर। रात-बिरात हाजिर। काम देने , दिलाने की लालच दे कर कई लोग सुशील से बेगारी भी करवा लेते थे। पता चला सुशील छोटे-मोटे अख़बारों की नौकरी , अध्यापन , संपादन , लेखन सब कुछ एक साथ करने लगे। कविता , कहानी , व्यंग्य भी लिखने लगे। गोया वह आदमी नहीं मशीन हो गए हों। घर में भी वह प्रेम विवाह की परिणति भुगत रहे थे। माता-पिता उन की पत्नी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे। यह उन के ब्राह्मण होने की यातना थी। बाहर उन का गोल्ड मेडलिस्ट पिट रहा था , घर में उन का ब्राह्मण। अजीब यातना थी।

लेकिन यह सब वह किसी से कहते नहीं,थे , न ही किसी से सहानुभूति मांगते थे। अब तक वह सुशील अग्निहोत्री से सुशील सिद्धार्थ हो चले थे। पता चला वह मुंबई चले गए। कमलेश्वर के राइटर्स वर्कशाप में काम करने लगे। फ़िल्में , धारावाहिक लिखने लगे। कमलेश्वर के साथ। पर कमलेश्वर ने कभी सुशील सिद्धार्थ का नाम नहीं दिया कहीं। बस आश्वासन देते रहे कि समय आने पर दूंगा। सुशील एक समय अफना गए। कुछ जगह सीधे काम मांगने पहुंच गए। यह कहते हुए कि सब कुछ तो मैं ही लिखता हूं , सीधे मुझ से लिखवाइए। बात कमलेश्वर तक पहुंचनी ही थी। पहुंची भी। मुंबई से उन का दाना पानी उठ गया। सुशील सिद्धार्थ लखनऊ लौट आए। फिर वही फुटकर काम। वही अध्यापन , संपादन ,लेखन , प्रूफ रीडिंग। सब कुछ एक साथ। तेली के बैल की तरह। वह कभी किसी पत्रिका से जुड़े , किसी अख़बार से जुड़े , किसी स्कूल , किसी कालेज से। कब कहां पकड़ लिया , कब कहां छोड़ दिया जानना कठिन होता गया। फुटकर और टेम्परेरी कामों की मियाद वैसे भी नहीं होती। इन्हीं दिनों वह क्रमश: कथाक्रम , तद्भव और लमही से भी जुड़े । बतौर सहायक संपादक, अतिथि संपादक । कथाक्रम परिवार का हिस्सा तो मरते दम तक वह रहे। कोई 23 साल तक।

खैर , संघर्ष और सुशील सिद्धार्थ का अब चोली दामन का साथ हो गया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि सुशील सिद्धार्थ ज्योतिष विद्या की भी अच्छी जानकारी रखते थे। सो अब तक वह शायद अपना भाग्य भी पढ़ चुके थे। सो अपनी मुश्किलों के बाबत अब वह किसी से खुल कर चर्चा नहीं करते थे। यह ज़रुर हो गया था कि अब वह किसी काम के लिए किसी को कभी मना नहीं करते थे। काम करने का बयाना वह सब से लेते थे। फिर काम पूरा न हो पाने पर गच्चा देना भी उन के स्वभाव में आने लगा। झूठ बोलना भी। और जो कोई उन्हें इस बाबत टोक दे तो वह अब पंगा लेने से भी गुरेज़ नहीं करते थे। बयाना , गच्चा और पंगा उन का स्थाई भाव बनता गया। उन की पहचान बनती गई। सूचना विभाग , हिंदी संस्थान जैसी जगहों के भी वह फुटकर काम करते रहे। कई अख़बारों के लिए नियमित लिखना भी जारी था। एक बार मुद्राराक्षस का एक इंटरव्यू उन का छपा।


