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सियासत

वैलेनटाइंस डे तो नाच-कूद के मनाते हैं लेकिन हिन्दी दिवस मानने पर लोगों के पेट में मरोड़ क्यों होने लगती है

एक साल में 69 दिन को हम विभिन्न दिवसों (इसमें बाज़ार आधारित दिवस मसलन वैलेनटाइंस डे, फादर-मदर आदि दिवस शामिल नहीं हैं) के रूप में मनाते हैं। किसी-किसी महीने तो 10-10 दिवस मना लेते हैं, एक अक्टूबर विश्व प्रौढ़ दिवस मनाते हैं तो इसी दिन रक्तदान दिवस भी है। इन दिवसों को मनाने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है, आपत्ति हो भी क्यों, हम आजाद हैं, जब जाहे तब दिवस जो चाहे वो दिवस मनाये। हम गुलाम थोड़े ही हैं की बर्तानिया सरकार से परमीशन लेनी पड़ेगी। आपत्ति है भी तो इस बात की क़ि जब हिन्दी दिवस मानते हैं लोगों के पेट में मरोड़ क्यों होने लगती है। अरे राष्ट्र भाषा है भाई, एक दिन या सप्ताह/पखवाड़ा दे दिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया।

एक साल में 69 दिन को हम विभिन्न दिवसों (इसमें बाज़ार आधारित दिवस मसलन वैलेनटाइंस डे, फादर-मदर आदि दिवस शामिल नहीं हैं) के रूप में मनाते हैं। किसी-किसी महीने तो 10-10 दिवस मना लेते हैं, एक अक्टूबर विश्व प्रौढ़ दिवस मनाते हैं तो इसी दिन रक्तदान दिवस भी है। इन दिवसों को मनाने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है, आपत्ति हो भी क्यों, हम आजाद हैं, जब जाहे तब दिवस जो चाहे वो दिवस मनाये। हम गुलाम थोड़े ही हैं की बर्तानिया सरकार से परमीशन लेनी पड़ेगी। आपत्ति है भी तो इस बात की क़ि जब हिन्दी दिवस मानते हैं लोगों के पेट में मरोड़ क्यों होने लगती है। अरे राष्ट्र भाषा है भाई, एक दिन या सप्ताह/पखवाड़ा दे दिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया।

बात मुद्दे की, हिन्दी दिवस कब आता है अब यह बताने जरूरत नहीं रही, कई सदी से यह आ रहा है और आता रहेगा, हम मनाते रहे हैं और मनाते रहेंगे। क्योंकि हम बहुत सी चीजों के आदी हो गए हैं, तो एक यह भी सही। वैसे जब आपका बच्चा हिन्दी पर निबंध लिखने के लिए रिरियाने लगे तो समझ जाईये कि हिन्दी दिवस आने वाला है। बच्चा न भी रिरियाए तो बैंक और बीमा कम्पनियों में लटके बैनर और दीवारों पर चिपकाए गए सालाना स्लोगन (उपदेश) याद दिला देंगे।

सूत्रों (बिना इस वाक्य के कोई खबर पूरी नहीं होती) ने बताया क़ि सरकारी कार्यालयों, बैंकों, बीमा कम्पनियों और स्कूलों में तैयारियां युद्धस्तर पर चल रही हैं, हर अधिकारी अपने मातहत क़ि पेच कास रहा है.. “ऊपर” से आये संदेशों को नीचे तक पहुंचाया जा रहा है।

अधिकारियों ने हिन्दी में दखल रखने क़ि मान-मनुव्वल शोरू कर दी है। आलमारी से हिन्दी के कवि-लेखकों की झाड़-पोंछकर निकाल ली गयी है। हरकारों (अब हिन्दी के साहित्यकार हैं तो सूचना के अत्याधुनिक संसाधन तो इनके पास होते नहीं) से निमंत्रण भिजवाये जा रहे हैं। चमचे अधिकारियों के लिए भाषण लिखने में जुट गए हैं। साल भर अंगरेजी में डांट पिलाने वाला अधिकारी भी एक दिन, एक सप्ताह या एक पखवाड़ा अपने मातहतों से हिन्दी बोलेगा वो भी निखालिस। किसी ने सच ही कहा है कि घूर (जहां कूड़ा डाला जाता है) के दिन भी एक दिन फिरते है यह तो हमारी प्यारी भाषा है, राष्ट्रीय भाषा है। अच्छा है कि आज भारतेंदु जी नहीं हैं नहीं तो उन्हें खुद अपने लिखे ” निज भाषा उन्नति अहै…. ” पर दुःख होता।

 

अरुण श्रीवास्तव 

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