तनसीम हैदर-
पिछले आठ-दस वर्षों में मेनस्ट्रीम मीडिया के एक बड़े हिस्से ने अपनी आत्मा सत्ता के दरबार में गिरवी रख दी। पत्रकारिता का धर्म छोड़कर सत्ता की पीआर एजेंसी बनने की जो होड़ मची, उसका नतीजा आज सबके सामने है। जनता का भरोसा टूटा है और उसकी कीमत सबसे नीचे खड़ा रिपोर्टर चुका रहा है। जब न्यूज़रूम ने सत्ता से सवाल पूछना बंद कर दिया। जब सरकार की नाकामियों पर बहस की जगह जय-जयकार ने ले ली जब महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और आम आदमी के मुद्दों को किनारे कर सत्ता का एजेंडा ही प्राइम टाइम बन गया तब पत्रकारिता नहीं, उसकी आत्मा मरी थी।
कहाँ गए वो स्टिंग ऑपरेशन? कहाँ गई खोजी पत्रकारिता? कहाँ गई सत्ता की जवाबदेही तय करने वाली रिपोर्टिंग? क्यों हर असहज सवाल गायब हो गया? क्यों हर आलोचना को दुश्मनी और हर प्रशंसा को राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बना दिया गया? 25 साल की पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर मैं एक बात पूरे विश्वास से कहता हूँ कि सड़क पर मार खा रहा रिपोर्टर इस गिरावट का असली दोषी नहीं है। वह आदेशों का पालन करने वाला कर्मचारी है। उसकी नौकरी, उसका परिवार और उसकी मजबूरियाँ हैं। असली जिम्मेदार वे लोग हैं जो न्यूज़रूम की सबसे ऊँची कुर्सियों पर बैठे हैं। करोड़ों के पैकेज, सत्ता के गलियारों तक सीधी पहुँच और एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठकर उन्होंने तय किया कि देश क्या देखेगा, क्या नहीं देखेगा, किससे सवाल होगा और किससे नहीं होगा। उन्होंने पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सत्ता के प्रचार का औज़ार बना दिया।
याद रखिए, जब मीडिया सत्ता की गोद में बैठ जाता है, तब जनता उसे अपने कंधों से उतार देती है। सम्मान छीना नहीं जाता, कमाया जाता है और जब पत्रकारिता सवाल पूछना छोड़ देती है, तब जनता भी उस पर भरोसा करना छोड़ देती है। यह सिर्फ़ मीडिया का संकट नहीं है, यह लोकतंत्र के आईने पर पड़ी सबसे गहरी दरार है यदि अभी भी आत्ममंथन नहीं हुआ, तो इतिहास सिर्फ़ इतना लिखेगा कि पत्रकारिता मरी नहीं थी उसे उसके अपने संरक्षकों ने मार डाला था।
पत्रकार जब विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ता बनते जा रहे हों तो उनके साथ वही होगा, जो 20/07 को हुआ। प्रवक्ता बन जाने की उनकी मजबूरी के पीछे मीडिया हाउस का दबाव नहीं बल्कि उनका ख़ुद का लबोरपन है।
-शंभुनाथ शुक्ला, वरिष्ठ संपादक
नितिन ठाकुर-
किसी पत्रकार या चैनल के नैरेटिव से आपके दिक्कत थी इसलिए यूट्यूब पर लाखों चैनल बने जिन्होंने अपने इकतरफा नैरेटिव फैलाए। बढ़िया है। यही तरीका होना चाहिए किसी लोकतंत्र में। लेकिन अपने बीच निहत्थे पहुंचे पत्रकारों को घेरकर मारपीट करना?? ये मत कीजिए। आप तो भीड़ का फायदा उठाकर आज मारपीट करके लौट जाएंगे लेकिन ये हरकतें एक सिलसिला शुरू कर देंगी, और फिर आपको पसंद आनेवाले इंडिपेंडेंट पत्रकार भी सुरक्षित नहीं रह जाएंगे क्योंकि दूसरी तरफ वालों को आपकी बदौलत बहाना मिल चुका होगा।
दूत चाहे जिस तरफ का हो उसके साथ हिंसा प्राचीन काल से मना है। फील्ड पर खड़ा पत्रकार तो वैसे भी सड़क पर चल रही पब्लिक के भरोसे है। अगर आपको प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हिंसा से दिक्कत है लेकिन पत्रकारों के साथ हिंसा पर खुश हैं तो ये बताता है कि “अहिंसक” दिखना आपकी मजबूरी से ज़्यादा कुछ नहीं। आपको हिंसा पसंद है बस आप कर नहीं पाते क्योंकि सामनेवालों का लट्ठ आपसे ज़्यादा मज़बूत है।
ये एक खुला फैक्ट है कि हिंसा किसी भी आंदोलन की पवित्रता खत्म करती है। शासन प्रशासन को मौका देती है कि उसे बल पूर्वक खत्म करा दे क्योंकि तब उनकी प्राथमिकता “लॉ एंड ऑर्डर” बन जाता है। ऐसे में आंदोलनकारियों का ही कर्तव्य है कि वो अपने आंदोलन को खराब कर रहे लोगों को चिन्हित करके उन्हें पुलिस को सौंप दें।
मैं ये मान नहीं सकता कि आंदोलन के लिए देशभर से पहुंचे बच्चे और उनके मां बाप किसी के साथ मारपीट करेंगे। उनकी कहानियां मैंने सुनी हैं। इतने मासूम और दिल पिघला देनेवाले वाकये हैं कि भावुक हुए बिना रहा नहीं जाएगा।
एक नागरिक होने के नाते अपील है कि अपने मन में पल रही हिंसा को दबाएं। अगर आप जंतर मंतर पर हैं और चाहते हैं देश साथ खड़ा रहे तो उदाहरण आपको पेश करना होगा। लोकतंत्र, अहिंसक आंदोलन, आंबेडकर गांधी बोलते बोलते मारपीट कर देने से कुछ नहीं मिलनेवाला।