मैंने पढ़ कर उन से खिन्न हो कर कहा कि, यह इंटरव्यू है कि डिक्टेशन? वह सकुचाए और बोले , अब ऐसा ही करने का आदेश था , क्या करें ? एक अख़बार में एक सज्जन ने उन से तय किया कि वह हर हफ्ते लिखें। अच्छा पैसा मिलेगा। लेकिन एक लेख अलग से उन के नाम से भी हर हफ्ते उन को लिखना होगा। इस अतिरिक्त लेख का पैसा वह अलग से दिया करेंगे। सुशील सहर्ष मान गए। बहुत दिनों तक यह सिलसिला चला। एक बार उन सहयोगी की शिकायत हो गई अख़बार में कि वह दूसरों से अपने लिए लेख लिखवाते हैं। लेकिन बात आई गई हो गई। एक बार शिकायत करने वाले ने सुशील की राइटिंग में वह लेख पकड़ लिया जो अख़बार के सहयोगी के नाम से छपा। हुआ यह था कि जिन के नाम से लेख छपना था , वह अपने गांव गए थे तो सुशील वह दोनों लेख उन के कनिष्ठ सहयोगी को दे गए। कनिष्ठ सहयोगी ने कंपोजिंग में दे दिया दोनों लेख। अब शिकायत करने वाले सहयोगी पहले से तड़े हुए थे। उन्हों ने सुशील की राइटिंग वाली कॉपी फोटोकापी कर संपादक को थमा दी। कंपोजिटर ने यह बात कनिष्ठ सहयोगी को बता दी। कनिष्ठ सहयोगी ने अपने वरिष्ठ को फोन पर यह सब बताया। फिर यह लेख फैक्स से उन के पास से भेजा। उन्हों ने फैक्स को फिर से लिख कर फैक्स किया। और जब जांच हुई तो कनिष्ठ ने बता दिया कि फैक्स पढ़ने में नहीं आ रहा था तो सुशील जी से उस को फिर से साफ-साफ लिखवा लिया।

जाहिर है यह सब सुशील जी की सहमति से हुआ। बाद के दिनों में उस अख़बार के संपादक ने सुशील जी पर बहुत दबाव बनाया कि वह किसी भी तरह स्वीकार कर लें कि वह उस सहयोगी के नाम से लिखते रहे हैं। इस के लिए सुशील जी को नौकरी का प्रस्ताव भी दिया गया। सुशील जी तब भी बेरोजगार थे। चाहते तो लपक कर नौकरी पा सकते थे। अच्छी खासी नौकरी। लेकिन वह दबाव में नहीं आए , तो नहीं आए। हां , यह ज़रूर हुआ कि अब वह उसी अख़बार में हफ्ते में तीन लेख लिखने लगे। यह तीसरा लेख , उस अख़बार के संपादक के नाम से छपने लगा। लेकिन सुशील सिद्धार्थ का संघर्ष थम नहीं रहा था। हिंदी में छिटपुट लेख लिख कर , संपादन करने और अस्थाई अध्यापन कार्य से घर की रसोई और बच्चों की पढ़ाई तथा ज़रूरत का खर्च कहां चल पाता है भला ? फिर सुशील ने जाने और कितने लोगों के लिए लेख , कविताएं , समीक्षाएं आदि लिखीं। इन का विवरण लिखने बैठूं तो पूरी एक पुस्तक लिख जाएगी । और कि जाने कितनों की पैंट और पेटीकोट उतर जाएगी।

