यशवंत सिंह-
क्या चाहिए?
उद्देश्य!
कठिन है!
मैं भी हठी हूँ!
सब त्यागना होगा!
सब कुछ त्याग कर ही यहाँ आया हूँ!
ये सवाल जवाब गोरख़ मठ के महन्त अवैद्यनाथ और गढ़वाल से गोरखपुर पहुंचे नौजवान अजय आनंद के बीच का है।
सीएम योगी आदित्यनाथ पर बनी फ़िल्म अजेय आज देख आया। फ़िल्म में योगी आदित्यनाथ के सीएम बनते और माफियाओं के मिट्टी में मिला देने का ऐलान करते ही द एंड लिखा आ गया। मतलब इस फ़िल्म का पार्ट २ आने की पूरी संभावना है जिसमें सीएम कार्यकाल दिखाया जाएगा।
अजेय फ़िल्म की कहानी योगी के बचपन, छात्र जीवन और मठ जीवन के इर्द गिर्द घूमती है। एक सामान्य परिवार के ईमानदार और सिद्धांतवादी लड़के के भीतर का साहस उसे ग़लत के ख़िलाफ़ खड़े होने का माद्दा देता रहा। इसी ज़िद को जीते हुए एक दिन मठ तक पहुँचा। गोरखपुर और आसपास का माफिया कल्चर उसे लड़ते रहने को प्रेरित करता है। योगी आदित्यनाथ की डेस्टिनी, उनका भाग्य उन्हें लगातार आगे बढ़ाता है। महंत अवैद्यनाथ द्वारा उन्हें उत्तराधिकारी बनाया जाना, सांसद का चुनाव जीतना, माफियाओं से संघर्ष में जन नेता बन जाना। ये सब फ़िल्म में बखूबी दिखाया गया है।



माफिया मुख्तार अंसारी का ख़ौफ़ और उन पर सरकारी संरक्षण ठीकठाक तरीके से फ़िल्म में उकेरा गया है। इन्हीं के ख़िलाफ़ लड़ते हुए मठ के कई लोग मारे जाते हैं। फ़िल्म प्रभाव छोड़ने में कामयाब है। इसे देखकर दर्शक के मन में योगी के प्रति एक सॉफ्ट कॉर्नर डेवलप होता है। दर्शक ख़ुद को योगी में तलाशता और पाता है। सिनेमा बहुत पावरफुल विधा है। इसका देर तक और दूर तक असर होता है। अगर चुनाव के वक्त बीजेपी वाले इस फ़िल्म को गाँव गाँव सामूहिक तौर पर दिखा पाए तो इसका बड़ा असर होगा। मुझे लगता है इसे बनाया भी इसी मकसद से गया है।
फ़िल्म का प्रचार कम है, शो की संख्या कम है और दर्शक भी कम हैं। मेरे समेत मात्र पच्चीस लोग फ़िल्म देख रहे थे गौर सिटी मॉल के पीवीआर सिनेमा हाल में।
फ़िल्म देखने लायक है, उनके लिए जिन्हें धर्म और राजनीति में रुचि हो। जिनकी योगी आदित्यनाथ की ज़िन्दगी में रुचि हो। जिनका बायोपिक में इंटरेस्ट हो। फ़िल्म की शुरुआत धीमी है, थोड़ा बोर करती है लेकिन धीरे धीरे बाँध लेती है। फ़िल्म बनाने में मेहनत की गई है, ये दिखता है।



