सुरेंद्र सिंह-
मोदी सरकार जब आई तो जर्नलिज्म सिर्फ मीडिया घरानों, संपादकों, मंत्रियों और सरकार के सलाहकारों तक सीमित नहीं था। मीडिया कम्प्लीटली कमर्शियल लूप में था। एक डिसिप्लिन अंतराष्ट्रीय न्यूज फॉर्मेट के प्लेटफॉर्म पर परोसा जा रहा था। कमर्शियल कंपटीशन भी था। टेक्नोलॉजी/ हाईटेक मशीनरी के दौर भी था। अंतराष्ट्रीय मल्टीपल कैपेबिलिटी टैलेंट को सीधा अप्रोच था। मीडियाकर्मियों की प्रगतिशील बहाव का दौर था। चैलेंजिंग टास्क का दौर था। क्रिएटिव थॉट्स, प्रोडक्शन, प्रोमोज, प्रोग्रामिंग, प्रिंटिंग, एडिटोरियल, एडिटर्स, टेलीकास्ट, स्क्रिप्ट राइटर, ह्यूज स्टूडियोज, बाहरी एडवरटाइजिंग, एडवरटाइजिंग एजेंसियां उनकी पूरी टीम, अनेकों इनपुट-आउटपुट सब एक दूसरे के पूरक थे। जबरदस्त प्रतिस्पर्धा थी। बाजार, ख्याति, संस्थान, संस्था, घटना, दुर्घटना, जिंदगी सब एक दूसरे से जुड़े थे। एक दूसरे पर डिपेंड थे।
वह सब कुछ मोदी-शाह ने ख़त्म कर दिए। लाखों बेस्ट, योग्य एनर्जेटिक एम्प्लॉई खत्म हो गए। नौकरी के लाले पड़ गए। वे जाएं तो जाएं कहां? घर चलना दुःस्वार हो गया। जो छोटे-छोटे गांव, गलियां, कस्बों तक स्टिंगर, रिपोर्टर उनकी रिपोर्टिंग ज़मीनों की खाक छानती थी। इस से सरकार को ही फायदे होते थे। मीडिया देश की दृष्टि थी। मीडिया पर मोदी सरकार के भारी दबाव ने लाखों मीडिया कर्मियों की जिंदगी उजाड़ दी। सैकड़ों टैलेंट मीडियाकर्मी बेरोजगारी के दरवाजे पर खड़े हो गए। जिन्हें राजनीति और राजनीति की प्रक्रिया से कोई लेना देना नहीं था। वे अर्थपूर्ण विश्लेषण मर गए। प्रतिस्पर्धा मर गई। मीडिया का मर जाना, एक विस्तृत संवाद का मर जाना है। देश का मर जाना है। कम्युनिकेशन का खत्म हो जाना है। एम्प्लॉई तो मर ही गए। उसकी कौन चिंता करता है? क्योंकि मोदी-शाह को अब भी यह ज्ञात नहीं कि मीडिया का विस्तार सिर्फ संस्था के मालिक, ऐंकर तक नहीं थी। अनेकों और भी जीवन की रोजी-रोटी इस व्यवसाय से जुड़े थे। सच पूछिए तो मोदी सरकार को रोजगार, गरीब, मिडल क्लास की जिंदगी से कोई लेना देना है ही नहीं।
कुछ बचा था, वह सोशल मीडिया के रिवॉल्यूशन, स्क्रीन की आंधी ने ख़त्म कर दिया। सैकड़ों ने सोशल मीडिया की मिकी माईक थाम ली। रिसर्च ख़त्म हुए। ऑथेंटिक/सच्चाई ख़त्म हुई। अमेरिका का यूट्यूब, फेसबुक न होता तो बेरोजगारी की कहर मच गई होती (यूट्यूब fb स्थाई रोजगार का स्वरूप नहीं)। दो रुपए की कमाई भी डूबते का तिनके का सहारा बना। मीडिया वाले बेचारे कभी एक दूसरे का सहारा न बन पाए। कई जगहों पर मीडिया पद स्वार्थ, शोषण, जुगाड, अंदरूनी मतभेद भी मीडिया चरित्र पर बट्टा लगाया। आपसी नुकसान हुए।
मोदी सरकार में देश-दुनिया से सीधे संवाद खत्म हो गए। वे सब समाप्त हो गए जिन्हें जिंदा रखना था। सिर्फ पत्रकारिता समाप्त न हुई? एक तेज दौड़ समाप्त हो गई। कवरेज समाप्त हुए। सॉलिड कंटेंट की आंधी में कुछ कर गुजरने वाले टैलेंट, जोश, जज्बा, शब्द, आनेवाले युवा, उनके टैलेंट समाप्त हो गए। बचे कौन? बहुत निम्न स्तर वाले। घुटने के बल रेंगने वाले। अपाहिज पत्रकार। जो न चल सकते हैं, न दौड़ सकते हैं। मोदी-शाह ने उन्हीं के गले में पट्टे बांधे। जिनके शरीर में हड्डी न थी। मोदी-शाह की जोड़ी, गुजरात से ही इनकी तमाम नीतियां, इनके मसौदे औरंगजेब नीति पर खड़ी रही है।
बारीकियों में विश्लेषण करें तो मोदी-शाह ने सिर्फ मीडिया ही नहीं बर्बाद किया। देश भी। इतिहास भी। चरित्र भी। ज्योग्राफी भी। जवान भी। किसान भी। युवाओं के सपने भी। हिंदू भी। धर्म, मंदिर और आस्था भी। वर्तमान और भविष्य भी। हां.. मीडिया अवश्य है बस अस्थि पंजर कंकाल रह गए हैं। सिर्फ सरकार से राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं। प्रति व्यक्ति के अधिकारों को सरकार के संचारों, विचारों और कार्यों में विलय करने की अवश्यकता है।
मलाल ये नहीं की “ज़हालत” तख्त पर बैठी है, हैरत ये है कि “इल्म” उसके जूते उठाए खड़ा है,,!