यह देखिए समय जैसे सुशील सिद्धार्थ के लिए अच्छे समय ले कर आ गया । रवींद्र कालिया कोलकाता से वागर्थ छोड़ दिल्ली आ गए। ज्ञानोदय का संपादन करने। ज्ञानपीठ के निदेशक बन कर। लखनऊ से सुशील सिद्धार्थ को बुला लिया अपना सहयोगी बना कर। ज्ञानोदय पत्रिका अब सुशील सिद्धार्थ के खून पसीने से तरबतर थी। जल्दी ही ज्ञानपीठ की नई छपने वाली किताबें भी सुशील का स्पर्श पाने लगीं। रवींद्र कालिया ने सुशील सिद्धार्थ की प्रतिभा का सदुपयोग कर लिया था। एक रात फोन पर लंबी बातचीत में मैं ने सुशील सिद्धार्थ को समझाया कि पंडित जी अब जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर एक अच्छे और प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी मिली है , इसे किसी भी सूरत में पूरी निष्ठा से निभा लीजिए। अंतिम नौकरी मान कर। वह बिलकुल बड़े भाई , बिलकुल ! कह कर मुझे बारंबार आश्वस्त करते रहे। उन दिनों अपने विद्यार्थी जीवन के साथी भारतेन्दु मिश्र के साथ वह दिल्ली में रह रहे थे। भारतेंदु मिश्र पहले से भारत सरकार की नौकरी में दिल्ली में थे। उन दिनों भारतेंदु मिश्र , सुशील सिद्धार्थ की तारीफ़ करते थे , सुशील सिद्धार्थ भारतेंदु मिश्र की तारीफ़ करते। दोनों के बीच विद्यार्थी जीवन का संबंध तो था ही , अवधी भाषा का अनुराग भी था। दोनों ही अवधी के ज्ञाता और कवि। अवधी जैसे दोनों की जान थी , और दोनों एक दूसरे की जान। लेकिन अवधी का यह रस बहुत समय तक बना नहीं रह पाया। दुर्भाग्य से यह रस बहुत जल्दी ही सूखने लगा। मैं समझ गया कि सुशील सिद्धार्थ फिर गड़बड़ कर गए हैं। बहुत समझाया। वह हां-हां , हां बड़े भाई , हां कहते तो रहे पर मेरी बात उन्हों ने सुनी नहीं।

दिल्ली में सुशील सिद्धार्थ का यह पहला भटकाव था। और यह देखिए रवींद्र कालिया का सुशील सिद्धार्थ से , सुशील सिद्धार्थ का रवींद्र कालिया से मोहभंग की आहट मिलने लगी। मैं ने अपने तौर पर पता किया तो पता चला कुणाल जो रवींद्र कालिया के वागर्थ , कोलकाता के दिनों के सहयोगी रहे थे , दिल्ली एक फेलोशिप पा कर पहुंच चुके थे , दोनों के बीच गांठ बन कर उपस्थित हो चुके थे। बिना ज्ञानपीठ में नौकरी किए , वह पूरा दखल देने लगे थे और सुशील को पैदल करने की सारी कसरत करने लगे। सुशील ने बौखला कर फिर पंगा ले लिया। वह जगह-जगह कहने लग गए कि कालिया जी ठीक से चल तो पाते नहीं , काम क्या करेंगे ? सब कुछ तो मैं करता हूं। मैं ने उन्हें फिर फोन किया। समझाया कि कालिया जी सुलझे हुए आदमी हैं , संघर्ष जानते हैं। एक बार क्षमा मांग कर फिर से बात बना लीजिए। और कि यह डायलॉग बंद कीजिए कि सब कुछ मैं करता हूं। यह ठीक बात नहीं है। नौकरी करना , अब से सही सीखिए। अपमान पीना सीखिए। वह हां , ना में बात करते रहे। लेकिन झुकने को तैयार नहीं थे। असल में तब तक वह दिल्ली की साहित्यिक राजनीति में शामिल हो कर कुछ लोगों के टूल बन चुके थे। मैं ने उन्हें समझाया भी। लेकिन वह समझे तब जब ज्ञानपीठ से उन की बाकायदा छुट्टी हो गई। किसिम-किसिम के लांछन लगे सो अलग। ज्ञानोदय के छिनाल प्रकरण में भी वह इस्तेमाल हो चुके थे।


