दृगराज मद्धेशिया-
एक बार बतौर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह जी और उनके साथ अमर सिंह जी गोरखपुर में गैलेंट सरिया और IGL का उद्घाटन करने आए थे। तब सहारा समय में मैं स्ट्रिंगर था और शक्ति श्रीवास्तव जी ब्यूरो चीफ। कैमरापर्सन शायद रत्नेश जी साथ में थे।
मंच से दोनों नेता जैसे ही उतरे, सत्या चैनल से लेकर ANI तक की आईडी उनके सामने लग गईं। पत्रकारों के सवाल चुभने वाले नहीं थे। कानून-व्यवस्था पटरी से उतर गई थी। शक्ति जी के अंदर का पत्रकार जागा और उन्होंने तपाक से पूछ लिया, “नेता जी! इस समय अपराधी बेलगाम हैं और कानून-व्यवस्था…”
सवाल पूरा भी नहीं हो पाया था कि अमर सिंह जी ने माइक की आईडी पकड़ ली। चूंकि उस भीड़ के बीच आईडी लेकर सबसे आगे मैं आधे घुटनों पर था, अचानक आईडी पर हाथ लगने से हड़बड़ा गया। अमर सिंह जी ने कहा, “सहारा से हो, बाद में तुम्हें देखेंगे।”
नेता जी ने तो कुछ कहा नहीं, लेकिन बुरी तरह नाराज़ हो गए। और हम लोगों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। सवाल का जवाब नहीं मिलने पर हम लोग भी इन मोहतरमा जैसे खुश नहीं थे।
मतलब साफ है। इस स्थिति में मुस्कुराहट तभी आएगी, जब संस्थान या किसी के इशारे पर पहले से ऐसा करना तय हो। इसके परिणाम पहले से ही मालूम हों और फायदा, नुकसान से कई गुना अधिक हो। पत्रकार होतीं तो उस रील में सवाल भी होता!
अनिल कुमार-
पत्रकारिता ऐसे ही होनी चाहिये कि जब मंचासीन व्यक्ति उठकर निकल जाये तब वीडियो बनवाते हुए जोर जोर से चिल्लाकर कहना चाहिये कि मेरे सवालों का जवाब दीजिये, मेरे सवालों का जवाब दीजिये. भले ही मंच पर रहते समय कोई सवाल ना पूछा हो, लेकिन चिल्लाना तो चाहिये ही कि सवाल का जवाब दीजिये.
मुझे इससे कोई ऐतराज नहीं है, कि आप रील बनाने के लिये चीखो चिल्लाओ, लेकिन मैं आने वाले आगे के समय को देखकर परेशान जरूर हो रहा हूं. अभी फिलहाल ये स्थिति है कि नेता और अधिकारी एजेंडाधारी पत्रकारों के सवालों से आजीज आकर प्रेस कांफ्रेंस करना बिल्कुल ही ना खत्म कर दें.
अक्सर मैं देखता हूं कि प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार जनहित के मुद्दों से जुड़े सवाल कम पूछते हैं, एजेंडे से जुड़े सवाल ज्यादा करते हैं. ऐसा अखिलेश की भी पीसी में होता है, योगी की पीसी में भी होने लगा है, मोदी तो खैर पीसी करते ही नहीं हैं, राहुल गांधी के यहां तो इस तरह के लोगों की इंट्री नहीं होती है.
फिर भी हम पत्रकारों को अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिये कि हम सचमुच में पत्रकारिता ही कर रहे हैं? दरअसल, पत्रकारिता के पेशे में आने के लिये वकालत की तरह कोई कोर एसोसिएशन नहीं है, जहां से प्राथमिक परीक्षा पास करके ही आपको पत्रकारिता के पेशे में घुसना आवश्यक हो.
यहां कोई भी पत्रकार बन सकता है. उसके लिये शिक्षा या पढ़ाई लिखाई की कोई जरूरत नहीं है. यह पेशा नेतागिरी से ठीक मिलता जुलता हुआ है, जहां आप चमचागिरी करके, अपनी पार्टी बनाकर, तेल लगाकर पद पा जाते हैं. पत्रकारिता में भी ऐसा ही है, अखबार, मैगजीन निकालिये और सीधे संपादक हो जाइये.
