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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार का दर्द : क्या मैं हमेशा जी-हुजूरी करने वालों के बीच ही जिंदा रहने को अभिशप्त हूं?

चंद्र भूषण-

हामी भरना एक बीमारी है… ‘नहीं’ कहें और डटे रहें

छात्र जीवन में एक पीड़ादायी स्थिति का सामना मुझे कई बार करना पड़ा। अपनी उलझन सुलझाने के लिए क्लास में जब भी टीचर से मैं कोई असुविधाजनक सवाल करता था, पूरी क्लास एक सुर से मेरे खिलाफ बोलने लगती थी। बाद में दोस्तों से कहता कि किस तरह मेरा सवाल हम सभी के लिए फायदेमंद हो सकता था। जो समझ हम क्लास में बना सकते थे, वह नहीं बन पाई। मित्र मान भी लेते, लेकिन यह कहते हुए कि सर का मूड देखकर हमें लगा कि अभी तो तुम्हारा बैठ जाना ही ठीक रहेगा।

धीरे-धीरे मैंने खुद को यह समझा लिया कि क्लास में अकेला टीचर ही एडल्ट है, बाकी सब बच्चे हैं। बाद में, बड़े हो जाने पर स्थिति ऐसी नहीं रहेगी, सब ठीक हो जाएगा। लेकिन देखते-देखते उम्र गुजर गई, कहीं कुछ भी ठीक नहीं हुआ। किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेताओं या अफसरों से कोई मुश्किल सवाल पूछने पर जवाबदेह व्यक्ति से ज्यादा विरोध मुझे पत्रकारों का ही झेलना पड़ा। दो मौके ऐसे भी आए, जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही किसी न किसी पत्रकार से मारपीट की नौबत आ गई। मौका एक बार 1990 में दिल्ली में अशोक सिंघल (वीएचपी) की पीसी का था, दूसरी बार 1994 में श्रीनगर (गढ़वाल) में उत्तराखंड आंदोलन के समय पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा की प्रेस वार्ता का।

देश का तो छोड़िए, विदेश में भी कमोबेश ऐसा ही हाल दिखा, जब स्वदेशी पत्रकार बंधुओं को मेरा किसी से सवाल पूछना बुरा लगा। मार्च 1991 में पहले संसदीय चुनाव के समय नेपाल में और जुलाई 2015 में चीन में इसी तरह का सीन दोहराया गया। वहां ‘हिन्दू’ जैसे प्रतिष्ठित अखबार के पेइचिंग करेस्पांडेंट को मेरी प्रश्नाकुलता से बड़ी समस्या हुई। साथियों की ऐसी आक्रामकता तो कभी क्लास में भी नहीं दिखती थी। वहां टीचर खुश रहता तो प्रैक्टिकल और घरेलू इम्तहानों में दो-चार नंबर बढ़ सकते थे। यहां तो नेता-अफसर को खुश रखना मान-प्रतिष्ठा और पैसे-प्रॉपर्टी का भी सबब बन सकता है!

कभी-कभी लगता है, क्या मैं हमेशा जी-हुजूरी करने वालों के बीच ही जिंदा रहने को अभिशप्त हूं? यह भी कि यह मेरे खास माहौल या पेशे से जुड़ी परेशानी है, या मेरे देश में लोगों का सहज व्यक्तित्व ही ऐसा है? इस सवाल से जूझते हुए कुछ समय पहले मेरा साबका ‘मिलग्राम एक्सपेरिमेंट’ से पड़ा। 1960 के दशक में सोशल एंड एब्नॉर्मल सायकॉलजी से जुड़ा यह अमरीकी प्रयोग ‘कन्फॉर्मिज्म’ (सत्ता का अनुसरण करने, उसकी लल्लो-चप्पो करने की प्रवृत्ति) को समझने के लिए किया गया था।

प्रयोग का स्वरूप यह था कि कुछ लोगों को उनकी मर्जी से अलग अलग जगहों पर बंद कर दिया गया और अन्य लोगों को नुकसान पहुंचाने या उनकी चुगलखोरी करने के एवज में उन्हें कुछ-कुछ रियायतों का आश्वासन दिया गया। इस प्रयोग के बारे में, खासकर मानव स्वभाव को लेकर इससे निकाले गए निष्कर्षों के बारे में आप इंटरनेट पर पढ़ सकते हैं। पाया गया कि शहजोर की मुंहदेखी बतियाना न सिर्फ पूरी दुनिया में मानव जाति की सहज वृत्ति है, बल्कि करीब दो तिहाई लोग तो इसके झोंके में बिना खास फायदे के भी किसी इंसान की जान लेने की हद तक जा सकते हैं।

क्या अमेरिकी, क्या चीनी, क्या हिंदुस्तानी और क्या अफ्रीकी, सब इस मामले में बिल्कुल एक से हैं। पेड़ों पर उछलकूद के जमाने से शायद हम ऐसे ही चले आ रहे हैं। जबरा की जीहुजूरी में सुरक्षा का अनुभव करने वाले। अभी, जब सत्ताएं दुनिया में हर जगह इतनी बहुविध और सर्वव्यापी हो गई हैं, तब खुद के कन्फॉर्मिज्म को लेकर सचेत रहना, हमेशा हां ही न बोलना, जब जरूरी लगे तब नहीं कहने की भी हिम्मत जुटाना, इसके लिए नुकसान झेलने को तैयार रहना फिलहाल हम सबके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। कवि गोरख पांडे अपनी एक कविता में जैसा कहते हैं- ‘नहीं नहीं तो जीने का प्रण नहीं’।

लेखक नवभारत टाइम्स के फीचर एडिटर रह चुके हैं.

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1 Comment

1 Comment

  1. Asif

    February 25, 2026 at 10:43 am

    आप सवाल नहीं करते होंगे, बहस करते होंगे और जिन्हें गुस्सा आता है उनका समय किल करते होंगे

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