मैं ने फिर उन्हें समझाया कि अब जो हो गया सो हो गया। लौट आइए लखनऊ। वह कहने लगे अब लखनऊ ऐसे तो नहीं लौटूंगा। एक बार खुद को साबित तो करना ही है बड़े भाई। फिर समझाया। पर वह कहने लगे राजेंद्र यादव से बात हो गई है। आशीर्वाद दीजिए। कार्यकारी संपादक बनने की बात हो गई है। हम ने कहा , बधाई ! लेकिन ज्ञानपीठ की नौकरी के बाद हंस की नौकरी का कोई तुक नहीं है। और फिर हंस जैसी नौकरी में आप को सम्मानजनक पैसा भी नहीं मिलेगा , जीवनयापन खातिर। ज्ञानपीठ में भी कुछ बहुत सम्मानजनक पैसा नहीं मिलता था। लेकिन जीवनयापन भर का तो था। मैं ने उन से यह भी कहा कि ऐसी नौकरी तुरंत ज्वाइन करवा ली जाती है , इतना टाइम नहीं लिया जाता। लेकिन सुशील सिद्धार्थ की समझ में नहीं आया। लखनऊ में भी सुशील साहित्यिक राजनीति के टूल कई बार बन चुके थे , मैं ने उन्हें समझाया कि अब वह दिल्ली है। आप वहां लोगों की राजनीति के टूल बनने गए हैं कि नौकरी करने। आप समझ क्यों नहीं रहे कि कालिया कैंप का विरोधी कैंप आप का इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन सुशील सिद्धार्थ ने मेरी बात नहीं सुनी। अब वह हंस का कार्यकारी संपादक नहीं , राजकमल प्रकाशन में मामूली पैसों में संपादक हो गए थे। दिन भर राजकमल की नौकरी , शाम को सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज की बेगारी। मैं लगातार समझाता रहा , लखनऊ लौट आने की तजवीज देता रहा। यह भी बताया कि दिल्ली के प्रकाशकों से अच्छा पैसा लखनऊ के किसी स्कूल में आप को मिल जाएगा। लेकिन सुशील सिद्धार्थ अब दिल्ली की साहित्यिक राजनीति में रम चुके थे। इस राजनीति का नशा छोड़ने को वह तैयार नहीं थे। उन को लग रहा था कि वह लेखकों की नर्सरी तैयार कर रहे हैं। दिल्ली में लेखकीय राजनीति का नशा , अड्डेबाज़ी का नशा उन्हें रास आ गया था। वह लखनऊ पहले आते थे तो मिल-मिला कर जाते थे। अब कब आए , कब लौट गए पता ही नहीं चलता था। लेकिन जल्दी ही राजकमल से भी वह विदा हो गए। नशा जैसे टूटा। अब फिर उन से लखनऊ लौटने की बात करता। सावित्री शर्मा का गीत , दे रहे गीत नयन सौगंध तुमको, हम अकेले हैं प्रवासी लौट आओ ! सुनाते हुए कहता , प्रवासी अब तो लौट आओ ! वह कहते हां , बड़े भाई आप के आदेश का पालन जल्दी ही करता हूं।

