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उत्तर प्रदेश

मिथक तोड़ने वाले योगी की ये दो पत्रकार कर रहे वाह-वाह, पढ़िए इनका विश्लेषण

बागी योगी जो कुर्सी को ठोकर पर रखता है…

K Vikram Rao

दकियानूसी हिन्दू अवधारणाओं, को अंततः तोड़ा तो हिन्दु हृदय सम्राट महन्त आदित्यानाथ योगी (MYogiAdityanath) ने ही। योगी जी तीन दशकों में पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होनें अंधविश्वास से जड़ित नोयडा यात्रा कों आकार दिया। शनिवार को गये भी। जब कहा गया कि पद से उन्हें हटाया जा सकता है तो इस काशाय परिधानधारी ने जवाब दिया कि “कुर्सी को ठोकर पर रखता हूँ”।

बागी योगी जो कुर्सी को ठोकर पर रखता है…

K Vikram Rao

दकियानूसी हिन्दू अवधारणाओं, को अंततः तोड़ा तो हिन्दु हृदय सम्राट महन्त आदित्यानाथ योगी (MYogiAdityanath) ने ही। योगी जी तीन दशकों में पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होनें अंधविश्वास से जड़ित नोयडा यात्रा कों आकार दिया। शनिवार को गये भी। जब कहा गया कि पद से उन्हें हटाया जा सकता है तो इस काशाय परिधानधारी ने जवाब दिया कि “कुर्सी को ठोकर पर रखता हूँ”।

आश्चर्य तो इस पर होता है कि बड़े बड़े सेक्युलरवादी, जनपक्षधारी, अनीश्वरवादी, समाजवादी मुख्यमंत्री डर कर कभी नोयडा गये ही नहीं। कारण यहीं कि 1988 से जो भी मुख्यमंत्री नोयडा गया वह पद से गया, बल्कि गिरा। प्रारम्भ हुआ था शेरे पूर्वांचल ठाकुर वीर बहादुर सिंह से। वें नोयडा गये, फिर सत्ता पर कभी लौटे नही। यूं भी राजीव गांधी के ढुलमुलपन से उत्तर प्रदेश में उनकी कांग्रेस पार्टी ने तभी से आई० सी० यू में अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली थी। मुलायम सिंह ने कभी दावा नहीं किया कि वे अनीश्वरवादी है। अतः वे इस अभिशाप्त नोयडा गये ही नहीं।

मगर उनके सुपुत्र अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने युवासुलभ शौर्य को शर्मसार कर दिया। के पांच साल तक सत्तासीन हो कर भी नोयडा मे कदम रखने से डरते रहे। जब एशिया विकास बैकं का नोयडा में समारोह था तो लखनऊ के अपने सरकारी आवास कालीदास मार्ग से उन्होंने बटना दबाया था।

पंडित नारायण दत्त तिवारी और ठाकुर राजनाथ सिहं भी उसी अफवाह के चलते चले ही गये। राजनाथ सिंह ने तनिक चतुराई की थी। दिल्ली में बैठ कर नोयडा के समारोह का बटन दबा कर उद्घाटन कर दिया। इतना आंतक था अन्धविश्वास का! समाजवादी तो भंजक होता है। रूढ़ि को नेस्तनाबूद करता है। पर आखिलेश जितने भी मुस्लिम-परस्त रहे हों, हिन्दू दकियानूसीपन से उभर नही पाये। नोयडा से दूर ही रहें। आशंका से ग्रासित रहें। लोहियावादी विप्लवी रहकर भी उन्होंने परम्परा को दागी बना डाला। क्या अपेक्षा होगी ऐसे युवा और समाजवादी से?

