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आज के अखबार : टाटा संस को लिस्टिंग के लिए मजबूर करने से ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ का प्रचार याद आया

Collage of three newspapers: Dera Sacha Sauda front page, The Hindu apology notice, and an oil-price headline about Iran.

संजय कुमार सिंह

आज भी अखबारों का पहला पन्ना ब्रिक्स सम्मेलन की खबरों से भरा है। मुझे लगता है कि यह सरकार के प्रचार के लिए है। इसलिए दूसरी खबरें ढूंढ़ता हूं। हिन्दी के मेरे दो अखबारों, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर ब्रिक्स के अलावा जो खबर है वह वनतारा की हथनी, माधुरी से संबंधित वनतारा का बयान है। नवोदय टाइम्स में यह फोटो समेत एक चौथाई पन्ने से ज्यादा में है जबकि अमर उजाला में फोटो छोटी करके ज्यादा संख्या में छापी गई है। इसलिए जगह कम लगी है लेकिन विज्ञप्ति या  बयान लगभग बराबर है। देशबन्धु में ब्रिक्स के अलावा कोई खास खबर नहीं है। दैनिक भास्कर में ब्रिक्स से अलग एक खबर है, होर्मुज के बाद तेल का दूसरा रास्ता भी बंद; क्रूड 110 डॉलर। यहां द टेलीग्राफ की एक खबर उल्लेखनीय है, तेल की बढ़ती कीमतों के बीच (ब्रिक्स)   समूह में इरान भी शामिल है। अखबार ने एक फोटो भी प्रकाशित की है। इसका कैप्शन है, नई दिल्ली में शनिवार को ईरान पैवेलियन में ब्रिक्स बाजार के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसौद पेजेशकियां की बेटी जाहरा पेजेशकियां (एकदम दाएं)।

आज जो दूसरी ‘खबर’ चर्चा करने लायक है वह मेरे सभी अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। अखबारों में खबरें तो छोड़िए विज्ञापनों का भी हाल बुरा है। वनतारा की माधुरी खबर हो या विज्ञापन पहले पन्ने के लायक तो नहीं ही है लेकिन इस व्यवस्था में प्रचारकों की अपनी ताकत है। और यह उसका असर हो सकता है। उदाहरण के लिए, कल मैंने द हिन्दू में छपे डेरा सच्चा सौदा के विज्ञापन की चर्चा की थी। गनीमत है कि आज द हिन्दू ने अपना माफी नामा प्रकाशित किया है। मुझे लगता है कि यह माफी नामा उम्मीद की एक किरण है। बाकी जो है सो तो है ही। आज की खबर सबसे प्रमुखता से टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी है। पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। इसका शीर्षक है, आरबीआई ने निजी बने रहने की टाटा संस की कोशिशों को खारिज किया, लिस्टिंग निर्देश दिया।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का इंट्रो है, नोएल (टाटा) के लिए झटका, एसपी समूह के लिए अच्छा। अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर दो कॉलम में छपी है। शीर्षक है, आरबीआई ने टाटा संस का आग्रह नामंजूर किया; लिस्टिंग की तलवार लटकी। इंडियन एक्सप्रेस में यह तीन कॉलम में है। आरबीआई ने निजी बने रहने के टाटा संस के आग्रह को खारिज किया, सार्वजनिक होने के लिए कहा, मतलब सभी दिशानिर्देशों / निर्देशों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कहा है। अखबार ने लिखा है कि इसका मतलब होगा, टाटा संस को आईपीओ जारी करना होगा और अपने शेयर पूंजी बाजार में सूचीबद्ध (लिस्टिंग) करने होंगे। यह 28 मार्च 2024 के आग्रह के जवाब में है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का उपशीर्षक है, टाटा संस की लिस्टिंग प्रमुख मुद्दा था जिसपर टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी बंटे हुए थे। 

टाटा संस की खबर में एसपी समूह शपूर जी पलोन जी समूह के लिए है। टाटा संस टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी है। इसमें शापूरजी पलोनजी ग्रुप की लगभग 18.37% से 18.4% हिस्सेदारी है। बाकी का बड़ा हिस्सा (~66%) मुख्य रूप से टाटा ट्रस्ट्स के पास है। खबर के अनुसार आरबीआई का फैसला (टाटा संस के) छोटे समूह के लिए अच्छा है। इसमें क्या अच्छा है और क्या बुरा है, क्यों अच्छा है और क्यों बुरा है से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि निजी क्षेत्र की कंपनी जैसे चल रही है वैसे ही नहीं चलती रही तो ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के दावे का कोई मतलब नहीं है। अगर टाटा समूह को परेशानी है (भले उनके आंतरिक विवाद के कारण) तो ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का क्या होगा। वैसे भी इसके बावजूद देश की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है। विदेशी निवेश वापस ज्यादा हुए हैं, आए कम हैं, रोजगार की संभावनाएं नहीं बन रही है।  

खबर थी कि टाटा समूह को एक व्यवसाय के लिए सबसिडी दी गई और उसी समय टाटा समूह ने सत्तारूढ़ पार्टी को मोटा चंदा दिया। गुजरात की अनाम सी पार्टी को भारी चंदा (करीब 4000 करोड़) मिलने की भी खबर है। उसकी जांच नहीं हो रही है और चूंकि इसकी राशि विपक्ष के सभी दलों को मिले चंदे से ज्यादा है इसलिए जो शंकाएं हैं उनका निराकरण जरूरी है पर सरकार और संबंधित संस्थाएं उससे आंख मूंदे हुए हैं। दूसरी ओर टाटा समूह के लोकोपकारी ट्रस्ट से भी विवाद जुड़ा रहा है। खबरों के अनुसार, 2013 में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट में सवाल उठाया गया था कि टाटा के कुछ चैरिटेबल ट्रस्टों ने ऐसे वित्तीय साधनों में भारी निवेश कर रखा था, जिन्हें आयकर कानून के तहत चैरिटेबल ट्रस्ट के लिए प्रतिबंधित माना गया था। सीएजी ने कहा कि नियम उल्लंघन के बावजूद आयकर विभाग द्वारा इन ट्रस्टों को टैक्स छूट दी जा रही थी।

इस विवाद के बाद, 2015 में टाटा समूह के छह प्रमुख ट्रस्ट्स — जमशेदजी टाटा ट्रस्ट, नवाजबाई रतन टाटा ट्रस्ट, आरडी टाटा ट्रस्ट आदि ने स्वयं टैक्स छूट को सरेंडर (वापस) करने का फैसला किया। टाटा समूह का तर्क था कि टैक्स छूट से जुड़े कड़े नियमों और विवादों के बजाय, वे सामान्य कॉर्पोरेट संस्था की तरह टैक्स चुकाकर अपने लोकोपकारी कार्यों को स्वतंत्रतापूर्वक जारी रखना चाहते हैं। अक्टूबर 2019 में आयकर विभाग ने इन 6 ट्रस्टों का टैक्स-फ्री रजिस्ट्रेशन आधिकारिक रूप से रद्द कर दिया। विभाग का कहना था कि नियम उल्लंघन के कारण यह कार्रवाई की गई, जबकि टाटा समूह का कहना था कि यह उनके द्वारा 2015 में दी गई उनकी अपनी स्वैच्छिक (Voluntary) अर्जी का ही नतीजा है। जो भी हो, एक लोकोपकारी ट्रस्ट को टैक्स देने के लिए मजबूर किया गया।

टैक्स वसूली के सख्त और अव्यावहारिक नियमों के कारण देश के कई एनजीओ का काम संकट में है। कई बंद हो चुके हैं। इससे भी रोजगार कम हुए हैं, समाज सेवा के काम नहीं हो पा रहे हैं लेकिन सरकार टस से मस नहीं हो रही है। मकसद सरकारी राजस्व होता तो एक बात थी लेकिन टैक्स कम करके वोट लेने की कोशिश भी हो चुकी है। विपक्ष की सरकार पर ऐसी कार्रवाई के लिए ईडी-सीबीआई लगा दी जाती है और सरकार की अपनी कार्रवाई की कोई जवाबदेही नहीं है। अब जो कार्रवाई हुई है वह ट्रस्ट और ट्रस्ट के जरिए कंपनी या व्यवसाय चलाने को प्रभावित करेंगे। मेरा मानना है कि ऐसे मामलों में व्यवसाय को नुकसान और अस्थिर होने का खतरा रहता है।

सरकारी कार्रवाई अगर टाटा ट्रस्ट को प्रभावित करेगी तो वह जितनी कंपनियां या व्यवसाय चलाता है सब प्रभावित होंगी और इससे रोजगार से लेकर टैक्स वसूली कम होने का खतरा होता है। दूसरी ओर, यह आश्वासन नहीं है कि सरकारी कार्रवाई का मकसद क्या है। नियमों के अनुपालन में अगर किसी कंपनी को ऐसी परेशानी हो कि वह अपना काम ही नहीं कर पाए तो नुकसान देश का होगा। कंपनी के संसाधन कानून के अनुपालन या नोटिस के जवाब में लगेंगे तो काम का नुकसान होगा। नोटबंदी और जीएसटी से ऐसा हो चुका है। कई व्यवसायी और व्यवसाय बर्बाद हो गए। इलेक्टोरल बांड से भारी वसूली के संकेत हैं और अब अगर टाटा के मामले में नई कार्रवाई हुई है तो सतर्क होने का समय है।

आपको याद होगा कि रतन टाटा के रिटायरमेंट की उम्र में पहुंचने पर नोएल टाटा उनके उत्तराधिकारी नहीं बने थे। साइरस मिस्त्री 2012 में रतन टाटा के सेवानिवृत्त होने पर टाटा संस के छठे चेयरमैन बने थे। वे इस पद को संभालने वाले टाटा परिवार से दूसरे व्यक्ति थे। वे शापूरजी पलोनजी ग्रुप के पूर्व चेयरमैन पलोनजी मिस्त्री के छोटे बेटे थे। अक्टूबर 2016 में टाटा संस के बोर्ड ने मतभेदों के कारण उन्हें चेयरमैन पद से हटा दिया था। इसके बाद टाटा समूह और मिस्त्री के बीच एक लंबा कानूनी विवाद चला। 4 सितंबर 2022 को अहमदाबाद से मुंबई लौटते समय महाराष्ट्र के पालघर जिले में एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया था।

जो नहीं जानते हैं उनके लिए बताना जरूरी है कि टाटा संस टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी है। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन 2017 से इस पद पर हैं और पूरे टाटा ग्रुप के व्यावसायिक संचालन और कंपनियों को संभाल रहे हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी है और यह मुख्य रूप से परोपकारी और धर्मार्थ कार्यों से जुड़ा है। रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन बनाया गया है। नोएल टाटा, रतन टाटा के उत्तराधिकारी के रूप में टाटा ट्रस्ट्स के प्रमुख हैं, जबकि टाटा समूह/टाटा संस के प्रमुख एन चंद्रशेखरन ही हैं। अगस्त 2026 में इन्होंने यह घोषणा कर दी है कि वे अपना मौजूदा कार्यकाल समाप्त होने के बाद तीसरे कार्यकाल के लिए दावेदारी नहीं करेंगे।  हालाँकि, उन्होंने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा नहीं दिया है। वे अपना तय कार्यकाल खत्म होने यानी 20 फरवरी 2027 तक पद पर बने रहेंगे।

खबरों के अनुसार, टाटा ट्रस्ट्स तथा नामांकन समिति ने चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों का सेवा विस्तार देने की सिफारिश की थी। लेकिन 24 फरवरी 2026 की टाटा संस बोर्ड बैठक में एक सदस्य (रिपोर्ट्स के अनुसार नोएल टाटा) ने 5 साल के विस्तार का विरोध किया था, जिससे सर्वसम्मति नहीं बन पाई। नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच नए कारोबारों (जैसे एअर इंडिया, टाटा डिजिटल और सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स) में भारी घाटे/निवेश और टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने या न कराने को लेकर मतभेद बताए गए हैं। चंद्रशेखरन ने कहा है कि छह महीने बाद भी जब कार्यकाल विस्तार पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हो पाया, तो ग्रुप के बड़े रणनीतिक प्रोजेक्ट्स, कर्मचारियों और निवेशकों के हित में उन्होंने खुद ही अगला कार्यकाल न लेने का फैसला किया ताकि उत्तराधिकारी की प्रक्रिया समय रहते शुरू हो सके।

मुझे लगता है कि टाटा समूह और या टाटा संस जब खुद ही आंतरिक संकट में दिख रहा है, नए प्रोजेक्ट्स से इस सरकार की संबद्धता है तब सरकार और सरकारी निर्णय के मायने हैं और कहीं ऐसा न हो कि इसका नुकसान समूह को हो जो आखिरकार कई तरह से  देश के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है। मुझे लगता है कि कारोबारी मामलों में जरूरत से ज्यादा सरकारी हस्तक्षेप देश के उद्योग व्यवसाय के लिए चिन्ता का विषय है। सरकारी हस्तक्षेप और दबाव समय-समय पर भिन्न रूपों में दिखते रहे हैं लेकिन खबरें ऐसी या इससे संबंधित नहीं दिखती हैं। इसलिए आज यह चर्चा।  

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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