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आज के अखबार : विशेष सत्र की जगह 21 जुलाई से मानसून सत्र, मांग पूरी करने का ऑपरेशन सिन्दूर!

संजय कुमार सिंह

मैंने कल यहां बताया था कि विपक्ष ने संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की थी लेकिन ज्यादातर अखबारों ने उस खबर को नहीं छापा। आज दि एशियन एज में खबर है कि सरकार ने 21 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र की घोषणा अभी ही कर दी है। जाहिर है, यह विशेष सत्र की मांग से बचने का भाजपाई तरीका है पर खबर तो है ही। आज इस खबर को अखबारों में आम तौर पर महत्व नहीं दिया गया है। सिर्फ मानसून सत्र 21 जुलाई से बताया गया है जबकि यह कोई खबर नहीं है। सबको पता है कि उस समय संसद का मानसून सत्र होता ही है। इस बार की खासियत है कि घोषणा पहले कर दी गई है या विशेष सत्र की मांग पर की गई है। सरकार और मीडिया ने मिलकर इस खबर की हत्या कर दी। ना विशेष सत्र की मांग दर्ज हुई ना मांग नहीं मानने की खबर। उल्टे मांग को कमजोर करने के लिए मानसून सत्र की घोषणा पहले कर दी गई और मांग पूरी करने का ऑपरेशन सिन्दूर पूरा हो गया। आज खबर यह थी कि विशेष सत्र की मांग पर मानसून सत्र की घोषणा पहले कर दी गई। पर खबर यह छपी है कि मानसून सत्र 21 जुलाई से है।

आप जानते हैं कि सरकार अदालतों (सर्वोच्च न्यायालय) को भी नियंत्रण में लेने की कोशिश करती रही है। इसके लिए न्यायाधीशों के चयन के कॉलेजियम सिस्टम की खामियों और उसकी वजह से होने वाली गड़बड़ियों को प्रचारित किया ही जाता रहा है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है कि देश के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा है कि कॉलेजियम सिस्टम में सुधार न्यायिक स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं हो सकती है। नरेन्द्र मोदी की सरकार में चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस से लेकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगई पर आरोप और उस पर हुई कार्रवाई और फिर उन्हें मिला ईनाम, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के घर प्रधानमंत्री का पूजा करने जाना और फिर उसका प्रचार, दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के घर में आग लगने पर नोटों का जखीरा मिलना, उसपर आवश्यक कार्रवाई नहीं होना, इसलिए जांच नहीं हो पाना और कई दिनों तक खबर का नहीं छपना, जज का यह कहना कि पैसे उनके नहीं हैं, उसे नहीं माना जाना और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का सरकारी प्रयास बताता है कि सरकार और न्यायपालिका में संघर्ष चल रहा है। यह इससे भी साफ है कि सरकार के खिलाफ मामलों में फैसला होने में कितना समय लगता है, कैसे तारीख पड़ती है, क्या दलीलें दी जाती रही हैं और कैसे समय पर फैसले नहीं होते हैं। बाद में क्या दलीलें दी गई हैं। वह सब मेरा विषय नहीं है और उसपर एक किताब हो सकती है लेकिन किताब इंडिया@100 छपी और मुफ्त में बंटने जा रही है (थी)।     

इस लिहाज से मुख्य न्यायाधीश का पहले ही यह कह देना कि वे रिटायर होने के बाद सरकारी पद नहीं लेंगे और अब न्यायिक स्वतंत्रता की बात करना, अपने आप में बड़ी खबर है लेकिन इसे वो महत्व नहीं मिला है जो मिलना चाहिये। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से बयानों से इसे हवा मिली है। यूके सुप्रीम कोर्ट में एक राउंड टेबल में मुख्य न्यायाधीश ने बहुत सारी गंभीर बातें की हैं पर आज अखबारों में उसे वह प्रमुखता नहीं मिली है। टाइम्स ऑफ इंडिया अपवाद है जिसने बताया है कि मुख्य न्यायाधीश ने जजों के चुनाव लड़ने और रिटायरमेंट के बाद सरकारी पद लेने की आलोचना की और यह भी कहा कि जजों के रिश्वत लेने की खबरों से न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा प्रभावित होता है। बेशक मुख्य न्यायाधीश का यह सब कहना महत्वपूर्ण है और बड़ी खबर है पर पहले पन्ने पर नहीं है क्योंकि सरकार के अनुकूल नहीं है। या सरकार की दिलचस्पी नहीं है। दूसरी ओर, सरकार कई साल के हजारों करोड़ के बकाया या भुगतान न करने या गलत गणना करने के नोटिस भेजती रहती है जिसे अदालतों में चुनौती दी जाती है और फिर रिश्वत लेने-देने की गुंजाइश बनती है। हमारे देश में जब छोटी राशि की भी रिश्वत ली-दी जाती है तो बड़े मामलों में रोकना मुश्किल है और इसकी ठोस व्यवस्था होनी चाहिये लेकिन सरकार ही जजों को ईनाम देगी तो यह सब रोकना निश्चित रूप से मुश्किल है और उसके लिए किसी एक सिस्टम को दोषी ठहराना, उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति तक की रोजनीति में घसीट लेना या उनका उतर आना चिन्ताजनक है। मुख्य न्यायाधीश इसपर ध्यान दे रहे हैं तो यह प्रशंसनीय है लेकिन खबर? 