अब वह किताब घर में थे। खुश थे और सक्रिय भी खूब थे। बेटी इशिता की शादी हो चुकी थी। बेटा ईशान भी कैरियर पकड़ चुका था। वह बेटे ईशान की गर्लफ्रेंड के साथ उस की फ़ोटो फ़ेसबुक पर पोस्ट करते हुए लिख रहे थे , बेटा अपनी गर्लफ्रेंड के साथ। ऐसे पिता कहां होते हैं। आशा जी भी स्कूल में प्रिंसिपल हो गई थीं। बीमारियां देह में घर बसा चुकी थीं। शुगर से दोस्ती पहले से थी , अब यह दोस्ती प्रगाढ़ हो चुकी थी। एन जी ओ प्लास्टी हो चुकी थी। मैं कहता अब क्या करने के लिए दिल्ली में अपने को दुहवा रहे हैं , किसी गाय की तरह ? वह हंसते हुए कहते लौटता हूं जल्दी। फिर एक दिन कहने लगे , लौट कर करुंगा क्या लखनऊ में । मैं ने कहा , हिंदी पढ़ाइएगा। वह हंसने लगे। कहने लगे , हिंदी में लोग लिख तो रहे हैं , छप भी रहे हैं , लेकिन हिंदी अब पढ़ कौन रहा है ? ऐसे ही जब एक अख़बार लखनऊ से निकला था तो संपादक ने उन्हें बुलाया काम करने के लिए। सुशील आए भी बात करने। मुझ से मिले घर आ कर। मैं ने बधाई दी। और पूछा कुछ पैसे की भी बात हुई ? तो वह बोले , हुई तो बड़े भाई पर मैं ने संपादक से पूछ लिया है , कि इस अख़बार की आयु कितनी है ? और हंसने लगे। जाहिर है नौकरी मिलने के पहले ही वह पंगा ले चुके थे। बयाना लेना , गच्चा देना , पंगा लेना अब उन का स्वभावगत स्वाभिमान बन चुका था। सब कुछ था पर मैं सिर्फ इतना सा चाहता था कि बहुत हो गया भटकाव। अब वह आशा जी के साथ पारिवारिक जीवन शांति से जीना सीखें। लखनऊ लौट आएं या आशा जी को ही दिल्ली लेते जाएं।

पर वह तो भटकाव और उलझाव के अलक जाल में पूरी तरह फंस चुके थे।

फेसबुक पर इन दिनों वह खूब सक्रिय थे। उन के प्रशंसकों की भारी फ़ौज थी। लगभग रोज ही उन की दो चार पोस्ट रहतीं। व्यंग्य वह पहले भी लिखते थे लेकिन अब वह लगभग व्यंग्य में पूरी तरह रम चुके थे। पूरी रौ में थे। लेकिन मैं देख रहा था अब बीमारी के बवाल में फंस कर वह खुद व्यंग्य बन रहे थे। तो भी व्यंग्य ने उन को जैसे आक्सीजन सी दे दी थी। जितना जहर जीवन में पिया था सुशील सिद्धार्थ ने जैसे सब कुछ व्यंग्य में उड़ेल देना चाहते थे। उन की गुरु चेला सीरीज में उन की गुरुओं के प्रति वितृष्णा की इबारत को बहुत आसानी से पढ़ा जा सकता है। जितना शोषण गुरुओं ने उन का किया , उन की ज़िंदगी को नरक बनाया , वह सब उन के व्यंग्य में झलक ही नहीं रहा था , बदक रहा था। जैसे चूल्हे पर रखा कोई अदहन हो। एक बानगी देखें :



गुरुदेव : चेला , कर्मकांड शब्द का क्या मतलब है ?

चेला : गुरुदेव ,यह शब्द कर्म और कांड से मिलकर बना है।

गुरुदेव : इन शब्दों का ही मतलब बताओ।

चेला :गुरुदेव ,मैं जो करता हूं उसे कर्म कहेंगे ।

गुरुदेव : और मैं जो करता हूं ?

