‘बहुजन वैचारिकी’ के डॉ. तुलसी राम विशेषांक का विमोचन गांव ‘मुर्दहिया’ में तुलसी राम के परिजनों ने किया, देखें तस्वीरें

तुलसी राम को उनकी प्रथम स्मृति-तिथि से एक दिन पूर्व 12 फरवरी, 2016 को उनके गाँव—मुर्दहिया (धरमपुर, आजमगढ़, यूपी) में याद किया गया और स्मृति-तिथि के दिन 13 फरवरी, 2016 को डॉ.अम्बेडकर पार्क, आजमगढ़ शहर में याद किया गया| तुलसी राम की हिंदी भूमि पर पहचान उनकी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ से बनी लेकिन वो मुख्यतः जवाहर लाला नेहरू विश्वविद्यालय में ‘अंतर्रराष्ट्रीय संबंधों’ के प्रोफ़ेसर और चिन्तक थे| तुलसी राम पर आए ‘बहुजन वैचारिकी’ पत्रिका के प्रवेशांक-विशेषांक में उनके भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय चिंतन को केन्द्रित किया गया है जिसमें तुलसी राम का साहित्य चिंतन, अम्बेडकरीजम, बुद्धिजम, मार्कसिजम, हिन्दू मिथकों, साम्प्रदायिकता, वर्ण-व्यवस्था, सामाजिक न्याय, दलित संहार, दलित महिलाओं के हो रहे बलात्कार पर चिंता, अंतर्राष्ट्रीय चिंतन, उनके साक्षात्कार, डायरी आदि को केंद्र में रखा गया है|

‘बहुजन वैचारिकी’ भाग-1 का विमोचन 12 फरवरी, 2016 को उनके गाँव—मुर्दहिया, धरमपुर, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश में उनके घर-गाँव की महिलाओं द्वारा हुआ जिस क्रम में रेशमा देवी, तुलसी राम की पुत्री अंगीरा चौधरी उर्फ लूबा, मैना कुमारी, राजो देवी, मुन्नी भारती, तुलसी राम की बहन सवित्रा देवी, सबूना देवी आदि महिलाओं ने विमोचन किया| पुरूषों में तुलसी राम के भाई रामअवतार राम, प्रोफेसर सुबोध नारायण मालाकार, गगन, हरमिंदर पाण्डेय, प्रोफेसर अजय पटनायक, अजय कुमार, उनके बचपन के साथी अरविंद पाण्डे आदि विमोचन में शरीक हुए|

‘बहुजन वैचारिकी’ पत्रिका के दो खंडों के विशेषांक में यह पहला खंड है| दूसरे खंड पर काम चल रहा है| वह भी जल्द ही प्रकशित होगा| यह विशेषांक अपनी विशिष्ट सामाग्री संचयन के लिए याद किया जाएगा। सम्पूर्ण पत्रिका 272 पृष्ठ की है| महान मानवतावादी चिन्तक ‘फुले, अंबेडकर और पेरियार के सामाजिक परिवर्तन का महायान’ टैग लाईन से शुरू होकर यह पत्रिका आगे बढाती है| आगे इस विशेषांक को कई खंडों में विभाजित किया गया है जिसे केन्द्रित करके दो खण्डों में देखा जा सकता है|

पत्रिका का पहला खण्ड ‘दुनिया की नजरों में तुलसी राम का व्यक्तित्व’ शीर्षक से है जिसमें अनिल यादव, चौथीराम यादव, श्यौराज सिंह बेचैन, नामवर सिंह, मुद्राराक्षस, दिलीप मंडल, गंगा सहाय मीणा के लेख हैं| इसी में तुलसी राम जी पर संस्मरण का है जिसमें मीना कुमारी, प्रभा चौधरी, नूरजहाँ मोमिन, विपिन कुमार ‘नीरज’, प्रो. प्रकाशचंद्र जैन, कथाकार काशीनाथ सिंह, प्रो. विवेक कुमार, प्रो. नंदू राम, प्रो. मणीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रो. आनंद कुमार, विमल दीक्षित, आकाश गौतम जी के संस्मरण शामिल हैं. आगे संवाद है जिसमें खुद तुलसी राम और प्रो. चौथीराम यादव जी के साक्षात्कार शामिल हैं. अगला हिस्सा उनकी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ पर केन्द्रित है जिसमें वीरेंद्र यादव, मणीन्द्रनाथ ठाकुर, दिनेश कुशवाह, सुनील यादव के लेख हैं| इससे अगला हिस्सा तुलसी राम के संपादक व्यक्तित्व पर है जिसमें डॉ. रामचंद्र और डॉ. जयप्रकाश कर्दम जी के बेहतरीन लेख शामिल हैं|