इतने आक्रान्त और समझौतावादी तो राहुल गांधी भी नहीं रहे। हालांकि वे अब पूर्णतया हिन्दुवादी बन गये है। गुजरात में सभी आराधना स्थलो पर गये। मगर आश्चर्य हुआ जब सत्ताइस मन्दिरों में विराजे हिन्दु देवी-देवता भी राहुल गाँधी की आबरू बचा नहीं पाये। इनमें सोमनाथ के भोले बाबा थे और डाकोर के रणछोड़ राय। राहुल ने सभी के चौखटों पर मत्था टेका था। सदरी के ऊपर यज्ञोपवीत लटकाया था ताकि सवर्ण शायद पसीज जायें। मगर हुआ नहीं। हिन्दू अब निर्मम हो रहा है। सात सौ वर्षाे से जुल्म सहता रहा। इन गुजराती वोटरों को अहमदाबाद में जन्मे इब्राहीम इस्माइल चुंद्रीगर याद रहे जो पाकिस्तान के दो माह (सितम्बर 1957) तक प्रधान मंत्री रहे। गुजरात में अंग्रेजी राज के दौरान इब्राहीम द्धारा इस्लामीकरण करनें में बड़ी किरदारी थी। चुंद्रीगर के दो महीने के शासन काल के तुरन्त बाद पठान मोहम्मद अयूब खान इस्लामी जम्हूरिया के फौजी तानाशाह बन गये थे। ये सुन्नी लोग गुजराती मोहजिरों केा इस्लामी मानते ही नही। यूं भी सटे हुये सिंध का प्रभाव तो गुजरात पर पड़ता रहा। गत दिनों में भाजपा राज पर बड़ी जबरदस्त विजय का सपना संजोया था इस नेहरू वंश के पांचवी पुश्त के युवा राहुल ने नाकारा हुआ |

योगी आदित्यनाथ तो सनातनी हैं, मगर राहुल (Rahul Gandhi) तो अचानक धर्मभक्त हिन्दू के रूप अवतरित हो गये। फिर भी वे ईश्वर को मना नहीं पाये। आखिर अब वो मुसलमान मतदाता भी कांग्रेस से आंशकित रहेगें। शक है कि पिता राजीव गांधी ने राम जन्म भूमि का ताला खुलवाया था। राहुल कहीं राम की मूर्ति का प्राण प्रतिष्ठान न करा डालें। अब चिन्ता का विषय होगा ही कि यदि राहुल-कांग्रेस भी हिन्दु पथगामी हो गई तो फिर वोट बैंक खाली और अनावश्यक हों जायेगा। अर्थात् जवाहरलाल नेहरू वाली वोट रणनीति सुधारनी होगी। दलित-विप्र-मुसलमान का त्रिकोण रचकर नेहरू ने ढाई दशकों तक राज पर कब्जा किया था। सोनिया-कांग्रेस ने इसमें पिछड़ो को जोड़ने का प्रयास किया। राहुल उसे संवार नही हो पाये।

अमेरिका के बर्कले विश्वविद्यालय में भाषण पढ़कर राहुल ने दावा ठोक दिया कि उनका नया अवतार हो गया है। पर विस्ंटन चर्चिल द्वारा शत्रु क्लीमेन्ट एटली पर कसा फिकरा दुहरायें, तो लोग यही कहेंगे कि “राहुल आखिर भेड़ की खाल मे केवल भेड़ ही बने रहे”।

वरिष्ठ पत्रकार K Vikram Rao से संपर्क मोबाइल 9415000909 या मेल [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

राजनाथ सिंह भी हिम्मत न दिखा पाए थे

संजय सक्सेना

आखिरकार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 35 वर्षों से चले आ रहे अंधविश्वास को तोड़ते हुए 25 दिसंबर को नोएडा पहुंच ही गये। नोयडा जाना योगी की मजबूरी रही हो या हो सकता है कि वह अंधविश्वासों को नहीं मानते हों ? लेकिन इस हकीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि सरकार बनने के नौ माह बाद तक योगी नोयडा जाने से बचते रहे। 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री को यहां मेट्रो की नई मेजेंटा लाइन का उद्घाटन करना था,ऐसे में योगी न जाते तो काफी किरकिरी होती और कई सवाल भी उठते। ऐसा इस लिये कहा जा रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने सभी 75 जिलों का दौरा किया था,परंतु वो नोएडा नहीं गये थे। 

