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आज के अखबार : ‘द टेलीग्राफ’ में पहले पन्ने पर लीड समेत तीन ऐसी खबरें हैं जो मेरे दूसरे अखबारों में नहीं हैं

संजय कुमार सिंह

आज कोलकाता के दैनिक, द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर तीन ऐसी खबरें हैं जो दिल्ली के दूसरे कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं हैं। तीनों खबरें किसी एक अखबार में पहले पन्ने पर तो नहीं हैं। असम सरकार की सुप्रीम कोर्ट में खिंचाई से जुड़ी खबर तो दिल्ली में पहले पन्ने पर है ही नहीं। तीन में से एक खबर नवोदय टाइम्स में दो कॉलम में है जबकि दूसरी अमर उजाला में शीर्षक है। तीसरी खबर जो दिल्ली के किसी और अखबार में नहीं है वह यह कि, “सुप्रीम कोर्ट ने गोमांस उत्पीड़कों के बारे में असम सरकार से पूछा, और कुछ नहीं है करने के लिए? दूसरी खबर जो टेलीग्राफ में लीड है वह नवोदय टाइम्स में है। इसका शीर्षक है, “महाकुम्भ : सोशल मीडिया पर बिक रहे नहाती महिलाओं के वीडियो, एफआईआर”। तीसरी खबर अमर उजाला में सिंगल कॉलम की है, रेलवे ने एक्स से कहा – भगदड़ से जुड़े वीडियो हटायें। द टेलीग्राफ ने लिखा है कि इसे भगदड़ से संबंधित मामले की लीपापोती के रूप में देखा जा रहा है। सरकारी पक्ष यह है कि बहुत सारे लोगों ने इस बारे में मंत्रालय से अनुरोध किया है और इसीलिए मंत्रालय घटना के अगले ही दिन सक्रिय हो गया था। एक तरफ देश में एफआईआर नहीं लिखने की शिकायत खत्म नहीं हो रही है वहां मंत्रालय की यह सक्रियता आपको प्रशंसनीय लग सकती है।

महाकुम्भ में नहाती महिलाओं के वीडियो बन गये, खबर अब छप रही है, कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है या हो ही रही है यह कम शर्मनाक नहीं है। जब विधर्मियों को वहां जाना ही नहीं था तो यह काम किसी आस्थावान श्रद्धालु ने ही किया होगा और इससे पता चलता है कि आस्थावान श्रद्धालु कैसे हैं या पैसे कमाने के लिए वे क्या-क्या कर सकते हैं। जो भी हो, व्यवस्था करने वालों को यह सुनिश्चित करना चाहिये था कि नहाने और कपड़े बदलने के समय फोटो खींचने की गुंजाइश ही नहीं रहे। और अगर थी या रहने दी गई थी तो भगदड़ के बाद के वीडियो हटाने के लिए क्यों कहना और वो कौन लोग हैं जिन्हें नहाने के वीडियो की चिन्ता अब हुई जब लाखों लोगों ने देख लिया जबकि हादसे के वीडियो की चिन्ता उसी दिन हो गई। संभव है यह (पहली बार) मुआवजा नकद मिलने का कमाल हो और लोगों के पास परिवार में मौत या किसी के घायल होने पर भी वीडियो की चिन्ता के लिए समय हो जबकि नहाते समय किसी को वीडियो बनाते देखकर भी उसके सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक की चिन्ता नहीं हुई हो। अगर इसके पीछे कोई कारण नहीं है तो यह कुम्भ जाने वाले समाज का चरित्र है और रेखांकित करने वाली बात है। इन तीनों मामलों में यह दिलचस्प है कि सरकार या राज्य को क्या करना चाहिये वह सुप्रीम कोर्ट को बताना पड़ रहा है।  