चेला : आप तो कांड करते हैं ।

सच यही है कि सुशील सिद्धार्थ का कर्म असल में सही अर्थों में शिनाख्त नहीं पा सका। जिस-जिस को धो-पोंछ कर खड़ा किया उस-उस ने उन्हें डसा। यही उन के जीवन का एकमेव सत्य था। नहीं उन जैसा गंभीर अध्येता , वक्ता और संपादक हमारी पीढ़ी में दुर्लभ है। सुशील बहुत अच्छी कविताएं लिखते थे। अवधी में भी , हिंदी में भी। मोतियों जैसे उन के लिखे अक्षर आज भी मन में टंगे पड़े हैं। बच्चों पर लिखी उन की कविताएं भी मैं ने पढ़ी हैं। उन की आलोचना में उन का अध्ययन देखते बनता है। उन की भाषा में तुर्शी और उस के ठाट के क्या कहने। मेरी भी कुछ कहानियों की किताबों की समीक्षा उन्हों ने जगह-जगह लिखी। मेरी ग्यारह प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका भी लिखी है सुशील सिद्धार्थ ने। मेरे उपन्यासों पर वह समग्र रुप से लिखना चाहते थे। कहते थे नोट बना रहा हूं। हालां कि वह बहुत नोट बना कर लिखने के अभ्यस्त नहीं थे। परमानंद श्रीवास्तव की तरह उन की आलोचना भी तुरंता आलोचना की शिकार थी। यह बात भी मैं जानता था। तो उन से कहता था , पंडित जी , हम को तो यह टॉफी खिलाइए नहीं , यह टॉफी अपनी किसी नायिका को खिला दीजिए। बता दूं कि बावजूद तमाम मुश्किलों के उन के पास नायिकाएं भी खूब थीं , किसिम-किसिम की। तो वह हंसते हुए कहते , नहीं बड़े भाई गंभीरता से कह रहा हूं। लेकिन सुशील के पास इतना लिखने का अवकाश अब नहीं था। इधर लगातार जब वह व्यंग्य और ज्ञान चतुर्वेदी को शरणागत हो गए थे तो एक बार मैं ने उन्हें मनोहर श्याम जोशी की याद दिलाई और कहा कि फुटकर व्यंग्य में क्यों खर्च हुए जा रहे हैं। मनोहर श्याम जोशी की तरह कोई बड़ा व्यंग्यात्मक उपन्यास लिखिए तो बात बने। तो कहने लगे बात तो ठीक कह रहे हैं , लेकिन यहां तो ज़िंदगी ही फुटकर हो गई है। मैं ने उन से कहा कि यह फुटकर व्यंग्य और फुटकर समीक्षा से छुट्टी ले कर व्यंग्यात्मक उपन्यास लिखिए। श्रीलाल शुक्ल के साथ का लाभ कमाइए। नागर जी को याद कीजिए। लखनऊ के पानी का कुछ ऋण उतारिए। या फिर आलोचना पर कुछ गंभीर कीजिए। अपने अध्ययन और अपनी मेधा का , अपनी भाषा का कुछ तो सदुपयोग कीजिए। पर वह सुन कर हां-हां ज़रूर ! कह कर खिसक लेते। पता नहीं उन्हें क्या हड़बड़ी थी, क्या योजना थी।

पंडित अमृतलाल नागर मुझ से अक्सर कहते रहते थे , रचा ही बचा रह जाएगा। संयोग से सुशील सिद्धार्थ भी इतना रच गए हैं कि हमारे बीच सर्वदा बचे रहेंगे। मेधा तो सुशील सिद्धार्थ की यह थी कि किसी विषय पर दो-तीन घंटे में भी बढ़िया लेख लिख कर वह दे देते थे। अचानक कहीं कुछ बोलना हो , आप सुशील से कहिए वह फौरन तैयार। मान लीजिए पीपल पर सेमिनार हो रहा है। वक्ता कम पड़ गए हों। सुशील सिद्धार्थ उधर से गुज़र भर रहे हों और आप उन्हें रोक कर निवेदन कर लें कि पीपल पर बोलना है। वह फौरन हां कर देंगे। और यह देखिए सब से बढ़िया बोल दिए। पीपल , तुलसी , बरगद , घास-पतवार किसी भी विषय पर वह धुआंधार बोल देंगे। घनानंद , रसखान , कबीर , अज्ञेय , मुक्तिबोध , नागार्जुन , नीरज , ज्ञानरंजन , कालिया , प्रेमचंद सब उन के पास। जिस पर चाहिए , उस पर। किसी बिलकुल नए लेखक या कवि की कोई किताब हो बिना पढ़े , वहीँ उलट-पुलट कर देख कर ही वह धाराप्रवाह बोलने की महारत रखते थे। इसी लिए पुस्तक मेलों में लोग उन्हें खोजते। और वह सर्वसुलभ। अपनी पूरी भाषा-भंगिमा के साथ।