गलती सबसे होती है. पढ़े लिखे पत्रकारों से भी गलती होती है, इंसान हैं तो गलती भी स्वभाविक है, लेकिन पत्रकारिता को नौकरी या पेशा समझने की बजाय वसूली और पॉवर का माध्यम समझकर आने वाले इसकी लुटिया डूबो देते हैं. इस फील्ड में इस तरह की मानसिकता के लोगों की भरमार हो गई है.
मैं निजी रूप से ऐसे कई लोगों को जानता हूं, जो दूसरे धंधे करते थे और पत्रकारों के चमचे थे. उनसे अपना काम निकलवाने के लिये दारू-मुर्गा कराते थे. बाद में वह अपना धंधा संभालते हुए कार्ड बनवाकर, मान्यता लेकर, अखबार-मैगजीन निकालकर पत्रकार हो गये हैं, और उनकी हनक भी बहुत है.
कोई आरटीआई डालते डालते पत्रकार हो गया, कोई पुराने कार की खरीद बिक्री में मदद के बदले पत्रकारों को दारू पिलाते पिलाते पत्रकार हो गया, कोई स्टैंड का ठेका के चक्कर में पत्रकार के पीछे घूमते घूमते पत्रकार हो गया, कोई समाज सेवा करके विज्ञप्ति छपवाने के चक्कर में पत्रकार हो गया.
दरअसल, पत्रकार हो जाना कोई बुराई नहीं है, लेकिन जब आप उचित तरीके से किसी पेशे में नहीं आते, उसके तौर तरीकों को समझकर पेशे में नहीं आते, तब दिक्कत वहां होती है. जैसे कंपाउंडरी करते करते बहुतेरे झोला छाप डाक्टर हो जाते हैं, वैसे ही इस पेशे में कई झोला छाप पत्रकार हैं, जो पत्रकारिता को गलत इंजेक्शन दे रहे हैं.
गलत इंजेक्शन लगने की वजह से ही आज लोकतंत्र का स्वघोषित चौथा खंभा लगातार दरकता जा रहा है. अब तो नये दौर में रीयल पत्रकारिता को खत्म कर रील पत्रकारिता का उदय हो चुका है. अब यह रील पत्रकारिता इस पेशे को कहां तक ले जायेगा, इसका तो बस इंतजार ही किया जा सकता है!
तुषार राय-
लाल टोपी, लाल ड्रेस.. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान महिला पत्रकार द्वारा पूछे गए सवाल और उनके तरीक़े को लेकर सोशल मीडिया पर विवाद जारी है।जहाँ एक तरफ़ इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित और प्रायोजित घटना बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ इसे पत्रकारिता के अधिकार का हनन जोड़कर भी देखा जा रहा है।
सवाल पूछने का तरीक़ा, आलोचकों और सोशल मीडिया यूज़र्स का दावा है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस समाप्त होने के बाद महिला पत्रकार द्वारा जिस तरह से सवाल पूछा गया,वह सामान्य पत्रकारिता प्रोटोकॉल के अनुकूल नहीं था। जबकि सामने प्रदेश के मुख्यमंत्री मौजूद ऐसे शख्सियत के सामने पद-गरिमा के अनुसार व्यवहार-शिष्टाचार जरूरी होता हैं.
इस पूरे घटनाक्रम को समाजवादी पार्टी से जोड़कर देखा जा रहा है। गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं कि यह घटनाक्रम किसी राजनीतिक एजेंडे या व्यक्तिगत प्रचार का हिस्सा हो सकता है।घटना के शुरुआती वीडियो को सबसे ज़्यादा समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों द्वारा शेयर व प्रमोट किया,जिससे इसे राजनीतिक रंग मिलने के दावे और मज़बूत हुए।महिला के लाल ड्रेस को लाल टोपी का हिस्सा माना जा रहा. कायस लगाया जा रहा है कि जल्द ही सपा पार्टी में एक बेहतर पद मिलने की उम्मीद हैं?


arun srivastava
September 15, 2026 at 3:20 pm
नेता जी से ऐसा कौन सा क्रांतिकारी सवाल कर दिया था।
वैसे ये जगजाहिर है कि सहारा समूह सपा का चमचा है।
arun srivastava
September 15, 2026 at 3:29 pm
जब सीएम योगी आदित्यनाथ रुके ही नहीं तो सवाल हवा से करतीं क्या?