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आज के अखबार : वोट बैंक साधने के दूसरों के तरीके का प्रचार अपनी वाली अघोषित इमरजेंसी पर चर्चा भी नहीं!

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों का पहला पन्ना देखकर समझ में नहीं आया कि क्या लिखा जाये। असल में ज्यादातर अखबारों में कायदे की कोई खबर नहीं है। हालांकि मामला इतना सीधा भी नहीं है। असल में मैं यहां यही बताने की कोशिश करता हूं कि ज्यादातर अखबार अक्सर अपने पाठकों की राजनीतिक चेतना को खत्म करने और इरादतन या परिस्थितिवश सरकार की सेवा में लगे हैं। जो स्वतंत्र या सरकार के खिलाफ हैं वे वैसे ही हैं। हालांकि, वहां भी किसी-किसी दिन सरकार का समर्थन दिख ही जाता है। किसी का नाम लेने की जरूरत नहीं है – यह खबरों के चयन और उनकी प्राथमिकता से पता चलता रहता है। आइये, आज अपने आठों अखबारों की लीड की बात करें और इसी से यह समझने की कोशिश करते हैं कि अखबारों में सरकार का समर्थन हावी है। यह स्थिति अखबारों या मीडिया में ही नहीं है सोशल मीडिया पर भी सरकार का जबरदस्त समर्थन चल रहा है। आप जानते हैं कि सोशल मीडिया पर प्रचारकों की पूरी सेना है और वह सरकार का प्रचार या विरोधियों को दबाने के लिए ऐसे तरीके भी अपनाती है जो मीडिया नहीं कर सकता है। हाल में इसका उपयोग तब दिखा जब भारतीय जनता पार्टी को घर-घर सिन्दूर पहुंचाने का अपना अभियान टालना पड़ा। मैं शुरू से कह रहा हूं कि ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ नाम ही चुनावी लाभ के लिए रखा गया लगता है। बाद में यह साबित हो चला और फिर घर-घर सिन्दूर पहुंचाने की खबर या योजना का विरोध हुआ तो भाजपा ने जिस ढंग से पलटी मारी वह ऐतिहासिक है। कई दिन बाद खबर को फेक कहा गया और प्रतिक्रिया के कई घंटे बाद ख्याल आया कि कथित फेक न्यूज से गलत संदेश जा रहा है। यहां मेरा मकसद उसे विशेष पत्रकरिता पर लिखना या उसकी पोल खोलना नहीं, उसकी याद दिलाना भर है।

कुल मिलाकर, वास्तविकता यह है कि ऑपरेशन सिन्दूर का राजनीतिक लाभ लेने की सरकारी कोशिशों का विरोध तो छोड़िये, उसकी चर्चा भी ढंग से नहीं है और हो भी कैसे जब सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता ऑनलाइन गाली देने लगें और एंकर प्रवक्ता से आगे बढ़कर पार्टी का पक्ष लें। ऐसी हालत में जिन मुद्दों पर बात होनी चाहिये वो नहीं होती है। ऑपरेशन सिन्दूर या युद्ध के बाद विपक्ष मांग कर रहा है कि संसद का विशेष सत्र बुलाया जाये तो वह नहीं हो रहा है। उसकी चर्चा भी नहीं है कि सरकार को बुलाना चाहिये या नहीं या क्यों नहीं बुलाना चाहिये। दूसरी ओर, चर्चा इमरजेंसी की सालगिरह पर विशेष सत्र या आयोजन की है। जयराम रमेश ने यही कहा है कि अभी के मुद्दों पर तो चर्चा नहीं हो रही है लेकिन 50 साल पहले की इमरजेंसी की चर्चा होगी और इमरजेंसी की ही चर्चा होनी है तो अघोषित इमरजेंसी की भी चर्चा होनी चाहिये। मुझे नहीं लगता है कि जयराम रमेश किसी भी तरह से गलत हैं और गलत होते तो सरकार को परेशानी भी क्यों होती। उसे परेशानी इसीलिए है कि जयराम रमेश ने जो कहा है वह सही है और अघोषित इमरजेंसी की बात हवा-हवाई नहीं है। इसपर 2020 में ही किताब आ चुकी है और जब हम जानते हैं कि यह सरकार अपने पक्ष में किताबों का प्रचार करती है और खिलाफ हो सकने वाली को रोका भी है। ऐसे में जिसे नहीं रोका गया उसे मुद्दा क्यों नहीं माना जाये? सरकार या भाजपा की समस्या यह है कि वह अपने काम से तो चुनाव जीतती नहीं है उसे पुलवामा जैसे मुद्दे चाहिये। नरेन्द्र मोदी को घुस कर मारूंगा जैसी बातें करने के लिए मौका और बहाना चाहिये फिर चुनाव आयोग की मदद से ईवीएम और मतदाता सूची से जो खेल होगा उसे इस रणनीति की कामयाबी माना जा सकेगा।

