यशवंत सिंह-
“अजेय” में अजय आनंद का योगी आदित्यनाथ के रूप में ट्रांसफॉर्मेशन दिखाया गया है। लॉ एंड ऑर्डर का तत्कालीन बुरा हाल दिखाया गया है।
सपा का राज है। डुमरियागंज में योगी सभा करने जाते हैं। प्रतिबंध के बावजूद सभा करने में सफलता प्राप्त करते हैं। वापसी में इनके काफिले पर हमला होता है। कई लोग मारे जाते हैं। योगी बच जाते हैं। संसद में अपने लोगों के उत्पीड़न पर रोते हुए सवाल उठाते हैं। सारा देश उनके आंसुओं को देखता है। यूपी सरकार के मुखिया को मुख्तार अंसारी को मजबूरन जेल जाने की सलाह देना पड़ता है।
“अजेय” फ़िल्म में लॉ एंड ऑर्डर का मुद्दा गहराई से उठाया गया है। तत्कालीन सपा सरकार माफियाओं को संरक्षण देती है। दिनदहाड़े मर्डर होते हैं। पुलिस बल हाथ बांधे तमाशा देखने को मजबूर रहता है।

योगी पर पार्ट टू जो फ़िल्म बनेगी उसमें विकास दुबे, अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी आदि के निपटाये जाने की रोमांचक कहानियाँ होंगी। ये घटनाएँ बेहद फ़िल्मी हैं। कानपुर में अखिलेश दुबे, अवनीश दीक्षित जैसे संगठित अपराधियों का सामने आना और इनके गैंग की कमर तोड़ा जाना बड़ी बात है। पत्रकार और वकील के भेष में कितना बड़ा गिरोह काम कर रहा था, इसकी तह में जाएँगे तो ये अपने आप में एक अलग फ़िल्म है। एक अभिनेत्री के घर फायरिंग करने वाले शूटरों को फ़ौरन निपटा देना अभी हाल फिलहाल का मामला है।
लॉ एंड ऑर्डर के मोर्चे पर योगी राज कामयाब है, ये सब मानते हैं। भविष्य की सरकारों के लिए क़ानून का शासन एक नज़ीर की तरह काम करेगा।
हर शासन में कमियाँ होती हैं और खूब होती हैं। योगी राज में भी है। लेकिन यहाँ बात फ़िल्म की हो रही है। जाहिर है, फ़िल्म ब्रांड प्रमोशन के मकसद से बनाई गई है। योगी ब्रांड को मजबूत किया जाना मकसद है। फ़िल्म अपने मकसद में कामयाब साबित होती है।
(कल मैंने फ़िल्म की समीक्षा कर दी थी लेकिन देखा कुछ लोगों को फेसबुक पर तगड़ी मिर्ची लगी है तो एक राउंड फिर समीक्षा कर दिया, उम्मीद है आज भी भभाना परपराना जारी रहेगा)
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‘अजेय’ की कहानी योगी के बचपन, छात्र जीवन और मठ जीवन के इर्द गिर्द घूमती है!



