वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने गिरफ्तार पत्रकार प्रशांत कनौजिया के समर्थन में खड़े पत्रकारों से 10 सवाल पूछा

Pradeep Singh

कनौजिया के समर्थन में खड़े होने वालों से दस सवाल… अपने को पत्रकार बताने वाले प्रशांत कनौजिया की गिरफ्तारी के विरोध में तमाम पत्रकार और मीडिया संगठन आवाज उठा रहे हैं। यह सही है कि देश के संविधान ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है। पत्रकारों को भी संविधान के उसी प्रावधान के तहत यह स्वतंत्रता मिली है, जो देश के आम नागरिक को। दूसरी बात संविधान यह स्वतंत्रता कुछ वाजिब प्रतिबंध के साथ ही देता है।

इन लोगों से मेरे दस सवाल हैं।

1) कनौजिया की ट्वीट देखने के बाद क्या उसे पत्रकार कहा जा सकता है?
2) क्या कनौजिया के समर्थन में खड़े होने वाले लोग यह मानते हैं कि वाजिब प्रतिबंध की यह संवैधानिक व्यवस्था पत्रकारों पर लागू नहीं होती?
3) उसे बचाने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दी जा रही है। जिसकी प्रतिष्ठा पर हमला हुआ है क्या उसका कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है?
4) आखिर इस बात पर विचार होगा कि नहीं कि कनौजिया ने जो किया है वह कानून की नजर में सही है या गलत?
5) वह गलत है तो कानून को अपना काम क्यों नहीं करना चाहिए?
6) सवाल यह भी है कि जब इस तरह के ट्वीट, खबरें लिखी और दिखाई जाती हैं, तब वे कहां होते हैं जो आज कनौजिया के समर्थन में खड़े हैं?
7) क्या ऐसे संगठनों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए कोई सांस्थानिक व्यवस्था करें?
8) कनौजिया जैसे व्यक्ति के बचाव में खड़े होने वाले क्या संदेश दे रहे हैं?
9) इन संगठनों के दबाव से कनौजिया बच गया तो ऐसे दूसरे लोगों का जो हौसला बढ़ेगा उसके लिए जिम्मेदार कौन होगा?
10) कानूनी कार्रवाई का विरोध करने से पहले क्या अपने अंदर झांकने की जरूरत नहीं है?

मीडिया के सामने प्रश्न कनौजिया का नहीं, पूरी पत्रकारिता की विश्वसनीयता का है। सोचने का वक्त है कि कनौजिया जैसों को बचाने से मीडिया की विश्वसनीयता बनती, बढ़ती है या खत्म होती है?

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं-

Sandhya Dwivedi दरअसल मशहूर होने का यह शार्टकट आजकल चलन में है…ऐसे पत्रकार जिन्होंने कभी ढंग की एक रिपोर्ट नहीं लिखी वे फेसबुक में ओपिनियन लिख-लिखकर पत्रकार बन रहे हैं….बेढ़ंगी भाषा का इस्तेमाल कर ये लोग नौकरियां भी पाते हैं…और बिजनेस भी चलाते हैं…..

Awanish Mishra ऐसी समझदारी की बातों से दिक्कत तब होती है जब एक पूर्व सांसद यह तक कह डालता है कि राहुल गांधी साबित करें कि वे राजीव गांधी के बेटे हैं? लेकिन उस वक्त यही यूपी पुलिस इसे बहुत सामान्य बात मानती हैं और उसके माथे पर शिकन तक नहीं आती. ये बात मैं तू-तू मैं-मैं वाली राजनीतिक शैली में नहीं कह रहा हूँ. बस इसलिए कह रहा हूँ कि सार्वजनिक जीवन में जो अभद्रता का न्यू नार्मल है, उसमें अभद्रता करने का अधिकार कुछ लोगों का मौलिक अधिकार बन गया है और कुछ लोगों के लिए यह घर से उठा लिए जाने लायक अपराध है. आप दिल पर हाथ रख कर कहिये कि सोनिया गांधी, नेहरु, इंदिरा गांधी, राहुल गांधी, महात्मा गाँधी या किसी भी व्यक्ति पर कोई कैसी भी टिप्पणी करके निकल जाता है और आप-हम इसे उसका मौलिक अधिकार मानकर चुप रहते हैं या नहीं? उस समय आपको या किसी को भी एक स्त्री वह भी सोनिया गांधी जैसी सम्माननीय स्त्री की प्रतिष्ठा की चिंता क्यों नहीं होती? यहाँ जिस पोस्ट पर कार्रवाई की गयी उसमें किसी नेता को इस बिना पर प्रेमी कहा गया है कि एक महिला ने सामने आकर ऐसा दावा किया, तो वह आपके लिए गुनाहे अजीम हो गया? प्रेमी कहा जाना और सोनिया गांधी जैसी प्रतिष्ठित स्त्री को व्यभिचारिणी कहे जाने में से आपको आपत्ति प्रेमी कहे जाने पर हुई, यह भी मुझे अस्वाभाविक नहीं लगा…

