संजय श्रीवास्तव-
संयोग से 2-3 दिन पहले ही पेंग्विन से एक किताब मुझे मिली, जिसकी लेखिका दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बड़ी बेटी उपिंदर सिंह है. अशोका यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग में प्रोफेसर. अभी किताब के कुछ पन्ने ही पलटे हैं. उनका परिचय बताता है कि वह देश से लेकर विदेश तक की यूनिवर्सिटी में पढ़ चुकी हैं, पढ़ा चुकी हैं. कई फैलोशिप ले चुकी हैं. रिसर्च कर चुकी हैं. प्राचीन भारत पर कई आयामों से बड़ा काम किया है, तत्कालीन समाज, कल्चर, पॉलिटिक्स, विकास.
कम से कम छह किताबें प्राचीन भारत और एशिया से जुड़े आयामों और संबंधों पर है. मेरे हाथ में जो किताब है, हिंदी में उसका पहली बार अनुवाद करके अभी प्रकाशित किया गया है. अंग्रेजी में लिखी मूल किताब कई साल पहले पब्लिश हो चुकी है. इसका शीर्षक है प्राचीन भारत की अवधारणा- धर्म, राजनीति और पुरातत्व पर निबंध (The IDEA of ANCIENT INDIA).
उपिंदर मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी बेटी हैं. 65 साल की हैं. कई किताबों का संपादन भी कर चुकी हैं. बच्चों के लिए इतिहास से जुड़ी एक किताब लिखी है. जिस किताब के पन्ने मैंने पलटने शुरू किए हैं, उसे उन्होंने अपने माता-पिता गुरशरन कौर और मनमोहन सिंह को समर्पित किया है.
उनके पति अशोक तन्खा भी शिक्षाविद हैं. वह कई दशकों से गहन अनुभवजन्य काम में लगी हुई हैं. समृद्ध शोध करती हैं. गहराई से उन जगहों, विचारों और रिपोर्टों का अध्ययन करती हैं.
उनकी ये किताब दक्षिण एशिया के शुरुआती इतिहास के पुनर्निर्माण में हाल के दृष्टिकोणों और चुनौतियों पर प्रकाश डालती है. ऐसा करते हुए प्राचीन भारत की रोमांचक जटिलताओं को सामने लाती हैं.
भूमिका में लिखती हैं आर्किलॉजी स्रोतों का विश्लेषण उनके लिए खासतौर पर रुचिकर रहा है. चाहे वो अशोक के हों या फिर सांची, मथुरा या नागार्जुनकोंडा के. इसमें वह कृषि में विस्तार, शहरी विकास, सामाजिक परिवर्तन और धार्मिक ताथ सांस्कृतिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलावों को भी देखती हैं, जो मौर्य काल से गुप्त काल के दौरान हो रहे थे. किताब में बहुत सी दुर्लभ तस्वीरें, प्राचीन रेखाचित्र और आंकड़ों से लैस है.
किताब का अध्ययन तो धीरे-धीरे होगा. लेकिन अगर देश के पहले प्रधानमंत्री से अब तक पीएम की संतानों के बारे में जानना भी दिलचस्प है. तकरीबन सभी ने किसी ना किसी क्षेत्र में काम और नाम किया, पहचान बनाई. नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक. सुखद ये है कि मनमोहन सिंह ऐसे प्रधानमंत्री हुए, जिनके घर का माहौल पढ़ने – लिखने और समझने वाला था. लिहाजा उनकी तीनों बेटियों ने शिक्षाविद, इतिहासकार, लेखक से लेकर मानवाधिकारवादी जैसी भूमिकाओं में मुकम्मल मुकाम बनाया.
मनमोहन सिंह में दिखावा नहीं था. बड़बोलापन नहीं था. हल्कापन नहीं था.
उनके निधन पर कतिपय मूढों की टिप्पणियों और आचरण को नजरंदाज कर दें तो ये वही थे जिन्होंने भारत के मध्य वर्ग को हीरो बनाया. उसे समृद्ध बनाया. उसकी जिदंगी को बेहतर किया. अब तो मध्यवर्ग ही सबसे ज्यादा निचुड़ रहा है. उन्होंने इस देश को 90 के दशक में जो टर्नअराउंड किया, उसे हर कोई हर जगह महसूस कर सकता है.
हालांकि मेरे ख्याल से देश में दो ही विजनरी प्रधानमंत्री हुए. एक वो और दूसरे नेहरू लेकिन इस बहस में क्यों जाएं. हां, अंत में ये कहना चाहिए कि मनमोहन ने अपने घर में बच्चों को जो उचित माहौल, आजादी, प्रखरता, सृजनात्मकता दी, वो काबिलेतारीफ है औऱ उनकी बेटियों में देखा जा सकता है.