द टेलीग्राफ में नई दिल्ली डेटलाइन से आर बालाजी की खबर इस प्रकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कथित तौर पर गोमांस ले जाने के आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला चलाने के लिए शुक्रवार को असम सरकार की खिंचाई की और मुकदमे पर रोक लगाते हुए कहा कि राज्य को “बेहतर काम करने चाहिए”। पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति अभय एस ओका ने असम सरकार के वकील से कहा, “आपको, राज्य को, इन लोगों के पीछे भागने से बेहतर काम करना चाहिए।” पीठ में न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां भी शामिल थे। पीठ, ने मौखिक टिप्पणी की कि एक अभियुक्त से यह जानने की उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसने किस प्रकार का मांस पैक किया है। आरोपी अभिजीत सैकिया का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष गोस्वामी ने पहले कहा था कि उनका मुवक्किल केवल एक गोदाम का मालिक है। असम की भाजपा सरकार ने पिछले दिसंबर में होटल, रेस्तरां और सामुदायिक समारोहों सहित सार्वजनिक स्थानों पर गोमांस परोसने और खाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसमें कहा गया है कि ऐसा असम मवेशी संरक्षण अधिनियम, 2021 को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है, जो गैर-गोमांस खाने वाले समुदायों के निवास वाले क्षेत्रों और किसी भी मंदिर या सत्र (वैष्णव मठ) के 5 किमी के भीतर गोमांस की बिक्री और खरीद पर प्रतिबंध लगाता है। अधिनियम का उद्देश्य मवेशियों के “वध, उपभोग, अवैध परिवहन” को विनियमित करना है।

इन खबरों के अलावा आज जब ज्यादातर अखबारों की बड़ी और प्रमुख खबर चुनाव के लिए अमेरिकी आर्थिक सहायता की सूचना सरकार के लिए परेशान करने वाली है तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि दुनिया से प्रतिस्पर्धा और तेज विकास के लिए भारतीय सोच वाले नेतृत्व की जरूरत है। अमर उजाला की लीड का यह शीर्षक इस तथ्य के बावजूद है कि दस साल में भारतीय सोच का मतलब गाय, गोबर, गोमूत्र, आयुर्वेद, योग, ईश्वर, आस्था, कुम्भ, डुबकी, स्नान, मंदिर, पूजा, धर्म और येनकेन प्रकारेण चुनाव जीतना आदि ही है। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में भी है। यहां शीर्षक थोड़ा अलग है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होगा, प्रधानमंत्री ने कहा,ऐसे नेताओं (लीडर्स) की जरूरत है जो भारतीय मस्तिष्क के साथ वैश्विक मनःस्थिति को समझें। संघ परिवार से जुड़े होने के कारण, संघ परिवार की पार्टी के सत्ता में होने के नाते ऐसी जरूरत और यह बयान कोई नई बात नहीं है। दस साल से ज्यादा से भारतीय सोच की हालत यह है कि ‘अब’ पता चला कि दूसरे देश यहां के चुनावों को प्रभावित करने के लिए पैसे भेजते हैं और सरकार को सूचना ही नहीं थी। मुद्दा यह है कि एस जयशंकर विदेश सेवा के अधिकारी रहे हैं और वैश्विक मानसिकता को चाहे जैसे समझते हों उनका दिमाग अगर भारतीय है तो किसी और का क्यों नहीं होगा और पहचाना कैसे जायेगा। तरीका जो भी हो, यह मेरी चिन्ता नहीं है। मेरी चिन्ता वो प्रचारक हैं जो अमेरिका से भेजे जा रहे प्रवासियों को बेड़ियां लगाने की वकालत कर रहे हैं और इसके पक्ष में तर्क ढूंढ़ रहे हैं। जॉर्ज फर्नांडीज को हथकड़ी लगाये जाने से इनकी तुलना कर रहे हैं और बता रहे हैं कि इनमें कुछ अपराधी और भगोड़े भी हैं। बैंकों के पैसे लेकर भागे असली भगोड़ों को अभी तक नहीं लाया जा सका है उसके बावजूद।

यही नहीं, अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदे के लिये जिसे प्रत्यर्पित करवाकर लाया गया था उसे जमानत मिल गई है। मामले का हाल अभी पता नहीं है। मुझे नहीं पता, अगस्ता वेस्टलैंड सौदे में  भ्रष्टाचार का आरोप भारतीय सोच वाले नेतृत्व का है या किसी और की। आम आदमी के लिए सूचना का स्रोत मीडिया है और मीडिया यह खबर देता रहा है कि सरकार ने लाखों शेल कंपनियां बंद करवा दी हैं ताकि देश में भ्रष्टाचार से कमाया पैसा शेल कंपनियों के जरिये भारत में निवेश न किया जा सके। सरकार की इस कोशिश के बावजूद अदाणी के यहां 20,000 करोड़ रुपये का निवेश किसका है, पता ही नहीं है। सरकार ने पता लगाने की कोशिश नहीं की या जो कोशिशें कीं उनसे पता नहीं चला। देश,सरकार और अदाणी को बदनाम करने वाली हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट के बावजूद। यही नहीं, हिन्डनबर्ग ने यह कहकर अपना काम बंद कर दिया है कि उसे जो करना था उसने मन भर कर लिया लेकिन भारत में इसे ऐसे प्रचारित किया गया जैसे उसने काम ही बंद कर दिया तो उसकी रिपोर्ट का क्या मतलब जबकि स्थिति यह है कि सरकार देश में शेल कंपनियों के जरिये काले पैसे के निवेश को रोकने में लगी रही और 20,000 करोड़ रुपये के संदिग्ध निवेश का पता नहीं चला। जब बताया गया तो चुप है। आश्चर्य नहीं हुआ। मोटे तर पर रवैया यह कि आया भी हो तो ठीक ही होगा। 