संस्कृत , अवधी , हिंदी की अगरबत्ती सुलगा कर वह पूरी सभा को सुगंधित करने का हुनर जानते थे। कालिदास और केदार के बिंब बखान कर वह निराला , पंत , प्रसाद , महादेवी की गंगा में नहला कर तुलसी , कबीर और खुसरो की सरलता से भी भिगो सकते थे। सेमिनारों का संचालन ऐसा कि कई बार विशेषज्ञ वक्ताओं पर भी भारी पड़ जाते। असल में आप को एक साथ खुश और घायल कर देने वाले सुशील सिद्धार्थ ने अगर अपनी प्रतिभा का , अपने अध्ययन का , अपनी भाषा का ठीक से प्रबंधन किया होता , सदुपयोग किया होता तो वह हमारी पीढ़ी के , हमारे समय के बड़े आलोचक और बड़े रचनाकार के रुप में आज उपस्थित होते। यह सब ज़रुर होता बशर्ते उन के पास एक स्थाई और सम्मानजनक नौकरी होती। तब हो सकता था कि मालिश महापुराण उन का व्यंग्य संग्रह न हो कर कालजयी उपन्यास के रूप में उपस्थित रहता। क्या पता तब ज्ञान चतुर्वेदी सुशील सिद्धार्थ के कसीदे लिख रहे होते। तेजेंद्र शर्मा लंदन बुला कर सुशील सिद्धार्थ को इंदु शर्मा पुरस्कार दे रहे होते। विवेक मिश्र उन की किताब छाप रहे होते। काश कि ऐसा हुआ होता। सुशील सिद्धार्थ की भाषा में क्या तो चमक थी। क्या तो धार , गठन और गंध थी। तलवार क्या चलती होगी युद्ध में जो तुर्शी सुशील भाषा में बोते थे। भाषा में वह टटकापन , वह गमक और वह चटकार आसान नहीं है जैसी सुशील सिद्धार्थ के पास है। उन की भाषा में जो सहजता का स्पेस है वह दुर्लभ है। अब अलग बात है और कि तात्कालिकतावश ही सही अब वह व्यंग्य के व्यक्ति मान लिए गए हैं। आलोचना या अन्य विधाओं के लोग भले सुशील सिद्धार्थ को औपचारिक श्रद्धांजलि दे कर सो गए लेकिन देश भर के व्यंग्यकारों ने ही सुशील सिद्धार्थ के लिए आंसू बहाए। लखनऊ में किसी और ने नहीं , व्यंग्य लेखक संघ [ वलेस ] ने ही सुशील सिद्धार्थ के लिए श्रद्धांजलि सभा आदि आयोजित की। उन के निधन की खबर को खोने नहीं दिया।


