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आज के अखबार : अमर उजाला में SIR की तारीख बढ़ने की खबर नहीं है, बांग्लादेश में ‘और’ हिन्दू मारे जाने की है

संजय कुमार सिंह

साल के अंतिम दिन के अखबारों के लिए शेख हसीना को संरक्षण और नीरव मोदी, मेहुल चोकसी जैसे भगोड़ों को वापस नहीं ला पाने जैसी खबरें पुरानी हो गई हैं। ताजा खबरों में बांग्लादेश के हिन्दुओं के लिए छाती पीटने के बाद खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में जयशंकर का जाना शामिल है। ममता पर घुसपैठियों की सहायता करने का आरोप है तो पहलगाम में हत्या और हमला तथा  दिल्ली में विस्फोट पर सवाल है। लेकिन चिन्ता पुतिन के घर पर हमले की है। दिल्ली में कोहरे से 264 उड़ान प्रभावित तो यात्रियों को भोजन, रिफंड देने का निर्देश है। इंडिगो पर 458 करोड़ का जीएसटी जुर्माना और ऑनलाइन प्लैटफॉर्म को अश्लीलता रोकें वरना कार्रवाई की चेतावनी है। प्रधानमंत्री ने कहा है, 2025 सुधारों का वर्ष रहा। पूर्व पीएम के बेटे और पूर्व सांसद प्रज्वल रेवन्ना के बेटे तथा कर्नाटक के पूर्व मंत्री, एचडी रेवन्ना यौन उत्पीड़न मामले में कोर्ट से बरी हो गए हैं। मुंबई में विकास के 99 प्रतिशत फंड सत्तारूढ़ गठजोड़ वाले वार्ड में खर्च हुए हैं। जो खबरें हैं उनमें मुख्य न्यायाधीश का यह आश्वासन कि कानूनी इमरजेंसी में 24×7 हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जा सकता है। मुझे लगता है कि यह जिसकी लाठी उसकी भैंस व्यवस्था के बहाने अघोषित इमरजेंसी पर अच्छा वाला पर्दा है।

देश भर के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक साथ जबरन किए जा रहे एसआईआर का ड्राफ्ट पेश करने की तारीख उत्तर प्रदेश में तीसरी बार बढ़ी है। अमर उजाला, टाइम्स ऑफ इंडिया, दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। दूसरी ओर, द हिन्दू में आज यह खबर लीड है। यह भी कि बंगाल में बीमार-बुजुर्गों को एसआईआर में छूट दी गई है। इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। द टेलीग्राफ की लीड डबल इंजन वाले उड़ीशा से खदेड़े गए बंगालियों की खबर है जबकि अमर उजाला की सेकेंड लीड बांग्लादेश में एक और हिन्दू युवक की हत्या की खबर है। अमर उजाला में खालिदा जिया के निधन की खबर भी प्रमुखता से है। कोहरे से प्रभावित 264 उड़ानों के यात्रियों को भोजन, रिफंड देने के ‘निर्देश’ की खबर लीड है। यह स्थिति तब है जब अमर उजाला के पहले पन्ने पर आज अपेक्षाकृत कम विज्ञापन है। टाइम्स ऑफ इंडिया में विज्ञापन नहीं है फिर भी एसआईआर की खबर तो नहीं ही है, उड़ीशा से बंगालियों को खदेड़े जाने की खबर भी नहीं है। जो खबरें हैं उनमें मुख्य न्यायाधीश का यह आश्वासन कि कानूनी इमरजेंसी में 24×7 हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जा सकता है। अखबार ने इस खबर की खास बातों का जो बॉक्स बनाया है उसका शीर्षक है, जनता की ऐसी अदालतें बनाना चाहते हैं जहां लोग पहुंच सकें। ईडी, सीबीआई की मनमानी, पुलिस की नालायकी और बुलडोजर राज में यह देश के मुख्य न्यायाधीश का यह बड़ा, लोकलुभावन आश्वासन हो सकता है। पर मुद्दा यह है कि कानूनी इमरजेंसी आए ही क्यों?

अभी तक तो मैं समझता था कि प्राकृतिक आपदा और स्वास्थ्य संबंधी इमरजेंसी बिना बताए आती है। बिना पुलिस यानी अतिरिक्त बल के तो बुलडोजर भी रोक लिए जाते रहे हैं और दुर्घटनाएं हमेशा टाली जा सकती हैं लेकिन उस दिशा में पर्याप्त काम ही नहीं हुआ है। ऐसे में लीगल या कानूनी इमरजेंसी 1975 की इमरजेंसी से अलग, अघोषित इमरजेंसी की कल्पना लगती है जो सीबीआई, ईडी की मनमानी और 2000 करोड़ के ठेके में 17 करोड़ के कथित घोटाले को पीएमएलए का केस बनाने जैसी खबरों से समझ में आती है। मुझे नहीं पता मुख्य न्यायाधीश मेरी ही तरह खबरें पढ़ते हैं या जनता ने उन्हें अपनी ऐसी समस्या खुद बताई है। जो भी हो, जनता के दबाव में स्वतः संज्ञान लेकर वे अपना ही फैसला बदल चुके हैं। यह फैसला उन्होंने कई सलाहों के बावजूद लिया था और इंडियन एक्सप्रेस इस बारे में बताता रहा था। टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर के खास मुद्दों वाले बॉक्स में सबसे पहली सूचना है, देश भर में मतदाता सूची को अद्यतन करना समाप्त होने के बाद सुप्रीम कोर्ट एसआईआर की वैधता को चुनौती देने वाली अपीलों पर सुनवाई करेगा। अभी तक की खबरों से मैने समझा है कि एसआईआर ही अवैध है। चुनाव आयोग को ऐसा कुछ एक साथ इतने बड़े पैमाने पर करने का अधिकार ही नहीं है और जिस ढंग से किया जा रहा है उसी में कई झोल हैं। इसका मकसद यह बताया जाता रहा है और कई परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं जो बताते हैं कि एसआईआर में सब ठीक नहीं है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए एसआईआर पूर्ण होने का इंतजार कर रहा है।