मुझे लगता है कि यह बताना और नागरिकों के समझना जरूरी है कि नरेन्द्र मोदी ऑपरेशन सिन्दूर जैसे मुद्दों से चुनाव भले जीत जायें, देश और नागरिकों का भला नहीं हो रहा है। अगर हो रहा होता तो उसकी बात होती। मीडिया पर नियंत्रण की क्या जरूरत थी। कांग्रेस की सरकार ‘भ्रष्ट’ होकर भी स्वतंत्र मीडिया के बावजूद चुनाव जीत जाती थी तो विश्व गुरु को मीडिया को नियंत्रण में रखने की जरूरत क्यों है खासकर तब जब उनकी योग्यता और ईमानदारी के झंडे दुनिया भर में लहरा रहे हैं। सच्चाई यह है कि इंदिरा गांधी जरा सी सरकारी सहायता के लिए मुकदमा हार गई थीं और अब इलेक्टोरल बांड से लेकर अनिल मसीह जैसे अधिकारी और ईवीएम के खिलाफ शिकायतों की जांच ही नहीं होती है। सुप्रीम कोर्ट को भी दबाव में लेने के लिए उसकी आलोचना की जाती रही है। जजों को ईनाम देने के मामले तो हैं ही। कहने की जरूरत नहीं है कि पद्म पुरस्कार विजेता सरकार के गुनगान कर रहे हैं और कांग्रेस सरकार पर आरोप लगता था कि वह समर्थकों को सम्मानित करती है। एक साल में पांच भारत रत्न बांटने का रिकार्ड बना और उसके चुनावी गणित पर बात ही नहीं हुई। वैसे ही जैसे ऑपरेशन सिन्दूर पर नहीं हो रही है। दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी इसके लिए परेशान हैं और घर-घर सिन्दूर भेजने की योजना के भारी विरोध के बावजूद ऑपरेशन सिंदूर का राजनीतिक नैरिटव बनाने के लिए बड़ी मेहनत कर रहे हैं। वैसे भी, नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार हर समय चुनावी मोड में रहती है। अपने वोट बैंक की रक्षा में जुटी है, झूठ-सच कुछ भी बोलती-करती है लेकिन आलोचना ममता बनर्जी की क्योंकि उन्हें हराना है। अपनी इन्हीं ताकतों और रणनीतिकारों से भाजपा दिल्ली में आम आदमी पार्टी को हरा चुकी है।    

अजीत द्विवदी ने आज नया इंडिया में लिखा है, …. उन्होंने (प्रधानमंत्री ने) देश का तूफानी दौरा किया है। हरियाणा से लेकर राजस्थान और फिर गुजरात से लेकर बिहार, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के उन्होंने दौरे किए हैं। सोचें, अभी सिर्फ बिहार में विधानसभा चुनाव है। लेकिन प्रधानमंत्री देश का दौरा कर रहे हैं और हर जगह लोगों के दिल दिमाग में ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान के खिलाफ मिली निर्णायक जीत का नैरेटिव स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने ‘गोली का जवाब गोले से देने’, ‘घर में घुस कर मारने’, ‘बिल से खींच कर मारने’ जैसे डायलॉग्स भी बोले। ध्यान रहे सैन्य अभियान पर राजनीतिक विमर्श स्थापित करना हमेशा आसान होता है। परंतु इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रास्ते में पहले दिन से बाधाएं आ रही हैं और अब तीनों सेनाओं के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान की इस स्वीकारोक्ति ने कि, पाकिस्तान के साथ संघर्ष के पहले दिन भारत ने भी अपने लड़ाकू विमान खोए, उनके अभियान को और मुश्किल बना दिया है। जनरल चौहान के बयान ने पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा मशीनरी को बिना मांगे एक बड़ी जीत दे दी है और भारत में बन रहे राजनीतिक विमर्श को कमजोर कर दिया है। अभी तक ऑपरेशन सिंदूर का राजनीतिक विमर्श बनाने के रास्ते की एक बड़ी बाधा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दिख रहे थे। वे 10 मई से लगातार दावा कर रहे हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराई। उन्होंने यहां तक कहा कि व्यापार रोकने की धमकी देकर उन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देशों को युद्ध रोकने के लिए कहा। ट्रंप प्रशासन ने वहां की एक अदालत में हलफनामा देकर यह बात कही है कि ट्रंप की टैरिफ लगाने की असीमित क्षमता ने दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों का युद्ध रूकवाया अन्यथा लाखों लोगों की जान जा सकती थी।

