Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

भगवान किसी प्रधानमंत्री को वैसे मीडिया एडवाइज़र न दे, जो माननीय मनमोहन सिंह को मिले : दिलीप मंडल

दिलीप मंडल-

मनमोहन सिंह की पीठ पर ख़ंजर घोपने वाले कौन थे? किन लोगों ने उन्हें धोखा दिया?

भगवान किसी प्रधानमंत्री को वैसे मीडिया एडवाइज़र न दे, जो माननीय मनमोहन सिंह को मिले।

पहले मीडिया एडवाइज़र को मनमोहन सिंह ने चुना था पर उसने डॉ. सिंह को धोखा दिया, बदनामी फैलाई और उनका मज़ाक़ उड़ाते हुए किताब लिख डाली। मनमोहन सिंह की बेटी ने भी इस बारे में बताया है।

Sanjay Baru

बाक़ी दोनों मीडिया एडवाइज़र किसी काम के नहीं थे। छोटे दिल-दिमाग़ वाले लोग थे। पार्टी ने इन दोनों को मनमोहन सिंह पर थोप दिया था।

उसमें से एक मीडिया से ही लड़ता रहा तो तीसरे ने तो जाते जाते मई 2014 में पीएमओ के सरकारी ट्विटर हैंडल को हड़पने की कोशिश की थी।

जो काम नहीं आता, वह करने की कोशिश करने पर ऐसी ग़लतियाँ हो जाती हैं।

तीनों मीडिया एडवाइज़र को सोशल मीडिया का कुछ भी पता नहीं था। बिल्कुल अनपढ़ और मासूम थे इस मामले में। उन्होंने दस हज़ार से ज़्यादा ट्विटर हैंडल सस्पेंड करवा दिए या ब्लॉक कर दिया।

तीनों अपना निजी करियर बनाने में जुटे रहे।

मनमोहन सिंह की कमजोर प्रधानमंत्री और “मौन-मोहन” वाली छवि पीएमओ में बैठे इन लोगों और पार्टी ने बनाई थी। विपक्ष ये काम कर भी नहीं सकता था।

मनमोहन के खिलाफ निगेटिव प्रचार का केंद्र उस समय का पीएमओ ही था। वहीं से मनमोहन सिंह के खिलाफ खबरें चलती थीं। खबरें “लीक” की जाती थीं।

पूरे दो कार्यकाल के जो भी सही काम माने गए वो सोनिया गांधी के हिस्से आए और सारी बदनामी मनमोहन के हिस्से। चाहे वे 2जी या कॉमनवेल्थ गेम्स या कोयला घोटाला हो, आतंकवादी घटनाएँ, लालू यादव या मुलायम सिंह का प्रसंग हो या सियाचिन का मामला।

सोनिया गांधी किसी भी गलती के लिए ज़िम्मेदार नहीं थी। जबकि सरकार वो ही चला रही थीं। सब जगह सोनिया के लोग भरे पड़े थे।

मुस्लिम तुष्टिकरण भी सोनिया गांधी और कांग्रेस का प्रोजेक्ट था। “संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक़” होगा ये कांग्रेस पार्टी की नीति थी। बदनामी मनमोहन सिंह के हिस्से आई।

राडिया टेप में जनता को साफ दिख गया कि मनमोहन सिंह अपने मंत्री नहीं चुनते। बार बार खबरें छपती रहीं कि मंत्री मनमोहन की नहीं सुनते। मंत्री जयराम रमेश पर्यावरण आतंकवादी की भूमिका में थे। उद्योगपतियों में डर बैठ गया।

पॉलिसी परालिसिस का दोष भी मनमोहन पर आया। जबकि उनके हाथ में अधिकार ही नहीं थे। साधारण सांसद राहुल गांधी सरकार का अध्यादेश फाड़ रहे थे। पीएम की इज़्ज़त कौन करता?

ऐसी हालत में मीडिया मैनेजर अच्छा भी होता तो क्या कर लेता। मनमोहन को तो इस काम के लिए कोई प्रोफेशनल बंदा मिला भी नहीं।

प्रोफ़ेशनल आदमी पद छोड़ने के बाद उनकी आलोचना नहीं करता, जिसने उस पर भरोसा किया हो, नियुक्त किया हो।

यह राजकीय कामकाज का साधारण नियम है कि जो भी रहस्य आपको सरकारी कामकाज के दौरान पता चलें, वह आपके सीने में दफन रहने चाहिए। आपको मिली जानकारी आपके साथ श्मशान घाट तक जानी चाहिए।

यहाँ तो मनमोहन सिंह के मीडिया एडवाइज़र पद से हटने के बाद इंटरव्यू देने लगे और किताब लिखने लगे।

यह नीचता है। मनमोहन सिंह को अपनों ने धोखा दिया।

सादर नमन!

दिलीप मंडल वरिष्ठ पत्रकार और सूचना प्रसारण मंत्रालय में सलाहकार हैं.


एक टिप्पणी ये भी-

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन