देवप्रिय अवस्थी-
वह अनूठा फेयरवेल गिफ्ट…
चंडीगढ़ से मुक्त होकर मैं अप्रैल 1988 के पहले हफ्ते में दिल्ली पहुंचा. उस समय मेरा मन अनिश्चित और अंधेरे भविष्य की सिहरन से भरा हुआ था, लेकिन यहां तो एक अप्रत्याशित जिम्मेदारी मेरा इंतजार कर रही थी. वह थी जनसत्ता के मुंबई संस्करण को लांच करने की जिम्मेदारी. मेरे दिल्ली पहुंचते ही प्रभाष जी ने मुझे मुंबई संस्करण की तैयारी करने के लिए वहां जाने को कहा और उसके लिए आए आवेदनों की फाइल देते हुए निर्देश दिया कि इसमें कोई काम के लोग लगें तो उन्हें टेस्ट और इंटरव्यू के लिए छांट लो.
मुझे नहीं लगता कि हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में ऐसा पहले कभी हुआ होगा या फिर कभी होगा जब टर्मिनेशन नोटिस पीरियड में किसी पत्रकार को नया संस्करण शुरू करने की जिम्मेदारी दी गई हो. प्रभाष जी द्वारा मुझ पर जताए गए इस विश्वास को मैं अनूठा फेयरवेल गिफ्ट मानता हूं.
जनसत्ता का मुंबई संस्करण दिल्ली और चंडीगढ़ संस्करणों की तुलना में कहीं ज्यादा जोर-शोर से लांच हुआ. इसका ले-आउट और डिजाइनिंग भी दोनों संस्करणों की तुलना में बोल्ड थी. किसी हिंदी अखबार में समाचार पेजों पर रंगीन फोटो छापने की शुरुआत यहीं से हुई थी. तब रंगीन फोटो का चयन पेज की डिजाइनिंग शुरू करने से कम से कम चार घंटे पहले करना होता था.
लांचिग के सिलसिले में दिल्ली जनसत्ता में साथ काम कर चुके आलोक तोमर और सतीश पेंडनेकर भी मुंबई भेजे गए थे. प्रभाष जी जिन जयंत मेहता को इस संस्करण का स्थानीय संपादक बनाने का इरादा रखते थे उनके रंग-ढंग देखकर उन्हें संस्करण का प्रकाशन शुरू होने के चंद दिन बाद ही कार्यमुक्त कर दिया गया. ओमप्रकाश सिंह, संजय निरुपम, संजय सिंढायच, शिव अनुराग पटेरिया, इंद्र कुमार जैन, सदानंद गोडबोले, द्विजेंद्र तिवारी, गोपाल मिश्र (दिल्ली वाले नहीं), अनुराग त्रिपाठी, रविराज प्रणामी आदि मुंबई जनसत्ता की शुरुआती टीम के सदस्य थे. मैं करीब दो-ढाई महीने मुंबई रहा होऊंगा. प्रभाष जी बीच-बीच में दिल्ली से आते-जाते रहते थे.
जुलाई के पहले हफ्ते में कानपुर में मेरे दो छोटे भाइयों की शादी थी इसलिए 20 जून के आसपास मैंने प्रभाष जी को अवकाश का आवेदन दिया और याद दिलाया कि 30 जून को मेरा नोटिस पीरियड पूरा हो रहा है. तब उन्होंने कहा कि पूरी तरह निश्चिंत होकर भाइयों की शादी निपटा कर दिल्ली आओ. आगे क्या करना है, इस पर वहीं बात करेंगे. भाइयों की शादी के बाद 7-8 जुलाई 88 को मैं दिल्ली लौटा और प्रभाष जी से मिलने एक्सप्रेस बिल्डिंग गया तो पता चला कि वे मुंबई में हैं. उन्हें टेलीप्रिंटर पर संदेश देकर पूछा कि मेरे लिए अब क्या निर्देश हैं?
जवाब मिला- ‘यू मे गेट समथिंग बिगर समव्हेयर एल्स’. तीन दिन बाद प्रभाष जी दिल्ली लौटे. उन्होंने बताया कि इंदौर के एक उद्योगपति वहां नया अखबार निकाल रहे हैं. तुम वहां जाकर यह अखबार निकालने की जिम्मेदारी लो. हालांकि उन्होंने जनसत्ता, दिल्ली में बने रहने का भी विकल्प दिया. चूंकि दिल्ली जनसत्ता के स्थानीय संपादक बनवारी के मित्र जितेंद्र बजाज के कारण मुझे सेवामुक्ति का नोटिस दिया गया था इसलिए मैंने इंदौर जाने का विकल्प स्वीकार किया. इसी के साथ जनसत्ता में मेरी दूसरी पारी पर विराम लग गया.
दो-तीन दिन बाद इंदौर से निकलने वाले नए अखबार चौथा संसार के प्रकाशक सुरेंद्र संघवी और उनके सलाहकार व प्रभाष जोशी के मौसेरे भाई महेंद्र जोशी दिल्ली आए. वे चौथा संसार में कार्यकारी संपादक के रूप में मेरी नियुक्ति की बात पक्की कर गए. इस अखबार के संपादक बहु-भाषाविद साहित्यकार और चलता -फिरता ज्ञान कोश डाक्टर प्रभाकर माचवे थे. बाद में पता चला कि सुरेंद्र संघवी ने रज्जू बाबू से भी मेरे बारे में सलाह ली थी. रज्जू बाबू मेरे बारे में प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए मेरे चयन को सही बताया था. इस तरह जुलाई 88 के मध्य में मैं इंदौर पहुंच गया और जनसत्ता और दिल्ली से नाता टूट गया.
अभियान, जो संस्थान नहीं बन पाया
जनसत्ता से मुक्त होने के बाद के 38 सालों में मुझे चौथा संसार (इंदौर), दैनिक नई दुनिया (भोपाल), दैनिक भास्कर (भोपाल, रायपुर और जयपुर), अमर उजाला (नोएडा) और राजस्थान पत्रिका (नोएडा) में वरिष्ठ पदों पर काम करने का मौका मिला. मैंने इन अखबारों में उनके प्रबंधनों की दृष्टि से तथा खुद की दृष्टि से भी कमोबेश ठीक-ठाक काम किया. लेकिन जब कभी पुरानी यादों में खो जाता हूं तो पाता हूं कि मेरी सुई जनसत्ता में ही अटकी हुई है. कभी-कभी सोचता हूं कि प्रभाष जी ने अपनी दूसरी लाइन चुनने में गफलत नहीं की होती और जनसत्ता में जनसत्ता को बनाने वालों को ही आगे बढ़ाया होता तो उसके आज की तरह रिरियाने की नौबत नहीं आती (रिरियाना शब्द प्रभाष जी ने ही प्रयोग किया था).
जनसत्ता की दुर्गति की एक बड़ा कारण उसका सही समय पर अभियान से संस्थान में तब्दील नहीं हो पाना भी रहा. प्रभाष जी की पूरी पृष्ठभूमि सर्वोदय और जेपी आंदोलन की थी. वे आंदोलन या अभियान के पत्रकार थे. जनसत्ता के शुरुआती दौर में इस अभियान पत्रकारिता ने उसे अलग पहचान दी मगर कोई भी अखबार अभियान पत्रकारिता से स्थायित्व नहीं पा सकता. स्थायित्व के लिए जरूरी था कि उसे संस्थान का रूप दिया जाता.
1984 के मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस की भारी जीत के बाद प्रभाष जी ने नीतिगत फैसला किया कि अब आगे के पांच साल जनसत्ता को विपक्ष की भूमिका निभानी है. शायद एक्सप्रेस समूह के मुखिया रामनाथ गोयनका की भी यही मंशा रही होगी. मैं मानता हूं कि यह एक ऐतिहासिक भूल थी जिसने जनसत्ता को अभियान से संस्थान में तब्दील नहीं होने दिया. न तो गुजरा समय लौटता है और न ही ऐतिहासिक भूलों को दुरुस्त किया जा सकता है.
प्रभाष जी भी मानवीय कमजोरियों या गुण-दोषों से परे नहीं थे. जैसी चूकें और बहुतेरे लोग करते हैं, वैसी चूकें उन्होंने भी कीं. उन्होंने कई ऐसे लोगों को अपनाया, बढ़ाया, उंगली पकड़ कर चलना सिखाया और सीढ़ियों पर चढ़ाया जो अपना उल्लू साध कर उनसे किनारा कर गए. ऐसे लोग जनसत्ता और दूसरे अखबारों में भी थे और समाज, राजनीति तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी. ऐसा भी नहीं है कि प्रभाष जी अपनी बात पर अड़े रहते हों और बदलते नहीं हों. इसका सबसे बड़ा उदाहरण चंद्रशेखर थे. जिन चंद्रशेखर को ‘भोंडसी के बाबा’ का संबोधन देकर प्रभाष जी ने क्या कुछ नहीं लिखा, उन्हीं चंद्रशेखर के लिए बाद के दिनों में उनके विचार पूरी तरह बदल गए.
जनसत्ता की अपनी यादों को शब्दों में गूंथते हुए मेरी आंखें कई बार नम हुई हैं. जहां तक प्रभाष जी की बात है, मैं बेहिचक कह सकता हूं कि मैं आज जो कुछ हूं उसके पीछे उन्हीं की प्रेरणा और उन्हीं का वरदहस्त है. जनसत्ता में रहते हुए वे मेरे भाई साहब थे जो इंदौर जाने के बाद से दादा हो गए और मृत्युपर्यंत दादा (उनके परिवार में सभी छोटे-भाई बहन उन्हें इसी संबोधन से पुकारते थे) रहे. उनके वृहत्तर परिवार में, उनके सैकड़ों छोटे भाइयों में कुछ विशिष्ट होने का मेरा दावा यकीनन बहुत पक्का है. जनसत्ता में मैं दो पारियों में करीब चार साल रहा. इस अवधि में चार प्रमोशन, एक रेजिग्नेशन और एक टर्मिनेशन सभी कुछ तो हो गया.
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (7): हद तो तब हो गई जब जितेंद्र बजाज मुझे जनसत्ता की भाषा-वर्तनी और परंपरा सिखाने-बताने लगे!