इस सरकार ने जनहित के लिये विदेशी पैसे प्राप्त करने के नियम काफी सख्त कर दिये हैं और इसका नतीजा है कि कई एनजीओ विदेशी चंदे प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं और बंद भी हो गये हैं। नौकरियों की कमी इस कारण भी है। जांच तो मदर टेरेसा के एनजीओ की भी हुई है लेकिन चुनाव में गड़बड़ी (घोषित उद्देश्य भले ही कुछ और है) के लिए पैसे आये सरकार को पता ही नहीं चला। आखिर नियमों और सख्ती का मतलब क्या रहा गया। आरोप है कि मोदी सरकार ने विरोधियों को परेशान और कमजोर करने के लिए यह सब किया है क्योंकि नागरिकों में जो सरकारी नौकरी में हैं वो तो वैसे ही नियंत्रित हैं। धंधा-व्यवसाय करने वालों के लिए ढेरों नियम हैं और जनसेवा करने वाले अगर विदेशी चंदे के दम पर मजबूत हों तो उन्हें नियंत्रित करना मुश्किल होगा। इसलिए उनके विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई है। चंदा देने वाले देसी लोगों या संस्थानों को तो कसा ही जा सकता है। ईडी, सीबीआई के साथ पीएमएलए कानून भी है जिसपर सरकार की ढिलाई से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई ही नहीं हुई और यह वैसे ही है जैसे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट में हो रहा है। हालांकि यह अलग मुद्दा है। मुख्य मुद्दा तो यही है कि एनजीओ को जनसेवा के लिए मिलने वाले विदेशी चंदे की खबर सरकार को होती है और जो सख्ती की गई है उससे उन्हें दान मिलना बंद हो गया है लेकिन चुनाव को प्रभावित करने वाला विदेशी पैसा किसे मिला, किसने कैसे खर्च किया खबर ही नहीं है। आम आदमी को 50,000 रुपये नकद जमा कराने पर पैन देना है और नकद निकालने पर नजर है। ऐसे में 21 मिलियन डॉलर बैंकों के जरिये ही आये होंगे (नकद आये तो नालायकी और गंभीर है) तब खबर नहीं मिली और अब आश्चर्य हो रहा है तो समझना मुश्किल नहीं है कि क्या हो रहा है। खास कर इलेक्टोरल बांड की कहानी जानने के बाद।

विदेश मंत्रालय ने कहा है कि जांच चल रही है। लेकिन मुद्दा तो यह है कि सामान्य स्थितियों में अगर पैसे आये हैं और इस्तेमाल हुए हैं तो उसी समय खबर होनी चाहिये थी। जब हर बड़े खर्चे का हिसाब देना है, बैंकों के जरिये होना है और उसपर नजर रखने का इंतजाम है तो इतने पैसे खर्च हो गये पता नहीं चला तो बिना सोचे नजर रखने के लिए जिम्मेदार सभी लोगों को लाइन हाजिर कर दिया जाना चाहिये और उनसे पूछताछ वैसे ही होनी चाहिये जैसे हिरासत में होती है या जिसके लिए हिरासत में लिया जाता है। छापा मारी होती है। पर आज की खबरों से नहीं लग रहा है कि ऐसा कुछ होने वाला है या सरकार को ऐसी जांच अथवा कार्रवाई की जरूरत लगती है। मतलब साफ है। मामला तमाम पुराने मामलों की तरह कुछ दिन में शांत हो जायेगा। कल कुछ और खबर होगी। फॉलो अप अब होते नहीं हैं। होने नहीं हैं। अमेरिकी धन का इस्तेमाल चाहे जिसने किया हो। अगर आपको लगता है कि आम आदमी पार्टी के खिलाफ शराब घोटाले की खबर लग गई, विपक्षी दलों के पैसे पकड़े जाते हैं, सरकार ईमानदारी से कार्रवाई कर रही है और भ्रष्ट नहीं है तो अमेरिकी सहायता की खबर वाकई नहीं होगी। भले यह आरोप अर्बन नक्सल का नहीं है। ऐसे में संभावना यही है कि किसी गैर सरकारी संस्था या विपक्षी दलों ने खर्च कर दिया होगा। आप ऐसा मानना चाहें तो मानिये, सरकार यही चाहती है और इसी की जांच होगी। आपको नतीजे में खुलासे की उम्मीद हो तो वह भी रख सकते हैं। 