Satish Misra जिसकी प्रतिष्ठा आहत हुई है उसके पास सत्ता है वोह उसका उपयोग कर सकता है और गिरफ्तार करवा सकता है? क्या उनके पास और कोई संवैधानिक साधन नहीं है अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए? अफसोस होता है जब इस प्रकार से सत्ता के दुरुपयोग का बचाव किया जाय।

Shyam Jagota सही बात है लोग निजी स्वार्थों के लिए पत्रकारिता का चोला ओढ़े थानों में गुंडे मवालियों की पैरवी करते हैं और छुटभैया नेताओं के साथ मिलकर ब्लैक मेलिंग का रैकेट चलाते हैं

Amar Nath Singh I fully agree with above view of writer who is well known for his personal & professional integrity. Media persons like Kanojia are blackmailers & blot on name of theirs profession. They must be taken to task as they were enjoying on govt expense being members of Lutians Zone.

Shesh Narain Singh उस सूचना को खबर नहीं कहा जा सकता जो verifiable न हो। उसे gossip कहते हैं। gossip का प्रचार करने वाले को पत्रकार कहना गलत है।

Anoop Bhatnagar आज की पत्रकारिता का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा। एक बड़ा तबका पत्रकारिता काम और एजेंडा पत्रकारिता अधिक कर रहा है।

Rajeev Tyagi सहमत, गलत को गलत, और सही को सही कहने की जरूरत है, और मीडिया को यह हिम्मत दिखानी चाहिए, अभी कुछ दिन पहले ही ममता बनर्जी का केवल एक मीम पोस्ट कर देने पर एक महिला को जेल में डाल दिया गया था, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जमानत मिली, तब भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चर्चा चली थी पर उस महिला के सपोर्ट में मीडिया बहुत कम नज़र आया, आज मीडिया इस घटना को कैसे लेता है देखने वाली बात है.

Mukul Goel किसी भी कीमत पर इस पत्रकार को बक्शा नहीं जाना चाहिए. मैं अपील करता हूँ माननीय मुलायम और सोनिआ गाँधी जी से के वह राजनीती को दरकिन्नर कर योगी जी के साथ खड़े हों.

Mahendra Singh खान मार्केट गैंग को नियम कानून के पालन की आदत नहीं रही है। इस भाई को अब शायद समझ आ जाएगा कि पत्रकारिता के नाम पर एजेंडा चलाना अब उतना आसान नहीं रहा।

Satya Prakash Srivastava ईर्ष्या, घृणा और जलन में भस्म हो रहे एजेंडा पत्रकार किसी भी हद तक जा सकते हैं।

Manmohan Sharma मै सरकार की pick and choose p0licy का सख्त विरोधी हू। गत सात वर्ष से सत्तारूढ पार्टी द्वारा नेहरु परिवार के चरित्र हनन का घटिया अभियान चलाया जा रहा है । कया आप ने एक बार भी इस की निदा की? कया किसी भी राष्ट्रवादी सरकार ने इस संदर्भ मे एक भी व्यक्ति को गिरफ्तार किया? यह दोहरे पैमाने कयो ? कया कानून सिर्फ सत्तारूढ दल के नेताओ के संरक्षण के लिए है?

