सिर्फ एक कॉस्मेटिक नारा भर है ‘स्वच्छ भारत’

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ऐसी तस्वीरें और स्वच्छ भारत का नारा

क्या हमारे पास कोई वेस्ट मैनेजमेंट पालिसी है? या अपना कूड़ा, पड़ोसी के घर की तरफ या सड़क पर फेंकने को ही हम सफाई कहते हैं। सड़क से गंगा यमुना नदी या फिर शहर के बाहर कूड़े के पहाड़ करना हमारी वेस्ट मैनेजमेंट की बेस्ट पालिसी है?

हमारे शहर कूड़े की दुर्गन्ध से भरे हुए हैं। जब सरकार स्वच्छ भारत का नारा दे रही है तो ज़रूर यह पूछना चाहिए कि शहरों में कूड़े के ढेरों पर पालीथीन और कबाड़ चुनकर अपनी गुजर बसर कर रहे नन्हें बच्चों को इस नारकीय जीवन से कब मुक्ति मिलेगी?

नए पेड़ लगाने की बातें बहुत जोर-शोर से होती हैं। इस 2 अक्टूबर को तो पेड़ लगाने की यह रस्म अदायगी और भी नाटकीय समारोह मनाकर संपन्न की जायेगी। लेकिन इससे ज्यादा ज़रूरी सवाल ये है कि आखिर पुराने हरे-भरे पेड़ काट कर पूरे-पूरे जंगल क्यों साफ़ किये जा रहे हैं। नए पेड़ लगाने से ज्यादा ज़रूरी है कि हरे भरे पेड़ों को काटने पर सख्त पाबंदी हो।

कूड़ा साफ़ करने से ज़्यादा ज़रूरी है कि जो उद्योग कूड़े और वेस्टेज के पहाड़ खड़े करते हैं, जो कभी डीजेनेरेट न होने वाले खतरनाक कचरे का निर्माण करते हैं, उन उद्योगों पर इसके निपटान की ज़िम्मेदारी कठोरता से लागू की जाए।

लेकिन ऐसा कैसे होगा जब भारत सरकार ही अमेरिका और अन्य विकसित देशों को अपने समुद्र तटों पर खतरनाक कचरा डंप करने की इजाज़त दे रही है। वरना स्वच्छ भारत सिर्फ एक कॉस्मेटिक नारा भर है। जिसका वास्तविक सफाई से कहीं कोई सम्बन्ध नहीं है।

 

सोशल एक्टिविस्ट और कवि संध्या नवोदिता की फेसबुक वाल से साभार।



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