आज द हिन्दू, दि एशियन एज, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड या सेकेंड लीड तथा द टेलीग्राफ, नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम में एक खबर है, जनगणना अप्रैल 2026 में शुरू होगी, जाति इस सर्वेक्षण का भाग होगी (टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक)। इस खबर की खासियत यह है कि जनगणना 2020-21 में होनी चाहिये थी। कोविड के कारण समय पर नहीं हो पाई। अब यह अनुमान है कि अप्रैल में शुरू होकर 1 मार्च 2027 की गणना मालूम और दर्ज हो जायेगी। इसलिए खबर यह नहीं है कि जनगणना अप्रैल 2026 में शुरू होगी या मार्च में नतीजे मिलने की उम्मीद है। खबर यह है कि जो जनगणना 2021 में हो जानी चाहिये थी वह 2026 में शुरू होगी। खबर यह भी है कि इसके साथ जाति जनगणना होगी। आइये अब इस खबर की प्रस्तुति यानी शीर्षक देख लीजिये। 1) अमर उजाला – देश में एक मार्च, 2027 से पहली बार होगी जाति आधारित जनगणना। उपशीर्षक है, 16 जून को अधिसूचना जारी होगी (फिर खबर लीड बनेगी), तीन साल में प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद। 2) नवोदय टाइम्स – जनगणना-2027 दो चरणों में होगी 3) इंडियन एक्सप्रेस – लंबा इंतजार खत्म हुआ, जनगणना मार्च 2027 तक, जाति जनगणना भी शामिल होगी। 4) द टेलीग्राफ – सरकार ने चरणों में जनगणना, जाति गणना की घोषणा की।  5) हिन्दुस्तान टाइम्स – आखिर सरकार ने लंबे समय से लंबित जनगणना की घोषणा की (खबर यही है)। 6) द हिन्दू – सरकार ने कहा, अगली जनगणना मार्च 2027 तक पूरी हो जायेगी। 7) दि एशियन एज ज्यादातर भारत में जनसंख्या, जातिवार जनगणना मार्च 2027 में होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी ने शीर्षक में यह नहीं कहा है कि पहले से ही देर जनगणना का काम मार्च 2027 में पूरा होगा और 2030-31 में फिर होना होगा या होना चाहिये। सभी शीर्षक बिना कहे यही बताते हैं कि सरकार अपना काम कर रही है और वह ऑपरेशन सिन्दूर या ऐसे उपायों से सिर्फ चुनाव जीतने की कोशिश में नहीं है।   

आज जब मुख्य न्यायाधीश वाली खबर कई जगह नहीं है और यह मेरे हिसाब से देश व पाठकों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है तब उसे छोड़कर अमर उजाला ने पहले पन्ने पर चार कॉलम में जो बॉटम छापा है उसका शीर्षक है, बोलने की आजादी, सेना को अपमानित करने की नहीं। यह इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी है और राहुल गांधी के खिलाफ है। अदालत के फैसले से मेरा कोई संबंध नहीं है और ना मैं उसपर टिप्पणी कर रहा हूं लेकिन यह पहले पन्ने की खबर कैसे हो सकती है जब तीन साल पहले राहुल गांधी ने जो कहा था उसपर किये गये मानहानि के मामले को चुनौती देने वाली राहुल गांधी की याचिका पर टिप्पणी है। जाहिर है, सेना को अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं है और ताजा मामला मध्य प्रदेश के एक मंत्री का है। उसकी खबर नहीं देने या काट छांट कर या अंदर के पन्ने पर देने वाले अखबार ने इसे पहले पन्ने पर छापा है क्योंकि खबर के अनुसार राहुल गांधी ने कहा था, हमारा मीडिया इस संबंध में कोई सवाल नहीं पूछेगा। मुख्य खबर के साथ छपी खबर – बार-बार कहा, हमारे सैनिकों को पीट रही है चीन की सेना। जाहिर है, राहुल गांधी कहना कुछ चाहते थे और उसे मीडिया ने अलग मोड़ दिया है। मैं यही कहना चाहता हूं कि राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी (भाजपा कहना चाहिये) के मामले में मीडिया का रुख दोहरा है। राहुल गांधी ने मीडिया की आलोचना की इसलिए हाईकोर्ट की टिप्पणी को प्रमुखता दी गई लेकिन मीडिया यह नहीं पूछेगा कि मध्य प्रदेश की पुलिस ने सेना का अपमान करने वाले राज्य के मंत्री के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की या भाजपा के किसी नेता ने अपने मंत्री की आलोचना क्यों नहीं की है या की भी है क्या? भाजपा के मंत्री के खिलाफ किसी नागरिक ने मानहानि का मुकदमा दायर किया है क्या या नहीं किया है तो क्या वह सेना की तौहीन नहीं है? सेना की तौहीन सिर्फ राहुल गांधी ने की है और वही करते हैं?