Pranay Yadav Pranay Yadav आपकी बात बिल्कुल सही है इस तरह की हरकत को पत्रकारिता तो नही कहा जा सकता लेकिन गिरफ्तारी का समर्थन करने वालो को भी सोचना चाहिए कि जिस देश का प्रधानमंत्री लाखों लोगों के सभा मे चिल्ला चिल्लाकर 50 करोड़ की गर्लफ्रैंड की बात करे । जर्सी गाय की विशेषता बताए उस देश मे संविधान के हक़ ओर कर्तव्य की बात बेमानी है। इस व्यक्ति की गिरफ्तारी का समर्थन तब किया जाता जब आज सरकार के कदम को सही बताने वाले प्रधानमंत्री की हरकत पर कम से कम दो शब्द ही लिखते।

दिनकर दिनकर घटिया पत्रकारिता को और घटिया बनाने में मीडिया संस्थानों का भरपूर योगदान है, लिहाज़ा पत्रकारिता में घटिया लोगों का प्रवेश धड़ल्ले से जारी है….और पत्रकारिता पर हमला बता कर उनका संरक्षण करना अब मीडिया की मजबूरी है….क्योंकि उन्हें पता है कि ये उन्हीं की पैदाइश है जहाँ पता ही नही है पत्रकारिता क्या है और सीमाएं क्या हैं….

अंकित द्विवेदी सर जिसकी प्रतिष्ठा पर हमला हुआ, वो कोर्ट जाए और मानहानि का दावा करे। पुलिस का मनमाना इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं। जिनकी प्रतिष्ठा पर हमला हुआ उनको इस देश की न्यायपालिका पर कितना भरोसा है। ये तो आपको भी मालूम ही होगा। इन्होंने संविधान, कानून और नैतिकता को ताक पर रखकर खुद ही के ऊपर दर्ज मुकद्दमें वापस ले लिए। क्या इस देश का कानून और संविधान इनको इसके लिए कभी कोई दंड दे पाएगा?

Praveen Chauhan पुरातन काल से कहावत चली आ रही है समरथ को नहि दोष गोसाईं। यह कहावत आज की पूरी तरह चरितार्थ। कनौजिया को सही कतई नहीं कहा जा सकता लेकिन उन पर कार्रवाई करने वालों को भी अपने गिरेबान में झांक कर देखने की जरूरत है कि क्या वह ऐसा करने का नैतिक हक रखते हैं

Ramesh Sharma व्यक्तिगत मामलों में तो जब तक दूसरे पक्ष का बयान न आ जाए ऐसी बेहूदगी वाली खबरें देना कौन सी पत्रकारिता है यह सभी पत्रकार भी जानते हैं। योगी क्या अभिषेक बच्चन हैं कि एक पग्लेट लड़की एन शादी वाले दिन उसके घर के आगे खड़ी हो कर करने लगी तमाशा और सारे चैनल टूट पड़े।

Isht Deo Sankrityaayan अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश की सुरक्षा व्यवस्था से सम्बन्धित सूचनाएं लीक करना, बिना किसी आधार के किसी व्यक्ति (चाहे वह आदमी हो या खास) का चरित्र हनन करना, निरर्थक बकवास करना, किसी व्यक्ति या समूह की भावनाए अकारण आहत करना…. यह सब आता है क्या?

Ramesh Kumar Mishra प्रदीप जी आप सुलक्षे हुए पत्रकार हैं,कनौजिया पर तो सरकार तुरंत एक्शन में आ गई किंतु राष्ट्रीय चैनलों पर बैठकर जो टी वीं ऐंकर रात-दिन झूठी ख़बरों का प्रवचन करते रहते हैं उनपर कौन एक्शन लेगा…??