पत्रिका के दूसरा खंड में तुलसी राम के महत्वपूर्ण लेख, साक्षात्कार, डायरी, कविताएँ शामिल हैं जिसमें तुलसी राम का कवि मन, तुलसीराम का साहित्य चिंतन, जोहार अम्बेडकर: तुलसी राम का अम्बेडकर पर चिंतन, तुलसी राम का बौद्ध जगत, तुलसी राम का हिंदू मिथक साम्प्रदायिकता और मार्क्सवादी चिंतन, तुलसी राम का आरक्षण और सामाजिक न्याय पर चिंतन, तुलसी राम का दलित दमन-उत्पीड़न तथा संहार पर चिंतन आदि है. बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर की मूर्तियों का संहार जारी है, भारत अश्वघोष पढ़िए अंधविश्वास से लड़िए, तुलसी राम का अंतर्राष्ट्रीय चिंतन इत्यादि भी इन्हीं खंडो में विभाजित किया गया है. इस खण्ड में उनके अति महत्वपूर्ण लेख शामिल हैं. अगला खंड तुलसी राम की डायरी पर केन्द्रित है| इससे आगे बढ़ते हैं तो तुलसी राम जी के महापरिनिर्वाण की अंतिम यात्रा की लाईव प्रस्तुति श्रीमत जैनेंद्र द्वारा की गई है जो अन्दर से झकझोर देने वाली है| अंतिम खंड के अंतिम 16 पृष्ठों में तस्वीरों के माध्मय से तुलसी राम के बनारस की गलियों से जेएनयू तक की जीवन यात्रा को तस्वीरों के माध्यम से एकदम सुन्दर लहजे में रेखांकित करने का प्रयास किया गया है|

इस स्मृति और विमोचन के अवसर पर ‘मुर्दहिया’ में भारतीय जन नाट्य मंच ‘इप्टा’ आजमगढ़ ने लोक कलाओं से युक्त लोकधर्मी नृत्य प्रस्तुत किया| तुलसी राम ‘मुर्दहिया’ में बहुत शिद्दत से इन लोक कलाओं पर विमर्श करते हैं| यहाँ के मूल-निवासियों द्वारा इजाद की गई लोक-कलाओं पर तुलसी राम चिंतन करते हुए बताते हैं कि ‘वास्तव में, लोक कलाओं के सर्जक और वाहक इस देश के मूलनिवासी हैं जिसमें दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के लोग आते हैं|’ वे बताते हैं कि किस तरह गीत-संगीत, नृत्य, पेंटिंग आदि चीजें यहाँ के लोगों ने ईजाद किया है| दलितों-पिछड़ों और आदिवासियों द्वारा किए जाने वाले इन लोक कलाओं की उनके गाँव-मुर्दहिया-धरमपुर में प्रस्तुति हुई जिसमें– कहंरवा नाच, धोबिअवा नाच, गोंडईत नाच, चमरवा नाच, अहिरवा नाच, जंघिया का नाच, बिरहा गायन आदि शामिल था|

बिरहा गायन ‘इप्टा’ के रंकर्मी व गायक बैजनाथ यादव ने किया| उनके द्वारा बनाई गई तुलसी राम पर गाने की एक पंक्ति कि “सारे गाँव-देशवा के रहीय देखायी गईलं तुलसीराम…. बुदध, मारकस, बाबा अमेडकर वाली रहिया देखाई गयिलं तुलसी राम……चला चलीं हो भाई….. चला चलीं हो भाई……. चला चलीं हो भाई……. एही रहिया पर…..” | वो जन नाट्य ‘इप्टा’ के गायक और रंगकर्मी हैं| ‘इप्टा’ ने लम्बी संस्कृतिक प्रस्तुती की| यहाँ प्रोफेसर मालाकार, प्रोफेसर अजय पटनायक, लूबा, मुन्नी भारती, गगन आदि लोगों ने अपने विचार रखे| इस सम्पूर्ण कार्यक्रम को ‘इप्टा’ के लोगों ने, ख़ासकर के हरमिंदर पाण्डेय ने ऑर्गनायिज कराया था| इस कार्यक्रम में पूरा गाँव-जवार शरीक था| महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया| साथ ही सभी लोग तुलसी राम के परिजनों से मिले| तुलसी राम का पुराना घर देखना हुआ जिस घर के सामने वे खेला करते थे, वो घर वो कुआँ सब देखना हुआ| उनका वो पुराना घर देखना हुआ जो अब जीर्ण-शीर्ण हो गया है| उनके बचपन में साथ खेलने कूदने वाले लोगों से मिलना हुआ| बहुत सारे अनुभवों और दर्द को लेकर जी रही ‘मुर्दहिया’ एक विशेष दर्द के साथ जैसे हम सबको पकड़ते हुए अपने आगोस में भर रही थी| ‘मुर्दहिया’ हम सबसे बार बार सवाल पूछ रही थी कि आखीर कौन-सी खता हो गई जो मेरी बाहों में…. मेरी जमीन पर खेलने कूदने वाले तुलसी बाबू हमसे कभी मिलने नहीं आए …..|

प्रस्तुति
रामबचन यादव ‘सृजन’
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय
बनारस, उ. प्र.
Mob. 9453087972

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