Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : यह तय नहीं कर पाये कि नारी शक्ति और सिन्दूर मुद्दा रखना है या आतंकवाद और पाक…

संजय कुमार सिंह

आज जब ज्यादातर अखबारों की लीड सीडीएस अनिल चौहान का यह कहना है कि ….हमने गलती सुधारी और पाकिस्तान को दिया करारा जवाब तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है और हिन्दुस्तान टाइम्स ने सेकेंड लीड बनाया है, सिन्दूर अब हिम्मत का प्रतीक है। कहने की जरूरत नहीं है कि आतंकवाद खत्म करने के अभियान का नाम ऑपरेशन सिन्दूर रखना राजनीति है और सेना की शक्तियों को सरकार या प्रधानमंत्री की ताकत बताकर वोट लेने की बेशर्म कोशिशों की पोल लगातार खुलते जाने के बावजूद घटना के एक महीने से भी ज्यादा गुजर जाने के बाद भी प्रधानमंत्री एक हादसे का राजनीतिक उपयोग कर रहे हैं। उसके कारणों और दोषियों का पता लगाने पर कोई जोर नहीं है। पहलगाम में 26 पर्यटकों की मौत का बदलना लेने के लिये चलाये गये ऑपरेशन सिन्दूर में उससे बहुत ज्यादा लोग मारे गये, मरने वालों में सेना के लोग भी हैं पर प्रधानमंत्री अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। कुर्सी के लिए वे राजनीति कर रहे हैं तो मीडिया का बड़ा वर्ग उनका साथ देने का लालच नहीं छोड़ रहा है। वह भी तब जब मीडिया उनका समर्थक, कार्यकर्ता, प्रचारक या परिवार का सदस्य नहीं हो सकता है। अगर ऐसा है तो सबको बंद किया-कराया जाना चाहिये। मीडिया निष्पक्ष न रहे, पर लगना और दिखना तो चाहिये। जो हालात हैं उसमें चुनाव के लिए प्रधानमंत्री, सरकार और उनका पूरा संघ परिवार लेवल प्लेइंग फील्ड पर विश्वास करता नजर नहीं आ रहा है और प्रधानमंत्री हैं कि अपनी जिद्द (असल में घिसी-पिटी और अनैतिक चाल) छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे हैं।

घर-घर सिन्दूर भेजने की योजना, खबर, उस पर ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया और फिर कई घंटे बाद मूल खबर को ‘फेक न्यूज’ करार देना अपनी जगह है पर वह खबर नहीं है। ऐसे में आज जोर सिन्दूर से हटाकर युद्ध पर डालना सरकार की एक जरूरत हो सकती है। आज दि एशियन एज की लीड है, गोलियों का जवाब (तोप के) गोलों से दिया जायेगा। यह खबर और शीर्षक द हिन्दू में लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर चार कॉलम में है। अंग्रेजी में जो शीर्षक है उसका हिन्दी होगा, “भारत अब छद्मयुद्ध बर्दाश्त नहीं करेगा, गोलियों का जवाब गोले से दिया जायेगा : प्रधानमंत्री”। मुझे लगता है कि यह चेतावनी किसी देश को दूसरे देश के प्रधानमंत्री द्वारा दिये जाने लायक नहीं है। अव्वल तो इसकी जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिये और अगर है तो चेतावनी की क्या जरूरत? वैसे भी, युद्ध तो हो चुका, युद्ध विराम चल रहा है। ऐसें में इतनी जल्दी इस चेतावनी और उसमें ‘अब’ का कोई मतलब नहीं है। वह भी प्रधानमंत्री के स्तर पर या सर्वोच्च स्तर पर। इससे लगता है कि प्रधानमंत्री युद्ध और पाकिस्तान से तनाव का मुद्दा बनाये रखना चाहते हैं। दूसरी ओर, हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए ‘नारी शक्ति’ नरेन्द्र मोदी का पुराना मुद्दा रहा है। यह ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के रूप में वर्षों से बना हुआ है। आज अमर उजाला ने पहले पन्ने पर बताया है कि अंदर दो खबरें हैं जिनका शीर्षक, नारी शक्ति को आतंकियों ने दी चुनौती, ये उनका काल बनी और पीएम मोदी ने पाकिस्तान को फिर चेताया। इस तरह, अमर उजाला ने भले इन खबरों को अंदर छापा है लेकिन पहले पन्ने पर सूचना से खबर का महत्व बढ़ ही गया है। हालांकि दोनों दो अलग खबरों का शीर्षक नहीं है बल्कि एक ही खबर का शीर्षक और उपशीर्षक है।