Nisheeth Joshi इन संगठनों में घुसे तत्वों ने पत्रकारिता में ऐसे हालात पैदा किए हैं कि दो धाराएं साफ दिखने लगी हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति एक दिन में नहीं बनी। हमें याद है कि जो लोग अयोध्या में पत्रकारों पर हमले को लेकर सड़कों पर उतरे थे। वहीं पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार द्वारा पत्रकारों के साथ अमानुषिक अत्याचार पर सरकार के प्रवक्ता बन गए थे। ऐसे लोगों की बदौलत ही कन्नोजिया जैसे हालत पैदा हुए हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर सनातन धर्म के किसी योगी पर तो इस तरह की टिप्पणी कर देते हैं। किसी मुस्लिम, क्रिश्चियन या दूसरे धर्म के इसी स्तर के धर्माचार्य पर क्यों नहीं। कारण सब जानते हैं कि उसके बाद इनका हश्र क्या होगा। इसलिए मीडिया को इन सब से दूर अपने काम को करने की जरूरत है। अभिव्यक्ति की आजादी को अगर किसी के मान मर्दन का हथियार बना कर प्रयोग किया जाएगा तो वह पत्रकारिता नहीं, व्यक्ति विशेष के प्रति प्रचार युद्ध की शुरुआत है। यह वामपंथी विचारधारा के पत्रकारों ने आजादी के बाद से लगातार किया है। कांग्रेस और दूसरे तथाकथित सेक्युलर दल के समर्थक पत्रकार भी यही करते रहे। अब प्रतिक्रिया में राष्ट्रीय अस्मिता और संस्कृति वा संस्कारों को संरक्षित करने के लिए भी इसके अतिवाद के खिलाफ पत्रकारों का एकजुट होना इनको भारी पड़ रहा है। इस लिए पत्रकार संगठनों का दुरपयोग करने में जुट गए हैं। वो दिन दूर नहीं कि इन संगठनों से भी इनको इनकी हरकतों के कारण खदेड़ बाहर किया जाएगा। कुछ तथाकथित सेक्युलर मीडिया के स्तंभों के सुर बदलते साफ सुने जा सकते हैं।

Shashi Shekhar सर, दरअसल आपने 10 सवाल नहीं पूछे है, 10 आरोप लगा रहे है है, कनौजिया के खिलाफ हुई कार्रवाई के खिलाफ खड़े लोगों और पत्रकारों के ऊपर। कनौजिया के खिलाफ सिर्फ एक ही मामला बनाता है, मानहानि का, जिसके खिलाफ सिर्फ और सिर्फ अदालत में याचिका लगाई जा सकती है। संविधान यही कहता है। उसकी गिरफ्तारी संविधानेत्तर है, गैर कानूनी है, सत्ता और ताकत का बेजा इस्तेमाल है।

Umashankar Singh सर आपके सवाल का जवाब तो नहीं दे पाउँगा पर कनौजिया के संदर्भ औरों पर भी लागु होता है शायद ???? रही बात किसी को जेल भेजने की तो शायद आप भी नहीं चाहते होंगे ? जेल भेजना , बच्चों के बीच से उठा कर ले जाना क्या प्रमाणित करता है ? वैसे छोटा मुंह बड़ी बात कह रहा हूँ की मैं आपके इस पोस्ट से असहमति तो ब्यक्त रहा हूँ.

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Comments on “वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने गिरफ्तार पत्रकार प्रशांत कनौजिया के समर्थन में खड़े पत्रकारों से 10 सवाल पूछा

  • Amlesh vikram singh yadav says:

    सोशल मीडिया पंडित नेहरू के चरित्र दोहन से भरा पड़ा रहता है। महात्मा गांधी भी इसके शिकार हैं । ये भाजपाइयों का है । योगी आदित्य नाथ की प्रतिष्ठा इन दोनों नेताओं से अधिक है जो ऐसा करने वालों पर कोई कार्यवाही नहीं होती। रही बात संविधानिक पद की तो जनता के नौकर के सिवाय कुछ भी नहीं है। जनता ही सबकुछ है। मिल एक राजनीतिक चिंतक थे जिन्होंने कहा था। पूरी दुनिया एक तरफ हो तब भी अकेले व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए।

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  • Rajeev ranjan says:

    प्रदीप जी आप वरिष्ठ पत्रकार है और मै आपकी बहुत इज्जत करता हूँ लेकिन जो आपने दस सवाल पूछे है वह विल्कुल बच्चो वाले है मै आपके विचारो से कतई सहमत नही हू एक समय में काग्रेस के नेताओं ने भी अपने ऊपर सवाल खड़े करने वाले लोगों के ऊपर एक तालीवानी कानून बनाया था और उसके वाद जनता ने उनका क्या हर्स किया था वह बताने की आवश्यकता नही है कार्यवाही महिला के ऊपर होनी चाहिये थी न कनौजिया के ऊपर उन्होने तो महिला के व्यानों के आधार पर खबर चलाई व टवीट किया

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  • Dharmendra Srivastav says:

    सबसे पहले तो उस महिला की भी जांच करनी चाहिए थी कि उस महिला का बयान सच है या झूठ । यदि झूठ है तो उस महिला का भी मानसिक परीक्षण कराकर उसके खिलाफ जरूर कार्यवाही करनी चाहिए उसे महिला होने का लाभ नहीं मिलना चाहिए शायद अगर सरकारी तंत्र उस महिला के खिलाफ उसी वक्त कार्यवाही कर दिया यह मामला इतना आगे तक तू नहीं पकड़ पाता सब लोग ही खामोश हो जाते । राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को भोपाल से चुनी गई सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ने जो कहा क्या हुआ उचित है एक राष्ट्रपिता जिसके ऊपर पूरी दुनिया में रिसर्च हो रहा है ,ऐसे में साध्वी प्रज्ञा का बयान कितना प्रासंगिक है पत्रकारिता की सीमाएं तो होनी चाहिए लेकिन न्याय के साथ कार्यवाही करना चाहिए यदि किसी के खिलाफ कोई आपत्तिजनक बयान देता है और पत्रकारिता में उसको लिखकर या टीवी चैनलों पर दिखा कर या सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाता है यह वास्तव में गलत है कम से कम किसी पर उंगली उठाने से पहले इस बात पर जरूर ध्यान देना चाहिए की वह व्यक्ति कौन है लेकिन यह सीमाएं सबके लिए लागू होती सत्ता में बैठे लोग अपने अधिकार का प्रयोग करके दूसरे को दबाना चाहते हैं इस तरह की परंपरा ठीक नहीं यदि कार्यवाही हो तो सभी के आपत्तिजनक बयान पर और उस बयान को जो भी अपने मीडिया संस्थान में जगह देता है ऐसे सभी पर कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन समान रूप से ।

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  • सुधीर उपाध्याय says:

    प्रतिष्ठा पर हमला उस महिला ने भी किया है, क्या उस पर भी ऐसी तरीके की कार्यवाही हुई है ? समूची पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर आ रहे संकट पर विचार करना होगा । मीन मेख तो निकले जा सकते हैं।

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  • madan kumar tiwary says:

    जो लोग भी प्रशांत के पक्ष में खड़े है उन्हें मैं मानसिक विकलांग मानता हुँ, उच्चतम न्यायालय ने प्रशांत को कोई सिर्फ एक राहत दी ,वह था जमानत, क्योकि अपराध उस स्तर का नही था कि बिना वारंट गिरफ्तार करके जेल भेजा जाए, वैसे तो जमानत का आदेश जस्टिस का है,लेकिन उसके पहले से 41A है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट को भी ज्यूडिशियल रिमांड पर भेजने के पहले देखना चाहिए था और कंडीशनल जमानत देनी चाहिए थी, माननीय जस्टिस ने भी एक गलती कर दी रिपीटीशन आफ ऑफेंस का कंडीशन नही लगाया,खैर सिर्फ 505 और 67 आईटी का था ,अन्यथा मामले की गंभीरता को कमतर आंका उच्चतम न्यायालय ने, मामला एक सीएम जो एक पीठ का महन्थ भी है उसके अनुयायियों को भड़काने वाला था, दूरगामी परिणाम बहुत खराब हो सकते थे ,ऊपर सभी टिप्ननियो मे शेष नारायण सिंह जी की टिपण्णी सही है ,जिसे वेरिफाई नही कर सकते वह गॉसिप है और उसको कोई न्यूज या ट्वीट बनाये ? गजब गजब ??? Right to freedom of expression doesn’t confer any right to infringe fundamental right of others to live with dignity ,this aspect was not even argued during the hearing .

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