नोएडा को लेकर अंधविश्वास करीब 35 वर्ष पूर्व तब जुड़ा था जब 1982 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीपी सिंह की नोयडा दौरे के बाद उनकी कुर्सी चली गई थी। इस अवधारणा को वीर बहादुर सिंह की सीएम पद से विदाई ने और भी पुख्ता किया। उस समय सूबे में कांग्रेस की सरकार थी और उस वक्त के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह 23 जून 1988 को नोएडा गए। मगर इसके अगले ही दिन ऐसे हालात बने कि उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ गया।इसके बाद सत्ता के गलियारों में अंधविश्वास ने मजबूती के साथ अपने पैर जाम लिये  कि जो भी सीएम नोएडा जाता है, उसकी कुर्सी चली जाती है। यूपी में करीब 35 सालों तक एक अंधविश्वास सभी मुख्यमंत्रियों पर हावी रहा कि जो भी सीएम नोएडा जाता है उसकी कुर्सी चली जाती है। इसी वजह से योगी से पहले किसी ने मुख्यमंत्री ने नोयडा जाने का साहस नहीं जुटाया। दरअसल, इस अंधविश्वास के पीछे कई किवदंतियां जुड़ी थीं जो इस दावे को पुख्ता करती थीं।

1982 में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह नोएडा में वीवी गिरी श्रम संस्थान का उद्घाटन करने गये थे। उसके बाद वह मुख्यमंत्री पद से हट गए। साल 1988 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह फिल्म सिटी स्थित एक स्टूडियो में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आए. वहां से उन्होंने कालिंदी कुंज पार्क का उद्घाटन किया।  उसके कुछ माह बाद ही उन्हें भी मुख्यमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ गया। वीपी सिंह और वीर बहादुर  के बाद नारायण दत्त तिवारी यूपी के मुख्यमंत्री बने। वह भी नोएडा के सेक्टर 12 स्थित नेहरू पार्क का उद्घाटन करने वर्ष 1989 में पहुंचे थे. उसके कुछ समय बाद ही उन्हें  मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाना पड़ गई। साल 1994 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव नोएडा के सेक्टर 40 स्थित खेतान पब्लिक स्कूल का उद्घाटन करने आए। यादव ने मंच से कहा कि मैं इस मिथक को तोड़ कर जाऊंगा कि जो मुख्यमंत्री नोएडा आता है उसकी कुर्सी चली जाती है. उसके कुछ माह बाद ही वह मुख्यमंत्री पद से हट गए. इसके बाद 6 सालों तक कोई नोएडा नहीं आया।

पीएम मोदी भले ही योगी की सराहना कर रहे हों कि वह अंधविश्वास में नही फंसे, लेकिन मोदी के गृह मंत्री और साल 2000 में तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह भी यहां आने का साहस नहीं जुटा पाये थे। जब डीएनडी फ्लाईओवर का उद्घाटन हुआ तो उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने नोएडा जाने के बजाय दिल्ली से ही इसका उद्घाटन किया। बतौर मुख्यमंत्री नोएडा का मिथक तोड़ने की हिम्मत मायावती ने जरूर दिखाई। वह बतौर मुख्यमंत्री चार बार नोएडा गईं और हर बार उन्हें कुर्सी गंवानी पड़ी। 2011 में भी मायावती नोएडा गईं थी, 2012 के चुनाव में उनकी सत्ता ही चली गई।

जहां तक नोएडा के अंधविश्वास को लेकर अखिलेश यादव का सवाल है तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 2012 में सरकार बनाने से पहले नोएडा में खूब दौर किये,लेकिन  सीएम बनने के बाद वहां के लोग उनका इंतजार ही करते रह गए। अखिलेश ने बतौर सीएम नोएडा की योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन लखनऊ से किया। यहां तक कि राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के नोएडा जाने पर उनकी अगवानी के लिए खुद न जाकर अपने मंत्री भेज दिया करते थे। अखिलेश भी अंधविश्वास पर भरोसा करते हैं,यह इस लिये और भी हास्यास्पद लगा क्योंकि वह टेक्नोटेक थे,उनकी शिक्षा-दीक्षा विदेशों तक में हुई थी। परंतु अखिलेश ने तो यहां तक कह दिया कि अगर बिल्ली रास्ता काट जाये तो वह रास्ता बदल लेते हैं। योगी ने अंधविश्वास को पीछे छोड़कर नोयडा का दौर किया जरूर है,मगर लोगों को तो यही लगता है कि अगले कुछ माह योगी के लिये खतरे की घंटी साबित हो सकते हैं,क्योंकि जो नोयडा गया वह अपनी कुर्सी कभी बचा नहीं पाया।

संजय सक्सेना लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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