जाहिर है, प्रधानमंत्री महिलाओं और बेटियों को खुश करके उनका वोट लेना चाहते हैं पर राजनीति में महिला विरोधियों और यौन अपराधियों को कम करने के लिए कुछ किया हो ऐसा उदाहरण नहीं है। महिलाओं के प्रति अपराध करने वालों को संरक्षण और उन्हें बचा लिये जाने के कई उदाहरण हैं जबकि उससे कम अपराध में देश के आम नागरिक यहां तक कि लड़कियां और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर भी गिरफ्तार कर लिये जाते रहे हैं जबकि भाजपा से जुड़े लोगों का अक्सर बाल भी बांका नहीं होता है। कल मैंने लिखा था कि एक मामले में अदालत से सजा होने की खबर को भी प्रमुखता नहीं दी गई थी। तथ्य यह है कि डेक्कन हेरल्ड की एक पुरानी खबर के अनुसार, जब पूरा देश कोलकाता में एक युवा डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की घटना से आक्रोशित था, एक विश्लेषण से पता चला कि 151 मौजूदा सांसदों और विधायकों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित मामले दर्ज हैं। इनमें से एक तिहाई भाजपा के हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) की रिपोर्ट के अनुसार, 4,809 जनप्रतिनिधियों में से 4,693 और 775 सांसदों में से 755 तथा 4,693 विधायकों में से 4,033 के चुनावी हलफनामों का विश्लेषण किया गया तो पता चला कि इनमें से 16 बलात्कार के आरोपों का सामना कर रहे हैं। इन 16 में दो सांसद हैं। महिला के खिलाफ अपराध का दोषी पूर्व प्रधानमंत्री का पोता हो या किसी नेत्री का बेटा भाजपा से उसके राजनीतिक संबंध अक्सर पाया जाता है। वैवाहिक विवाद की स्थिति में लड़के वालों का गिरफ्तार होना और अक्सर निराधार या झूठी शिकायत पर आम है। लेकिन आरोपी के संबंध डबल इंजन वाली सरकार से हों तो कार्रवाई नहीं होती है और बचने के तमाम तरीके उपलब्ध कराये जाते हैं। 

अगर देश में महिलाओं की दशा या उनकी विशेष स्थिति की बात करूं तो इंडियन एक्सप्रेस में आज खबर है, असम के गोलाघाट की एक महिला को पुलिस ने पकड़ लिया, सुरक्षा बल वाले उसे लेकर बांग्लादेश सीमा पर गये और उससे कहा गया कि वह सीमा पार करके बांग्लादेश चली जाये। उसके जाने से पहले अधिकारियों को यह अहसास हुआ कि उसके मामले में कुछ गलती हुई है और उसे वापस ले आया गया। 50 साल की रहिमा बेगम असम के ढेरों लोगों में हैं जिन्हें पिछले कुछ हफ्तों के दौरान हिरासत में लिया गया है। यह उन लोगों के खिलाफ चल रही कार्रवाई का भाग है जो राज्य के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी घोषित किये जा चुके हैं। उनके अधिवक्ता के अनुसार फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने गये महीने फैसला दिया था कि बेगम का परिवार 25 मार्च 1971 से पहले भारत आया था और यह असम में नागरिकता पाने के लिए तय तारीख से पहले का मामला है। जब नागरिकता और बांग्लादेश वापस भेजने जैसे मामले में इस सरकार का काम ऐसा है तो बाकी में आप समझ सकते हैं लेकिन प्रचार का कोई मौका नहीं चूककर सत्ता में बने रहने की कोशिशें जारी हैं। इस क्रम में दूसरा मामला पश्चिम बंगाल की एक सोशल इंफ्लुएंसर 22 साल की विधि छात्रा शर्मिष्ठा पनोली का है।