इससे पहले की कई खबरों से पता चलता रहा है कि एसआईआर से संबंधित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा और किया है। मुख्य न्यायाधीश के अनुसार, संवैधानिक अदालतें इमरजेंसी वार्ड वाले अस्पतालों की तरह काम करेंगी और एसआईआर तो इमरजेंसी नहीं ही है। बिहार वाले को मान सकते थे लेकिन वहां जो होना था हो चुका। कानूनी इमरजेंसी की स्थिति में, कोई भी नागरिक, चाहे उसकी स्थिति कुछ भी हो, आधी रात को भी एससी के दरवाज़े खटखटा सकता है ताकि अपनी ज़रूरी शिकायत का समाधान और अपने व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रता की सुरक्षा पा सके। इसपर मुझे याद आया कि वर्षों पहले किसी मामले में मेरे एक मित्र की पत्नी की गिरफ्तारी के लिए बिहार पुलिस के कुछ लोग अचनाक उसके घर पहुंचे और अपनी बात रखी तो उसने मुझे फोन किया – इस उम्मीद में कि मैं बिहार पुलिस में किसी को जानता होउंगा तो ले-देकर पुलिस को वापस किया जा सके। तब लीगल इमरजेंसी की ऐसी कोई व्यवस्था थी नहीं तो नागरिक के पास कोई विकल्प ही नहीं था। मैंने पड़ोस में ही रहने वाले अपने दूसरे बिहरी मित्र को फोन किया जो अधिवक्ता है और नई प्रैक्टिस शुरू की थी। उसने वारंट वगैरह तो दूर, यही कहा कि किसी महिला को बगैर महिला पुलिस के कैसे गिरफ्तार किया जा सकता है और मामला टल गया। जाहिर है, कोई पैसे भी नहीं देने पड़े। कोर्ट तक जाने की जहमत भी नहीं उठानी पड़ी। यह इसलिए संभव हो पाया कि पुलिस वाले सामान्य कानूनी जरूरत भी पूरी नहीं करते हैं और नागरिकों को जरा भी हिम्मत नहीं है या कानून का ज्ञान नहीं है। पैसे तो दे ही देते हैं जो गैर कानूनी है।

दिल्ली दंगे के समय मैंने किसी अखबार में एक भी फोटो नहीं देखी जहां कोई दमकल आग बुझा रहा हो। जहां हिंसा हो वहां पुलिस भी हो। जाहिर है, दमकल या अग्निशमन की सुविधा तो पहले से थी, उसका उपयोग नहीं हुआ। फिर भी मुख्य न्यायाधीश की यह पेशकश लीड बनने लायक खबर तो है ही। कोहरा प्रभावित विमान यात्रियों को खाना देने के निर्देश से महत्वपूर्ण भी। मुझे लगता है कि मुख्य न्ययाधीश के नेतृत्व में यह न्यायपालिका की बिल्कुल नई और लोकलुभावन व्यवस्था होगी जिसका मकसद लोकप्रियता हासिल करना भी हो सकता है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, घुसपैठ को बढ़ावा दे रही हैं ममता : शाह। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, पहलगाम, दिल्ली में हमलों का जवाब दें शाह। फ्लैग शीर्षक है, गृहमंत्री की टिप्पणी पर ममता बनर्जी ने साधा निशाना (और पूछा) उपशीर्षक है, अगर घुसपैठिये सिर्फ पश्चिुम बंगाल में हैं तो इन जगहों पर हमले कैसे हुए। इसके साथ अमित शाह का आरोप भी है, भय और भ्रष्टाचार बंगाल की पहचान। कहने की जरूरत नहीं है कि अमित शाह ने कुछ आरोप लगाए हैं तो ममता बनर्जी ने उसका जवाब भी दिया है। मूल आरोप चाहे जैसा हो जवाब में ममता बनर्जी का सवाल गंभीर है। गृहमंत्री को इसका जवाब देना चाहिए। नहीं पता हो तो स्वीकार करना चाहिए और स्वीकार करने की बात करूं तो उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि बांग्लादेश से अगर घुसपैठ हो रही है तो जिम्मेदारी उनकी बहुत ज्यादा है और अगर ममता बनर्जी वाकई घुसपैठ को बढ़ावा दे रही हैं तथा वे कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं तो इस्तीफा दे दें। अगर बंगाल के लिए देश नहीं छोड़ना चाहते हैं तो स्वीकार करें या फिर बंगाल में चुनाव जीतने की कोशिश छोड़ दें। वह भी नहीं कर पाएं तो बंगाल के मामले में जिम्मेदारी से बोलें। इसे गोबरपट्टी के अखबारों और संपादकों को भी समझना चाहिए। उत्तर भारत में हिन्दी अखबार पढ़ने वाले कितने लोग बंगाल में वोटर होंगे और अगर वे इन खबरों से प्रभावित होकर वोट देने भी लगें तो नतीजों में कोई असर शायद ही पड़े। फिर भी, अमित शाह के कारण बंगाल का झगड़ा उत्तर भारत में लड़ा जा रहा है। उत्तर भारत में स्थिति यह है कि एसआईआर के खिलाफ खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है। उड़ीशा से बंगालियों को खदेड़ने की खबर बांग्ला और बंगाल के अखबारों में टेलीग्राफ की तरह छपेगी तो भाजपा कहां जीतने वाली है। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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