लखनऊ के एक प्रमुख अखबार में अपराध संवाददाता के तौर पर तैनात एक छोटे भाई जैसे मित्र, कई साल पहले हजरतगंज में जाम की एक तस्वीर खींच रहे थे। उस तस्वीर को खींचने के दौरान एक गाड़ी से कुछ लोग निकले और उन्होंने, उसका मोबाइल छीन लिया। धमकाने का प्रयास किया। बाद में इस मुद्दे पर काफी हंगामा खड़ा हुआ।
पता चला कि यह गाड़ी माफिया सरगना मुख्तार अंसारी की थी। फोटो जाम की खींची जा रही थी, मुख्तार अंसारी के लोगों ने समझा कि भाई की फोटो खींची जा रही है। बस गुंडई शुरू।
कुछ ऐसा ही माहौल एक बार फिर उत्तर प्रदेश में नजर आ रहा है। बात की जाए आज सुबह की तो समता मूलक चौराहे पर मैंने देखा कि काले रंग की कम से कम 8 से 10 फॉर्च्यूनर गाड़ियां एक के पीछे एक हूटर बजाती हुई जा रही हैं। इस तरह से गाड़ियों में हूटर बजना वैसे तो अलाउ नहीं है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी इसको लेकर आदेश है मगर किसी ट्रैफिक सिपाही की हिम्मत नहीं हुई कि इन गाड़ियों को रोक सके। आम आदमी को दहशत में डालता हुआ यह काफिला गोमती नगर की ओर बढ़ चला।
मैंने पता किया तो पता चला कि शायद पूर्वांचल के एक जिले से विधान परिषद के सदस्य किसी सिंह साहब का यह काफिला है। जो कुछ इसी अंदाज में घूमता है। मैं बहुत कंफर्म नहीं हूं इसलिए उनका नाम नहीं लिख रहा। माना जा रहा है कि बिहार से लेकर पूर्वांचल तक कभी वसूली और अपहरण गिरोह का हिस्सा रहे, एमएलसी साहब अब रसूख के चरमोत्कर्ष पर हैं।
ऐसा तो नहीं है कि कहीं राजनीति और अपराध का जो एक गठजोड़ जिसको संगठित अपराध कहा जाता था, अतीक, मुख्तार, मुन्ना बजरंगी, विकास दुबे के दमन के बाद एक बार फिर से उत्तर प्रदेश में सिर उठा रहा है। जीरो टॉलरेंस वाली सरकार कैसे इस तरह से आम लोगों को दहशत में डालने वाला काफिला अगर राजधानी में मुख्यमंत्री आवास से कुछ दूरी से गुजरेगा तो सवाल तो उठेंगे सरकार को सोचना पड़ेगा कि कहीं एक बार फिर तो हम 1990 से लेकर 2017 वाले दौर में वापसी तो नहीं कर रहे एक बार फिर माफिया और राजनीति का गठजोड़ तो उत्तर प्रदेश में खड़ा नहीं हो रहा।
ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं और संभलने की जरूरत है, सरकार को उसके जिम्मेदारों को। निजाम पुलिस का, रसूख सरकार का और योगी जी के इकबाल का सवाल है।
साभार- ऋषि मिश्र (फेसबुक वॉल से)