द हिन्दू और इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी खबर के अनुसार शर्मिष्ठा को उसके कथित आपत्तिजनक पोस्ट के लिए कोलकाता पुलिस ने गुड़गांव से गिरफ्तार किया है और वह पुणे की छात्रा है। संभव है वह गिरफ्तारी से बचने के लिए ठिकाने बदल रही हो पर कानून की छात्रा है, एक्स पर उसके 85,000 और इंस्टाग्राम पर 90,000 फॉलोअर है। संभवतः इसीलिये पश्चिम बंगाल पुलिस ने स्पष्टीकरण जारी किया है। यह अलग बात है कि डबल इंजन वाले राज्यों में ऐसे स्पष्टीकरण की जरूरत शायद ही कभी समझी गई हो। द हिन्दू की खबर में बताया गया है कि शर्मिष्ठा के खिलाफ कार्रवाई सक्षम अदालत द्वारा जारी वारंट के आधार पर की गई है। उसके खिलाफ मामला 15 मई को दर्ज किया गया था। उसने उसी दिन पोस्ट डिलीट करके बिना शर्त माफी मांग ली थी। फिर भी शुक्रवार को उसे गुरुग्राम से गिरफ्तार किया गया। उसका दोष या अपराध जो हो, पश्चिम बंगाल पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया लेकिन मध्य प्रदेश पुलिस ने हाईकोर्ट के संज्ञान लेने पर भी मंत्री को गिरफ्तार नहीं किया। ब्रजभूषण सिंह को कभी गिरफ्तार नहीं किया गया जबकि शर्मिष्ठा ने बिना शर्त माफी मांग ली थी। पोस्ट डिलीट कर दिया था। जो आरोपी और भाजपा नेता कभी गिरफ्तार नहीं किये गये, जिनके खिलाफ एफआईआर भी नहीं हुई और जो तरक्की पाते रहे उसके मद्देनजर शर्मिष्ठा ने अदालत में पेश किये जाने तथा न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद अदालत से निकलते हुए कहा, एक लोकतंत्र में इस तरह हमें परेशान किया जा रहा है – यह लोकतंत्र नहीं है। गौरतलब है कि भाजपा समर्थकों और भाजपा राज का मामला होता तो गिरफ्तारी की संभावना बहुत कम थी। लेकिन पुणे की छात्रा को बंगाल का मामला होने पर भी गुड़गांव से गिरफ्तार किया गया और डबल इंजन शर्मिष्ठा के काम नहीं आया। जो हुआ वह सही है या गलत – अलग मुद्दा है। नरेन्द्र मोदी जो प्रचार और दिखावा करते हैं वैसे अखबारों में तान दिया जाता है पर उनके खिलाफ खबरों को महत्व नहीं मिलता है। मेरी चिन्ता यह है कि ये कैसे नागरिक बनेंगें, सरकार के बारे में इनकी सोच क्या होगी और राजनीतिकों के बारे में इनका नजरिया कैसे होगा?

