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सहारा मीडिया संस्थान मुझे इन दो बातों के लिए बहुत याद आता है!

मनु पवार-

ये कहानी फिर सही…

बीस बरस हो गए हैं जब अख़बारी पत्रकारिता को छोड़कर टीवी न्यूज़ की गति को प्राप्त हुआ था. साल 2003 की बात है. शिमला टू दिल्ली. हालांकि तब अख़बार में बढ़िया चल रहा था. ‘अमर उजाला’ में था. अच्छे लोग मिले, अच्छे रिश्ते बने. काम और नाम दोनों खूब मिले. दाम की तब ज्यादा फ़िक्र नहीं हुई. लेकिन जलवा ऐसा था कि उन दिनों कभी-कभी तो किसी छोटे-मोटे ‘विश्वगुरु’ टाइप फील हो जाया करता था.

फिर दिन अचानक न जाने क्या सूझी. अख़बार की पत्रकारिता को जस की तस धर दीनी चदरिया टाइप कर दिया और झोला उठाके चले आए देश की राजधानी दिल्ली. पहले उत्तराखण्ड के पहाड़ों और फिर हिमाचल के पहाड़ों में रहकर फेफड़ों में पर्याप्त स्वच्छ हवा भर चुका था और शरीर कुदरती तौर पर फिटनेस का अभ्यस्त हो चुका था. छोटी-मोटी बीमारी तो बन्दे को छूने से भी भय खाती थी.

फिर अचानक शिमला के आसमान से गिरा और दिल्ली के खजूर में अटक गया. सड़ी गर्मी, भागमभाग, धूल-धक्कड़, शोर-शराबा, चिल्ल-पौं, हैवी ट्रैफिक, गैस चैंबर, माचिस की डिबिया से घर. और शुरुआत में तो ऐसे लोगों और ऐसे बर्ताव से पाला पड़ा जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. कई बन्दे तो ऐसे भी मिले जिनमें या तो ‘दीवार’ और ‘जंज़ीर’ फिल्म के अमिताभ बच्चन वाला एंग्री यंगमैन नज़र आता था या फिल्म ‘मदर इंडिया’ के सुखी लाला की तरह धूर्त और मक्कार. एकदम महानगरीय धूर्तता.

ऐसा फील होता था कि जाने-अनजाने भिन्न किस्म के सामाजिक-सांस्कृतिक बैटलग्राउंड में कूद पड़े हैं. ऐसा लगने की बड़ी वजह थी अपनी पृष्ठभूमि. हिमाचल में बहुत सीधे, सच्चे, सौम्य, सरल और पढ़ाकू लोग मिले. बहुत इज़्ज़त मिली. बड़ा प्यार मिला. शोहरत मिली. लोग इतने केयरिंग, इतने मृदुभाषी, इतने मिलनसार थे कि उनकी गर्मजोशी देखकर सामने वाला बन्दा पिघल जाता था.

दिल्ली में शुरू में जैसे रूखे माहौल और अजीबोग़रीब लोगों से वास्ता पड़ा, वो शिमला के एकदम 180 डिग्री था. बड़े दिनों तक ये लगता रहा कि यार किसी नर्कलोक में आ गया हूं. तब कई बार मन किया कि फूट लूं यहां से. कोशिश भी की लेकिन हमसे हो न पाया. मुझे याद है, शुरुआती हफ़्ते में एक दिन सहारा के न्यूज़रूम में सहकर्मी Anuraag Muskaan ने हैरान होकर कहा था, शिमला की ठंडी वादियां छोड़के यहां क्यों चल आए यार ! ख़ैर, तब से यहीं टांग फंसाए हुए हूं. अब तो मज़ाक-मज़ाक में बीस बरस हो गए हैं. इस बात का ख्याल भी कल रात ‘सहारा समय’ चैनल के दिनों के साथियों से कई साल बाद हुई मुलाकात के दौरान आया.