जाहिर है, यह बात तो नरेन्द्र मोदी भी जानते हैं और इसीलिए मौका मिलते ही युद्ध विराम के लिए तैयार हो गये और यह मिलीभगत न भी हो तो यह नहीं सोचा गया होगा कि राहत महसूस करने की बजाय लोग युद्ध विराम पर भी सवाल करेंगे। जाहिर है राजनीति औरों को भी आती है और मामला उलझ सा गया है और चूंकि कोई रोकने-देखने वाला नहीं है इसलिए वे भले बच जायें और साफ फायदा उठा लें पर इसमें मीडिया की भूमिका कौन नहीं समझता है। मेरी चिन्ता सिर्फ मीडिया की भूमिका है। खासकर तब जब सब बिल्कुल स्पष्ट हो चला है। आज की खबरों और कुछ पुरानी खबरों से जाहिर है कि देश में जान-माल की सुरक्षा की कहीं कोई गारंटी नहीं है। दूसरे शब्दों में किसी की कहीं भी किसी भी कारण से जान जा सकती है। ऐसा अगर पहले भी होता हो तो 11 साल में कम नहीं हुआ है। डबल, ट्रिपल इंजन की सरकारों के बावजूद। आज के मेरे आठ अखबारों की लीड और उनके शीर्षक इस प्रकार हैं 

1. द टेलीग्राफ – सिक्किम के हादसे में सैनिक मरे

2. द हिन्दू – बारिश की आपदा में सिक्किम के भूस्खलन ने तीन सैनिकों की जान ली

3. दि एशियन एज – प्रधानमंत्री बुधवार को सभी मंत्रियों से मिलेंगे, अगले हफ्ते सांसदों की सात टीम से वार्ता करेंगे 

4. हिन्दुस्तान टाइम्स –  प्रधानमंत्री अगले हफ्ते विश्व दौरे के बाद प्रतिनिधि मंडल  से मिलेंगे

5. टाइम्स ऑफ इंडिया – पाकिस्तानी पंजाब के स्पीकर ने एक रैली में पहलगाम के हमलावरों का समर्थन किया

6. इंडियन एक्सप्रेस – मंत्री ने कहा टेस्ला भारत में निर्माण की उत्सुक नहीं

7. नवोदय टाइम्स – रूस के छोटे परमाणु हथियार बड़ा खतरा

8. अमर उजाला – जेईई एडवांस्ड के नतीजे –  समग्र कटऑफ 109 से घटकर 74 पहुंचा

स्पष्ट है कि प्राकृतिक आपदा में ही सही, सैनिकों की मौत बड़ा मामला है लेकिन दो ही अखबारों ने उसे लीड बनाया है और ये दोनों अखबार वो नहीं हैं जो सरकार के समर्थन में देश भक्ति का माहौल बनाने के लिए आगे रहते हैं। सैनिकों की मौत देश भक्ति का मामला है लेकिन सरकार ने इसे भुनाने की जरूरत नहीं समझी, सामान्य अफसोस भी नहीं है तो इसे महत्व क्यों देना। भले ही खबर अपने आप में महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री अपने मंत्रियों से मिलेंगे, टीम के सदस्यों से बात करेंगे यह कैसे इतनी बड़ी खबर हो सकती है कि लीड बन जाये। वह भी तब जब मिलने का कारण या जरूरत बहुत महत्वपूर्ण चर्चित या जनहित वाला नहीं है। इसी तरह सरकारी खर्चे पर सरकार के प्रचार या छवि निर्माण के लिए विदेश भेजे गये सांसदों के वापस आने पर उनसे बात करने के लिए मिलेंगे तो अपनी और पार्टी की ही राजनीति करेंगे उसमें देश सेवा या देशवासियों के लिए काम इतना ही है कि इसके जरिये फिर अगला चुनाव जीतने की कोशिश हो रही है। पहलगाम की घटना के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराकर ऑपरेशन सिन्दूर छेड़ देने भर से पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जरूरी और जायज नहीं हो जायेगा। यह सरकार का निर्णय था तो सबने साथ दिया पर सरकार युद्ध भी नहीं कर पाई। अचानक रोक देने का कारण नहीं बता रही है और टाइम्स ऑफ इंडिया इस खबर को लीड छाप कर यह बता रहा है कि सरकार ने जो किया ठीक था। पर गलत किसने कहा? और क्या अमेरिका के कहने पर या कोई नतीजा पाये बगैर युद्ध रोक देने का कारण बताने की जरूरत नहीं है। अखबार कारण पूछने की बजाय युद्ध को जरूरी बताने की खबर छापकर सरकार की सहायता कर रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड मंत्री का बयान और सरकारी प्रचार ही है। टेसला भारत में निर्माम नहीं कर रहा है तो उसके घोषित-अघोषित कारण होंगे जो नहीं बताया गया है। यह तो नहीं हो सकता है कि सरकार ने उसे अनुमति नहीं दी हो और मंत्री जी ने यही घोषणा की हो कि हमने देश हित में टेसला को भारत में प्लांट लगाने की अनुमति नहीं दी। नवोदय टाइम्स परमाणु हथियार को खतरा बता रहा है जो होना ही है लेकिन राहुल गांधी बता चुके हैं कि चीन में बने ड्रोन युद्ध में कितने खतरनाक हो सकते हैं। वह इस युद्ध में दिखा भी। उसके बारे में बताना सरकार के हित में नहीं है तो रूस का परमाणु हथियार ही सही। अमर उजाला की खबर विवाद में पड़ने से दूर, समाज का हाल बताने वाली है।   