यह इसलिये महत्वपूर्ण है कि भारत रत्न, लाल कृष्ण आडवाणी की आग लगाऊ यात्रा को रोकने और गिरफ्तार करने के लिए लालू यादव ने जिस अधिकारी का चुनाव किया वह भाजपा समर्थक निकला। राजनीतिक आकाओं के कहने पर जिसे गिरफ्तार किया, रिटायर होने तक उसका (उसकी नीतियों और अनुयायियों का भी) प्रशंसक बन गया। यह नेता के करीब पहुंचने और करीबी हो जाने का भी मामला हो सकता है। लेकिन अब नेता (सत्तारूढ़) गिरफ्तार नहीं होते जो युवा गिरफ्तार और परेशान किये जा रहे हैं और जो राजनीतिक कवच में हैं दोनों का एक दूसरे के प्रति भविष्य में क्या व्यवहार और विचार रहने वाला है – सोचने का विषय है। उस समय का समाज या शासन कैसा होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि नरेन्द्र मोदी के शासन में जो समाज बना है वह अगला चुनाव जिताने वाला है और आंख बंद कर समर्थन करने वालों के बच्चे अगर मन की बात लिखने-कहने के लिए गिरफ्तार किये जायेंगे, बंगलौर से दिल्ली लाये जायेंगे और गुड़गांव से कोलकाता ले जाये जायेंगे तो वे भविष्य में सरकार के प्रति कैसी सोच रखगें उनका व्यवहार कैसा होगा। आज के युवाओं की सोच को दीर्घअवधि के लिए प्रभावित करने और सत्ता के प्रति विद्रोही बना सकने वाली खबरों में तीसरी खबर भी इंडियन एक्सप्रेस में है। हो सकता है आपको लगे कि इस स्थिति के लिए इंडियन एक्सप्रेस जिम्मेदार है और अगर यह नहीं रहे या ऐसा नहीं रहे तो समस्या भी नहीं रहेगी।

मैं ऐसा नहीं मानता। मेरा मानना है कि खबर छप रही है इसलिये मैं इसके बारे में लिख रहा हूं, सोच रहा हूं और आपको सतर्क कर रहा हूं। खबर नहीं छपेगी तो मैं अपना काम नहीं करूंगा, इंडियन एक्सप्रेस के पाठकों को सूचना नहीं मिलेगी। पर घटनाएं तब भी घटेंगी और प्रभावित तो पीड़ित ही होगा। खबर नहीं छपेगी तो संभव है घटनायें ज्यादा घटें, पीड़ित ज्यादा हो और इसपर विचार-सुधर करने के लिए कोई हो ही नहीं या किसी का इसपर ध्यान ही न जाये। इसलिए, मुझे लगता है कि देश-समाज को यह समझने-सोचने की जरूरत है कि हम कैसा समाज बना रहे हैं और इसका भविष्य क्या होने वाला है और उसमें किसी सुधार की जरूरत है या नहीं और नहीं है तो जो हो रहा है वह सब ठीक है। तीसरी खबर यह है कि महाराष्ट्र में जानवरों की बिक्री करने वाले सभी बाजार 3 से 8 जून तक बंद कर दिये गये हैं। बाजार बंद किया जाना भले महत्वपूर्ण नहीं हो पर 7 जून को ईद के मौके पर बाजार बंद किये जाने के मायने हैं और कल्पना कीजिये कि जिन बच्चों को यह बताया गया है कि ईद पर कुर्बानी होती है और कुर्बानी के लिये बकरे खरीदे जाते हैं और खरीदने के समय ‘सरकार’ ने बाजार बंद कर दिये। ऐसे लोग सरकार के बारे में क्या राय बनायेंगे और जो भी राय बनायेंगे वह उन लोगों की राय से अलग होगी जो बचपन में सब कुछ सामान्य देखते रहे हैं और अब जो हो रहा है वह पहली बार है और इसका कोई संतोषजनक कारण भी नहीं दिया गया है।

हाल की एक खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री ने कहा था कि पूर्वोत्तर भारत में अभूतपूर्व विकास हो रहा है। ‘राइजिंग नॉर्थ ईस्ट इन्वेस्टर्स समिट’ को संबोधित करते हुए कहा था कि पूर्वोत्तर की विविधता इसकी सबसे बड़ी ताकत है और यह क्षेत्र विकास के अग्रणी क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा था कि सरकार इस क्षेत्र की विकास गाथा को गति देने के लिए प्रतिबद्ध है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार इस बैठक में मुकेश अंबानी, गौतम अदाणी, अनिल अग्रवाल समेत अन्य लोग शामिल हुए। इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा था, “एक समय था जब पूर्वोत्तर को केवल सीमांत कहा जाता था, अब यह विकास में सबसे आगे है।” आज टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड है, भारी बारिश के कारण उत्तर पूर्व में बाढ़, भू स्खलन से 32 लोग मारे गये। गांव पानी में डूबे, बिजली की लाइनों का बुरा हाल है। वैसे तो यह खबर दूसरे अखबारों में भी है लेकिन जितनी महत्वपूर्ण है उतनी प्रमुखता नहीं मिली है। यह अलग बात है कि जरा सी बारिश से दिल्ली में भी जन-जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है और खबर उसकी भी प्रमुखता से नहीं छपती है या छपती भी है तो कुछ बदल नहीं रहा है और प्रभावित होने वाले शहरों की संख्या बढ़ती जा रही है। मुंबई में हर बरसात में ऐसा वर्षों से हो रहा है। इस बार खासियत यह रही कि नये बने भूमिगत मेट्रो में भी पानी भर गया। इससे सेवाएं तो बाधित रही ही भारी नुकसान भी हुआ। मेट्रो का उद्घाटन कुछ ही समय पहले हुआ था। महीने भर से प्रधानमंत्री की चिन्ता महिलाएं, सिन्दूर, पाकिस्तान, युद्ध, परमाणु ब्लैकमेल आतंकवाद ही है। हालांकि इसमें भी कुछ ठोस हुआ हो ऐसा नहीं लगता है।

इसमें खबर यह है कि भारत के सीडीएस को पाकिस्तान के साथ युद्ध में नुकसान की बात स्वीकारनी पड़ी और सरकार ने भले इसे स्वीकार नहीं किया था और यह मुद्दा न उठे उसके लिये चाहे जितने उपाय किये हों, अंतरराष्ट्रीय प्रेस के समक्ष सीडीएस ने न सिर्फ नुकसान स्वीकार किया है (द टेलीग्राफ) यह भी छपा है कि अपनी गलतियों से समझा और सुधार किया (नवोदय टाइम्स) में लीड का शीर्षक है। दूसरी ओर, युद्ध हुआ तो सरकार की जवाबदेही है कि वह देश को सब विस्तार से बताये। आप समझ सकते हैं कि आतंकी हमलावरों ने नाम पूछकर मारा और एक महिला से कहा कि मोदी को बता देना तो मोदी ने बदला लेने की ठानी और ऑपरेशन सिन्दूर के नाम से युद्ध ही छिड़ गया। इसे भुनाने की कोशिशों और खबरों के बीच युद्ध का ब्यौरा तो नहीं ही दिया गया संसद का सत्र बुलाकर देश का साथ लेने की भी जरूरत नहीं समझी गई। मीडिया ने न तो इसकी मांग की न जरूरत बताई (पहले पन्ने पर खबर के रूप में) और न ही कांग्रेस की मांग का समर्थन किया। आज नवोदय टाइम्स में यह खबर छोटी पर फोल्ड से ऊपर है। अमर उजाला में सरकार की तारीफ करने वाली एक खबर का उपशीर्षक है, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान (कोलंबिया ने) मौतों पर दुख जताया था। बहुदलीय भारतीय प्रचारक टीम ने आतंकवाद की हकीकत बताई तो बदल गया रुख। इससे समझ में आता है कि कई देशों को पाकिस्तान पर हमले का कारण भी नहीं समझ में आया और युद्ध खत्म हो गया। छवि सुधारने या बचाने के लिए सांसदों की टीम भेजी गई है जो सरकारी खर्चे पर विदेश भ्रमण का मौका पाकर सरकार से खुश तो होगी ही क्योंकि नरेन्द्र मोदी ने जब पत्रकारों को विदेश दौरों पर ले जाना बंद किया तो यही प्रचारित किया कराया गया था (ट्रोल सेना से) कि मोदी को ऐसे पत्रकारों के ऐसे प्रचार की जरूरत नहीं है। और जब हुई तो भारत सरकार के पैसे पर सांसदों को मौज करने के लिए भेज दिया गया। उसमें शशि थरूर जैसे कांग्रेसी सांसद को चारा डालने का काम हुआ और सबने देखा। 

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन