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आज के अखबार : टेलीग्राफ ने चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ़्रेन्स को वैसे छापा है; जैसे लोकतंत्र में अख़बार को छापना चाहिए!

संजय कुमार सिंह

राहुल गांधी की अधिकार यात्रा कल शुरू हुई (देशबन्धु में लीड) और कल ही (इतवार को) चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस हुई (अमर उजाला, इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू में लीड)। आज के अखबारों के अनुसार कल ही उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की घोषणा हुई (टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड)। प्रधानमंत्री ने दिल्ली की सड़कों पर भीड़ कम करने के लिए 11 हजार करोड़ की सड़कों का उद्घाटन भी कल ही किया (दि एशियन एज, नवोदय टाइम्स की लीड)। मेरे नौ अखबारों में अकेले द टेलीग्राफ ने चुनाव आयोग के राजनीतिकरण और ईडी, सीबीआई की तरह अब चुनाव आयोग का खुलकर चुनावी उपयोग किये जाने के संकेत देने वाली खबर बनाई है।

आप जानते हैं कि बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2025 की मतदाता सूची तैयार होने के बावजूद चुनाव आयोग ने बिहार मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) शुरू किया और जब यह शंका हुई कि इसका मकसद मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाना हो सकता है तो इसकी वैधता (या जरूरत) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिका पर सुनवाई लंबी चली लेकिन जो खबरें आई उससे लगने लगा कि सुनवाई एसआईआर की प्रक्रिया पर चल रही है।

दूसरी ओर राहुल गांधी ने कर्नाटक के बैंगलोर सेंट्रल लोकसभा सीट के एक विधानसभा क्षेत्र, महादेवपुरा में चुनाव नतीजे और मतदाता सूची का विश्लेषण कर यह आरोप लगाया कि भाजपा ने बैंगलोर लोकसभा सीट चोरी के वोटों से जीती है। यही नहीं, राहुल गांधी ने कहा है कि भाजपा के बहुमत या नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री होने के लिए आवश्यक 25 सीटें भी ऐसे ही चोरी जीती गई हैं। चुनाव आयोग उन्हें मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची दे तो वे इसे साबित कर देंगे। इसपर चुनाव आयोग से ज्यादा भाजपा के लोगों की प्रतिक्रिया आई और कुछ ठोस होता उससे पहले कल बिहार में राहुल गांधी की अधिकार यात्रा का कार्यक्रम था। यात्रा तो हुई ही, उसके अलावा जो सब हुआ उसमें यात्रा की खबर आज दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर ढूंढ़नी पड़ रही है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने जो आरोप लगाये हैं या धमकी दी है वह आज कई अखबारों में प्रमुखता से है। राहुल गांधी, अधिकार यात्रा, वोट चोरी के उनके आरोप और चुनाव आयोग के तथाकथित जवाब पर कायदे की खबर द टेलीग्राफ में है। मुख्य शीर्षक को हिन्दी में ‘चुनावी चूक’ कहा जा सकता है। उपशीर्षक है, राहुल से निपटने के चुनाव आयोग के तरीके : चुप्पी, घबराहट, विचित्र तर्क। इसके तहत दो खबरें हैं। एक का शीर्षक है,  मामले को ठंडा करने के चुनाव आयोग के विरल प्रयास में बहानों की भरमार। दूसरी खबर बिहार में राहुल गांधी की यात्रा और चुनाव प्रचार की है। इसका शीर्षक है, राहुल ने यात्रा में कहा – भाजपा-चुनाव आयोग को वोट चुराने नहीं दूंगा।

कहने की जरूरत नहीं है कि देश में जो राजनीतिक स्थितियां हैं उसका यह एक निष्पक्ष प्रदर्शन कहा जा सकता है। राहुल गांधी की अधिकार यात्रा से भाजपा को बचाने के लिए चुनाव आयोग अगर मैदान में उतरा है तो खबर वैसी ही है और इसके लिए यात्रा के महत्व या प्रभाव का नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिये। इसलिये यह भी बराबर में है। द टेलीग्राफ ऐसी प्रस्तुति और शीर्षक के लिये जाना जाता है और मुझे लगता है कि अपनी शुरुआत के समय से यह ऐसा ही है। बीच में इसके पहले पन्ने का मजा कम हो गया था। संभव है, यह अक्सर होने वाले आधे पन्ने के विज्ञापनों के कारण भी होता होगा। आज विज्ञापन नहीं है और अखबार का पहला पन्ना अपने पुराने रूप में है। इन दिनों जब ज्यादातर अखबारों का पहला पन्ना सरकार समर्थक प्रचार की खबरों से भरा होता है तब आज द टेलीग्राफ का पहला पन्ना सुखद है। राहुल गांधी की अधिकार यात्रा की खबर आज अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में भी पहले पन्ने पर है। अमर उजाला में चुनाव आयोग की बकवास लीड है। शीर्षक है, “एसआईआर पर कुछ राजनीतिक दल फैला रहे भ्रम हमारे कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे गोली : सीईसी”। मुख्य चुनाव आयुक्त यानी सीईसी ने अगर ऐसा कहा है तो यह निश्चित रूप से खबर है लेकिन ऐसा कहने की जरूरत और इसके उद्देश्य को भी समझा जाना चाहिये। इसके आधार पर ही किसी खबर को महत्व दिया जाना चाहिये। मुझे लगता है कि इस लिहाज से यह लीड लायक खबर नहीं है और अगर इसे समझे बिना लीड बनाया जाता होता तो राहुल गांधी वाली खबर छोटी क्यों है? जाहिर है, अखबार भी राजनीति कर रहे हैं जो उनका काम नहीं है और मकसद नहीं होना चाहिये।

आज द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, “सात दिन में शपथपत्र दाखिल करें या माफी मांगे : चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से कहा”। मुझे लगता है कि चुनाव आयोग ने ऐसा कहा है तो यह शीर्षक है और अपनी गंभीरता या फूहड़पन के कारण लीड भी हो सकता है लेकिन फैसला करने वाले को यह ध्यान देना चाहिये था कि चुनाव आयोग ने यह नहीं कहा है कि राहुल गांधी ऐसा नहीं करेंगे तो वह क्या करेगा? आप जानते हैं कि राहुल गांधी का यह आरोप पुराना है और उनके बाद भाजपा नेता अनुराग ठाकुर भी लगभग ऐसे ही आरोप लगा चुके हैं। चुनाव आयोग ने उनसे माफी मांगने के लिए नहीं कहा है और इसके लिए भी एक घटिया, बेमतलब तथा फूहड़ कारण बता चुका है। ऐसे में राहुल गांधी के माफी मांगने या शपथपत्र देने की कोई उम्मीद नहीं है और चूंकि नहीं देने या मांगने पर क्या किया जायेगा (या चुनाव आयोग कर सकता है) स्पष्ट नहीं है। ऐसे में इसे लीड बनाना चुनाव आयोग यानी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सेवा हो सकती है। हालांकि, राहुल गांधी की रैली और उनके आरोप को भी अखबार ने पर्याप्त गंभीरता दी है तथा यह सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक है – “वोट चोरी खूब हो रही है, भाजपा गलत तरीकों से जीत रही है : राहुल”। पांच और दो कॉलम की इन खबरों के साथ आठवें कॉलम में प्रधानमंत्री की खबर सिंगल कॉलम में है और सिंगल कॉलम की फोटो में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के साथ एक तीसरा व्यक्ति भी है। जाहिर है कि हेडलाइन मैनजमेंट की सरकार की कोशिशों का एक नतीजा यह भी है।

दि इंडियन एक्सप्रेस ने चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस के साथ राहुल गांधी की यात्रा की खबर को भी लीड बनाया है लेकिन चुनाव आयोग की खबर ऊपर या पहले है। शीर्षक भी चुनाव आयोग वाला बड़ा व ऊपर है। इसका फ्लैग शीर्षक भी है, (चुनाव आयोग ने) एसआईआर का बचाव किया, मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों को खारिज किया। मुख्य शीर्षक है, राहुल गांधी की बिहार यात्रा शुरू हुई तो चुनाव आयोग ने उनसे कहा : 7 दिन में शपथपत्र दें या देश से माफी मांगें। राहुल गांधी वाली खबर उपशीर्षक के साथ है, “राहुल गांधी ने चुनाव आयोग को निशाना बनाया : (कहा) “एसआईआर चुनाव चोरी की नवीनतम साजिश है… यह चोरी नहीं होने दूंगा”। उपशीर्षक है, “अनुराग ठाकुर ने वही बात कही जो मैंने….. उनसे शपथपत्र क्यों नहीं मांगा जा रहा है : विपक्ष के नेता। मेरे नौ अखबारों में इन तीन ने अगर चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस को महत्व दिया है तो टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स में लीड उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार की घोषणा है। इसके साथ बताया गया है कि यह आरएसएस के प्रभाव के कारण है। उम्मीदवार सीपी राधाकृष्ण महाराष्ट्र के राज्यपाल थे तथा तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। महाराष्ट्र से पहले झारखंड, तेलंगाना के राज्यपाल और पुड्डुचेरी के उपराज्यपाल रह चुके हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि उनका जीतना एक औपचारिकता है। यही खबर हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है। मुख्य खबर के साथ छपी एक खबर के अनुसार, ओबीसी चेहरा, तमिलनाडु के वेट्रन और आरएसएस के प्रभाव में चुने गये हैं।

दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, दिल्ली में यातायात की भीड़ कम करने के लिए मोदी ने 11000 करोड़ की सड़कों का उद्घाटन किया। इस मौके पर दिये गये भाषण के अंश को नवोदय टाइम्स ने शीर्षक बनाया है। “पिछली सरकारों ने दिल्ली का बेड़ा गर्क किया, हमारा फोकस विकास पर : मोदी”। यहां चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस का एक तीसरा पक्ष भी है और वह है, तीसरा विकल्प नहीं। शीर्षक है, हलफनामा दें या माफी मांगे, तीसरा विकल्प नहीं। गौरतलब है कि चुनाव आयुक्त के अनुसार, वोट चोरी कहना संविधान का अपमान है (देशबन्धु का शीर्षक)। आप जानते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त एक संवैधानिक संस्था के मुलाजिम या मुखिया हैं तथा अमित शाह की करीबी के कारण सरकार ने उन्हें इस पद पर बैठा दिया है और उनकी नियक्ति से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। फिर भी वे एक संवैधानिक संस्था के प्रमुख हैं और विपक्ष के नेता राहुल गांधी एक संवैधानिक पद पर हैं। निर्वाचित हैं या प्राप्त वोट और जनता के समर्थन से इस पद के लिए चुने गये हैं। उनका पद किसी की मेहरबानी से हासिल नहीं है और उन्हें जनता की ही सेवा करनी है जबकि मुख्य चुनाव आयुक्त को निर्देश या उनका मकसद आका की सेवा हो सकता है। इसके बावजूद वे संवैधानिक पद पर तैनात व्यक्ति को प्रेस कांफ्रेंस के जरिये संदेश दे रहे हैं जो धमकी जैसा है। यह देश की हालत है और प्रधानमंत्री जीएसटी सुधारों से दोहरा लाभ देने की चुनावी घोषणा कर रहे हैं जो अमर उजाला के पहले पन्ने पर चार कॉलम की शीर्षक है। यह मतदाताओं को धोखे में रखने की सराकारी कोशिश में सहयोग करने का उदाहरण है क्योंकि जीएसटी मनमानियों के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो वह नरेन्द्र मोदी के बाद ही होगा। ऐसा व्यक्ति अब जनता को खुश करने लिए जीएसटी सुधार का दिखावा कर रहा है और यह अखबार उसका बेशर्म प्रचार करने में लगा है।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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