दिल्ली में शुरुआती दिनों में किसी रोज़ राहुल सांस्कृत्यायन के कहे का ख्याल आया था- भागो नहीं, दुनिया को बदलो. दुनिया को तो खैर क्या ही बदल पाते, खुद की दुनिया बदलना ही एकमात्र उपाय था. सो, कोशिशें की गईं. सहारा ग्रुप का ही साप्ताहिक अख़बार बड़ा मददगार रहा, जहां अपनी बेचैनियों को चैनलाइज कर पाया. टीवी में काम करते-करते वहां लिखने-छपने लगा. हौसला बढ़ा. फिर धीरे-धीरे इस लिखने-छपने का विस्तार हुआ और प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्ठों तक पहुंच गया. हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक ट्रिब्यून, अमर उजाला, नई दुनिया इत्यादि नामी अख़बारों में नियमित लिखने-छपने लगा. और हां, 4 किताबें टीवी की नौकरी के दौरान ही लिखी गईं, जिनमें 2 व्यंग्य संग्रह हैं. तो कुल जमा यही हासिल है.

असल में ये जो दिल्ली है न, ये पैरों में जंज़ीरें डाल देती है. आप चाहकर भी अपना पांव नहीं छुड़ा पाते. दिल्ली में मेरा एक हिमाचली मित्र साल 2004 के आसपास से ही अक्सर कहता था, दोस्त ! मैं तो यहां नहीं रहने वाला. शिमला लौट जाऊंगा. हर हाल में लौटूंगा. आप यकीन नहीं करोगे, तब उस बन्दे का ‘घर वापसी’ का काउंटडाउन चला करता था. आज वही बन्दा दिल्ली-एनसीआर में घर लेके बैठा है. हमारी तरह वो कमबख्त भी नहीं लौट पाया. देश में ‘क्रान्तियां’ ऐसे ही दम तोड़ रही हैं.

मशहूर शायरा फ़हमीदा रियाज़ की नज़्म की ये पंक्तियां अक्सर अपने उस हिमाचली मित्र पर ताना कसने के काम आती है- तुम बिल्कुल हम जैसे निकले. हालांकि मेरे परिचित कुछ जिगर वाले बन्दे ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ जैसे पॉलिटिकल नारे की लॉन्चिंग से कुछ साल पहले ‘दिल्ली मुक्त जीवन’ का कैंपेन सफलतापूर्वक चला चुके थे. उनमें से ज्यादातर बन्दे बड़े मज़े से जी रहे हैं.

वैसे सच कहूं, मुझे तो जवानी के उन दिनों में कम्बख्त टीवी की पहली नौकरी का मोह खींच लाया था. जी हां, टीवी न्यूज़ चैनल की पहली नौकरी और कंपनी कौन? सहारा ग्रुप, जिसने उस साल चैनलों का बुके लॉन्च किया था और हम ‘सहारा समय’ चैनल का हिस्सा बने.

मेरी टीवी की पहली नौकरी के उस दौर के साथियों ने कल रात बरसों बाद पहला पुनर्मिलन समारोह किया तो वक़्त थोड़ा रिवर्स गियर में चला गया. अख़बारी पत्रकारिता को बाय-बाय करके मैं टीवी में बालोचित उत्साह के साथ घुसा था. टीवी की पहली नौकरी को याद करने की वैसे और भी कई वजहें हैं.

इसी नौकरी ने मुझे रिपोर्टर से प्रोड्यूसर बना दिया. कई साल तक ख़बरों की तलाश में फील्ड की धूल फांकता, ख़बरों का पीछा करता बन्दा दिल्ली आकर वातानुकूलित न्यूज़ रूम का हिस्सा हो गया. ये भूमिका मुझे बिल्कुल नहीं जची लेकिन मेरे लिए वो दूसरों ने तय की थी. एक बार परमानेंट रिपोर्टिंग में जाने का मौका मिल गया था, लेकिन मेरे किसी परिचित ने ही ऐसा खेला किया कि हाथ को आया मुंह न लगा टाइप. तब समझ में आया कि तारीफ़ें हमेशा हौसला बढ़ाने के लिए ही नहीं की जातीं, कुछ तारीफ़ें दूसरों का काम बिगाड़ने के लिए भी की जाती हैं.

मेरी सिचुएशन डॉ. गोविन्द चातक के लिखे नाटक ‘दूर का आकाश’ की मुख्य किरदार फ्योंली की तरह हो गई थी, जिसे पहाड़ से उखाड़कर भिन्न किस्म के मौसम में रोपा जाता है. ‘कला दर्पण’ के Shuba Subhash R निर्देशित ये नाटक मैंने 90 के दशक में देखा था लेकिन कई बरस तक ज़ेहन में गूंजता रहा.

बहरहाल, प्रिंट मीडिया से निकलकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पहुंचने की यात्रा में शुरुआत में सबसे भयाक्रांत किया इस माध्यम में टेक्नोलॉजी के रोल ने. लेकिन इस मीडियम को जानने-समझने का उत्साह था, तो जमकर काम किया.

बाकी जो है सो है, वैसे सहारा मुझे दो बातों के लिए बहुत याद आता है- सस्ता खाना और समृद्ध पुस्तकालय. सहारा के पुस्तकालय में मैंने घंटों-घंटों बिताए हैं. अब मीडिया संस्थानों में ही क्या, कहीं और भी पुस्तकालय जैसा कल्चर डायनासोर की तरह लुप्तप्राय सा हो गया लगता है.

वैसे टीवी की पहली नौकरी में कुछ अच्छे दोस्त भी बने. कुछेक तो अब तक बने हुए हैं. कुछ अनवॉन्टेड चीज़ों से भी सामना हुआ. मसलन, भौकाल बनाना, माहौल बनाना जैसी शब्दावली से मेरा पहला परिचय यहीं हुआ. उससे पहले हम अख़बार में जमकर पत्रकारिता कर रहे थे. खांटी पत्रकारों/संपादकों की सोहबत थी. राजनीति की तरह टीवी में भी कैपेबिलिटी पर सूटेबिलिटी को तवज्जो पाते टीवी की पहली नौकरी में बहुत नज़दीक देखा. अख़बार में रिपोर्टिंग के दौरान ये बात समझ में नहीं आ पाई थी, क्योंकि वहां पर बन्दे का काम, उसकी योग्यता अगले दिन के अख़बार में उसकी रिपोर्ट में बोला करती थी.

ख़ैर, बन्दा रौ में बह गया. बात निकलते-निकलते दूर तलक पहुंच गई है. किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में इत्ता लंबा लिखा पढ़ने के लिए वैसे भी बड़ा जिगर चाहिए होता है ! ईश्वर पाठकजनों को पर्याप्त सहनशक्ति दे.

और हां, साथी Anshu Naithani और Dhiraj Chauhan का विशेष रूप से धन्यवाद जिन्होंने पुराने दिनों का मेला जुटाया.

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1 Comment

1 Comment

  1. पवन सोंटी, कंटेंट राइटर, दिल्ली विश्वविद्यालय

    December 20, 2023 at 5:53 pm

    बहुत ही भावुक और वास्तविकता के नजदीक लिखा है आपने। इतना बांधने वाला कि आखरी शब्द पढ़ने तक मोह लगा रहा।
    आपके लिखने की शक्ति देख कर पहली बार भड़ास पर कमेंट लिख रहा हूं।

    जिंदगी में आदमी ये यादें ही तो कमाता है।
    लेकिन सभी लोग आप की तरह लिख नहीं पाते सो आप जैसों का लिखा पढ़ कर उसमें खुद को फिट करने का प्रयास करते रहते हैं मेरी तरह।

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