हालांकि सुशील सिद्धार्थ ने अब के दिनों में उगते सूरज को बाक़ायदा प्रणाम करना सीख लिया था। लेकिन अब इस सीखने में देर बहुत हो गई थी। शायद इसी लिए अब उगते क्या डूबते सूरज को भी प्रणाम करना उन की आदत में शुमार हो गया था। सो सुशील सिद्धार्थ के दोस्त बहुत थे अब। इन्हीं दोस्तों में उन के ढेर सारे दुश्मन भी थे। जिन में कुछ की तो शिनाख्त थी उन के पास। लेकिन अपने ज़्यादातर दुश्मनों को वह नहीं ही पहचानते थे। घात पर घात खाते रहते थे। उन के गुरु लोग तो गुरु लोग , कुछ शिष्यजन भी उन पर पीठ पीछे आक्रमण से नहीं चूकते थे। उन की कुछ नायिकाएं भी समय देख कर उन के लिए जहर उगलती मिलती थीं। वह नायिकाएं भी जिन को सुशील सिद्धार्थ ने धो-पोंछ कर बड़े परिश्रम से लेखकों की पांत में बिठाया था। इन आक्रमण और घात-प्रतिघात ने सुशील को कुंठित ही नहीं , अब खासा बेधड़क भी बना दिया था। तो कई बार रसरंजन के समय बातचीत में वह कुतुबमीनार उलट कर खड़ी कर देते थे। अपना सारा गर्दो-गुबार चटक गालियों में बेधड़क उतार कर फेंक देते थे। गालियों का उन का गायन और वाचन भी बहुत दिलचस्प होता। लोग उसे सुनने के लिए कान लगाए खड़े हो जाते। बड़ी-बड़ी मूर्तियां खंडित हो जातीं उन की गालियों में। बड़ी-बड़ी देवियां दस्तूरन उन की गालियों में समा जातीं। उन देवियों के करतब ही ऐसे होते। चाहे लखनऊ की हों , चाहे दिल्ली या कहीं और की। किसी के लिए माफ़ी नहीं होती थी। न किसी को अनुपस्थित होने की अनुमति । संस्कृत के श्लोकों में गालियों का छंदबद्ध वाचन जब वह करते ऐसे लोगों के बाबत तो उन की पीड़ा छलक पड़ती। उन की इस पीड़ा परायण को छोड़ दें तो सामान्य स्थितियों में वह बातचीत में बहुत संजीदा थे।

नब्बे के दशक के आख़िर की बात है। वागर्थ में मेरी एक कहानी बड़की दी का यक्ष प्रश्न पढ़ कर पहली बार वह मुझ से मिलने आए थे। मेरे पांव छू कर बोले , आप का अनुज हूं। आप से छ महीने छोटा। कहानी के साथ परिचय भी छपा था। तब से वह मेरी कहानियां पढ़-पढ़ कर बात करते। कई समीक्षाएं लिखीं। पर बड़े भाई , बड़े भाई कहते-कहते कब आहिस्ता से हमारी ज़िंदगी में भी उतर आए पता ही नहीं चला। बाद के दिनों में उन की विद्वता और विनम्रता से प्रभावित हो कर मैं सुशील सिद्धार्थ का प्रशंसक बन गया। आज भी हूं , रहूंगा। उन की नायिकाओं को ले कर उन से ठिठोली भी कर लेता। अकसर मेरी बात सुशील सिद्धार्थ टालते नहीं थे , कभी कोई अड़चन आ जाती तो वह सकारण बता कर हाथ जोड़ लेते। यह भी जोड़ देते कि लेकिन फला से इस का ज़िक्र न हो तो बेहतर।

मैंने उन की इस रेखा को कभी लांघा नहीं। मित्रता का तकाज़ा भी यही था। बस झुक कर नौकरी करने और लखनऊ आने की बात को वह ज़रुर टालते गए। बिना कारण। झुक कर नौकरी किए होते या समय से लखनऊ लौट आए होते तो शायद वह अभी हमारे साथ होते। बड़े ठाट से बड़े भाई कहते हुए , इन की , उन की ठिठोली फोड़ते हुए। पर शायद समय और सुशील सिद्धार्थ को यह मंज़ूर नहीं था। प्रवासी लौटा तो पर तब जब सुशील सिद्धार्थ नाम का यह मेरा छोटा भाई देह छोड़ चुका था। हम सब को छोड़ कर हंस अकेला उड़ गया था । मैं अकेला गाता ही रह गया , दे रहे गीत नयन सौगंध तुम को, हम अकेले हैं प्रवासी लौट आओ ! अपने स्वभावगत स्वाभिमान में प्रवासी अंतत: मुझे भी गच्चा दे गया। स्मृतियों में समा गया। वीरेंद्र मिश्र के गीत में जो कहूं तो भीतर घुट-घुट रहना / बाहर खिल-खिल करना ! की विवश यात्रा सुशील सिद्धार्थ की समाप्त हो गई।

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. संपर्क : dayanand.pandey@yahoo.com

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