यह सब तब जब इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, गुजरात सरकार कच्छ में पाकिस्तान सीमा के पास ऑपरेशन सिन्दूर मेमोरियल पार्क की योजना बना रही है। खबर के अनुसार, इसमें पहलगाम आतंकी हिंसा के पीड़ितों के लिए समर्पित जगह भी होगी। पता नहीं, पुलवामा के पीड़ितों के लिए ऐसा कोई स्मारक पुलवामा में या कहीं और है कि नहीं। घुस कर मारूंगा का डर हम देख चुके हैं और तथ्य है कि पुलवामा के बाद पहलगाम हुआ तथा दोनों का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश चल रही है पर जांच और कार्रवाई के मामले में कोई चर्चा भले न हो सबको पता है कि कुछ नहीं हुआ है। अगर कुछ हुआ है तो वह इतना नहीं है कि इस बार युद्ध ही छेड़ दिया जाता। आज एक और बड़ी खबर है, जो टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रमुखता से छपी है कि दिल्ली पुलिस के लोधी रोड थाने से करोड़ों की नकदी और जेवर गायब है। इस मामले में एक हेड कांस्टेबल को गिरफ्तार किया गया है और उसके पास से माल भी बरामद हुआ है। अगर दिल्ली में यह हालत है तो देश भर के कितने थानों से कितने का माल गायब होगा और क्या स्थितियां होंगी उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार, उड़ीशा में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने भोपाल की एक ईसाई महिला को झूठे आरोप लगाकर परेशान किया और 18 घंटे तक थाने में रहना पड़ा। बाद में पता चला कि सारे आरोप और शंकायें गलत थीं। अखबार ने लिखा है कि उड़ीशा में यह घटना राज्य में भाजपा शासन के साल भर बाद हुई है और कुछ ही हफ्ते पहले राज्य सरकार ने मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों को उनकी गाड़ी में जिन्दा जला देने वालों में से एक को रिहा कर दिया है।

कहने की जरूरत नहीं है कि यह दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है और पहलगाम में अगर आतंकियों ने नाम पूछकर पर्यटकों की हत्या की थी तो कुछ समय पहले आरपीएफ के एक कांस्टेबल ने भी नाम पूछकर रेल यात्रियों की हत्या की थी। अब यह मामला इतना गंभीर नहीं बनाया गया था। अब ईसाई महिला को ट्रेन में परेशान करने का मामला है। लेकिन ऑपरेशन सिन्दूर जैसी कार्रवाई की जरूरत सिर्फ पहलगाम मामले में समझी गई। आतंकी ना पुलवामा वाले पकड़े गये ना पहलगाम वाले और आतंकी के साथ पकड़े गये कश्मीर पुलिस के अधिकारी किस खेल को खराब किये जाने की बात कर रहे थे यह आज तक नहीं बताया गया है। इन सबके बावजूद ममता बनर्जी ने ऑपरेशन सिन्दूर का विरोध किया तो केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ‘मुख्यमंत्री पर जमकर निशाना साधा’। अमर उजाला की कल की लीड का शीर्षक था, मुर्शिदाबाद दंगे राज्य प्रायोजित…. वोट बैंक के लिए ऑपरेशन सिन्दूर का विरोध। प्रधानमंत्री अपने वोट बैंक को साधने के लिए क्या कर रहे हैं और क्या नहीं कर रहे हैं वह मुद्दा ही नहीं है। इसीलिए आज मैंने नया इंडिया की एक खबर का हवाला ऊपर दिया है।

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