भारतीय व्यवस्था की यह विडंबना है कि चीन ने भारतीय सैनिकों को पीटा उनकी मौत हो गई और सरकार ने कह दिया, ना कोई घुसा है ना घुसा हुआ है। राहुल गांधी ने कहा कि मीडिया इसपर सवाल नहीं उठायेगा तो मुकदमा यह हो गया कि उन्होंने सेना का अपमान किया है। मैं नहीं जानता यह बात उन्होंने कैसे कही थी लेकिन हंसते हुए बुरी बात कहने वाले सरकारी पार्टी के नेता को राहत मिली है और जब जज चुनाव लड़ेंगे, ईनाम पायेंगे तो यह सब होगा ही। मुद्दा यह था कि अखबार वाले इसे रेखांकित करेंगे तो वो कुछ और कर रहे हैं। कोई विज्ञापन के लिए कोई नजर में आने के लिए कोई ठेके के लिए कोई सम्मान के लिए और वही देश भक्त हैं।  

जीएसटी वसूली और जबरदस्ती

हिन्दुस्तान टाइम्स में आज छपी खबर के अनुसार जीएसटी कौंसिल 12 प्रतिशत की दर खत्म करने के बारे में विचार कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो नतीजा यह होगा कि दो ही स्लैब बचेंगे 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत। अखबार में 12 प्रतिशत टैक्स वाले कुछ सामानों के नाम हैं और ज्यादातर खाने की चीजें हैं। इन्हें पांच प्रतिशत में कर दिया जाये तो ये चीजें सस्ती हो जायेंगी और गौरतलब है कि इनपर अभी तक सरकार 12 प्रतिशत टैक्स ले रही थी। कहने की जरूरत नहीं है कि जरूरी और आम उपयोग की चीजों पर टैक्स कम होना चाहिये और विलासिता की गैर जरूरी चीजों पर टैक्स ज्यादा हो सकता है। इन दिनों मैं बहुमंजिली इमारतों में लगने वाली लिफ्ट से संबंधित काम कर रहा हूं तो पता चला कि इसपर 18 प्रतिशत टैक्स है। नया खरीदना हो या पुराने के रख-रखाव की कथित सेवा एएमसी हो, सरकार को 18 प्रतिशत टैक्स चाहिये। बहुमंजिली इमारतों में लिफ्ट जरूरी है और इसपर 18 प्रतिशत टैक्स सरकारी मनमानी और लूट के सिवा कुछ नहीं है। यही नहीं, एएमसी पर भी 18 प्रतिशत टैक्स का क्या मतलब है। वह तो शून्य होना चाहिये। क्या लिफ्ट खरीदने के बाद उसे मेनटेन नहीं किया जाये तो चलेगी? एएमसी तो जरूरी से भी जरूरी है। फिर भी उसपर 18 प्रतिशत टैक्स है और सरकार हर महीने प्रचार करती है कि इस महीने की वसूली इतनी हुई। पिछले महीने से ज्यादा हुई आदि आदि। असल में सरकार इसके जरिये यह दिखाना चाहती है कि अर्थव्यवस्था अच्छी है इसलिए टैक्स ज्यादा आ रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि लोगों से जबरन वसूली हो रही है और सबसे दिलचस्प है, बैंक कर्ज की ईएमआई नहीं दीजिये तो पेनाल्टी पर जीएसटी और न्यूनतम बैलेंस न रखिये तो पेनाल्टी और उसपर भी जीएसटी। फिर भी सरकार अपनी पीठ ठोंकती है और अखबार चार कॉलम की खबर छापकर प्रचार करते हैं कि वसूली बढ़ गई। जो असल में खून चूसना है।

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