अमर उजाला की तरह आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी अलग है। शीर्षक है – “वायु, जल प्रदूषण से निपटने के लिए पूरे साल काम करने की योजना : मुख्यमंत्री”। सरकार के लिए अमेरिकी धन का दावा परेशान करने वाला है, जांच चल रही है शीर्षक से यह खबर दो कॉलम में सेकेंड लीड है। दि एशियन एज की लीड, दिल्ली की मुख्यमंत्री का प्रचार है। उन्हें मजबूत या काम करता दिखाने का प्रयास है। शीर्षक है, दिल्ली (की) मुख्यमंत्री ने प्रशासन में उलटफेर किये, पूर्व मुख्यमंत्री, मंत्रियों के निजी स्टाफ को हटाया। वैसे तो यह कोई नई बात नहीं है। और इसमें कुछ खबर नहीं है। खबर यह होगी कि किसे रखा गया है और उनकी खासियत क्या है। लंबे समय से चर्चा है कि ऐसे सभी कर्मचारी आरएसएस तय करता है और राजनीतिक पदों पर बैठाये जाने वाले लोगों के वेतन का हिस्सा भी चंदा-दान में जाता है। यह चर्चा तब भी हुई थी जब पूर्व राष्ट्रपति ने आयकर कट जाने की शिकायत की थी। लोगों का मानना था कि राष्ट्रपति के वेतन से आयकर नहीं कटता है और अगर कुछ कटता है तो वह चंदा होगा। मैं काफी समय तक उसपर किसी अच्छी खबर या स्पष्टीकरण का इंतजार करता रहा था पर नहीं दिखा। आज स्टाफ बदलने की खबर को लीड बनाने से याद आया कि यह क्यों जरूरी है और जो नये रखे जायेंगे उनके बारे में बताने का अब रिवाज ही नहीं है।

नवोदय टाइम्स की लीड भी आज अमेरिकी सहायता की खबर ही है। उपशीर्षक के अनुसार, भारत ने कहा है कि देश के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप को लेकर पैदा हुई चिन्ता। मुझे लगता है कि यूएसएड की सहायता तो काफी खुली और सर्वविदित है। विदेशी हस्तक्षेप तो कई छिपे और परोक्ष तरीके से होता है। सरकार का काम है कि वह इनके प्रति सतर्क रहे और यह आश्चर्यजनक है कि सरकार को पता नहीं था, पैसे आ गये और खर्च भी हो गये। अगर पड़े हों और इतना सब होने पर भी पता ही नहीं चला तो और बड़ा निकम्मापन होगा लेकिन वह बड़ा मुद्दा है। मुझे लगता है कि पैसे कहां आये कैसे खर्च हुए सब बैकों से पता चल जायेगा और अभी तक इससे संबंधित खबर सार्वजनिक हो जानी चाहिये थी। अरुण शौरी ने एक बार कहा था कि खबरें तो लोग एक्सप्रेस बिल्डिंग के रिसेप्शन पर छोड़ जाते थे और अपनी पहचान छिपाने के लिए बाद में फोन करके बताते थे कि फाइल छोड़ आया हूं और इस तरह, खोजी खबरें समझी जाने वाली खबर पकी-पकाई मिल जाती थीं। तब कॉलर आईडी का जमाना नहीं था और फोन कहां से आ रहा है यह आम तौर पर पता नहीं चलता था और पता करना आसान भी नहीं था। अब वह स्थिति नहीं है वरना विदेशी सहायता किसी सरकारी बैंक की किस शाखा में आती है – सबको पता है और वहां कौन देखता है वह भी पता है। अब खबर लीक होगी तो संबंधित अधिकारी को टांग दिया जायेगा। पहले उसपर कार्रवाई नहीं होती थी और अखबारों को स्रोत का खुलासा नहीं करना होता था। अमृतकाल में सरकारी जांच का इंतजार कीजिये।

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