सुजीत सिंह प्रिंस-
गाजीपुर। लंका मैदान में आयोजित वृहद स्वास्थ्य शिविर के जरिए गाजीपुर में अपनी सामाजिक सक्रियता को सामने ला रहे अभिनव सिन्हा, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के पुत्र हैं। शिविर का उद्घाटन शनिवार को उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक ने किया। स्वास्थ्य शिविर में बड़ी संख्या में चिकित्सकों और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कर्मचारियों की ड्यूटी लगाए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
स्वास्थ्य सेवा जैसा जनहित का आयोजन अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसी बीच गाजीपुर में सामने आए दो हाउस अरेस्ट के मामलों ने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक सवालों के घेरे में ला दिया है।
पीजी कॉलेज गाजीपुर के छात्रसंघ के पूर्व उपाध्यक्ष दीपक उपाध्याय ने अपने फेसबुक पोस्ट के जरिए जानकारी दी कि मेडिकल कॉलेज की जनसमस्याओं और कथित भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों को लेकर वह उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक को ज्ञापन देने जा रहे थे। इससे पहले उन्हें उनके साथियों के साथ उनके आवास पर ही पुलिस ने रोक दिया। इस मामले में पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला दिया और बाद में उन्हें छोड़ दिए जाने की बात कही है।
दूसरी ओर जमानियां क्षेत्र के पूर्व प्रधान संजय राय मंटू, जो सामाजिक मुद्दों पर लगातार लिखते-पढ़ते रहे हैं और मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाते रहे हैं, ने भी अपने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपने आवास पर हाउस अरेस्ट किए जाने की जानकारी दी।
लेकिन संजय राय मंटू की पोस्ट का सबसे चुभने वाला हिस्सा उनका व्यंग्यात्मक धन्यवाद है—उन्होंने हाउस अरेस्ट के लिए अभिनव सिन्हा को धन्यवाद देते हुए सवाल उठाया कि लोकतंत्र में सच्चाई बोलने का परिणाम क्या यही है?
सवाल सिर्फ दो लोगों के घर पुलिस पहुंचने का नहीं है… सवाल उस राजनीतिक सोच का है जो इससे पैदा होती है।
अभिनव सिन्हा अभी अपनी राजनीतिक पहचान और जमीन तैयार कर रहे हैं। ऐसे समय में यदि उनके नाम से जुड़े किसी आयोजन के दौरान जनसमस्याओं को लेकर ज्ञापन देने वाले छात्र नेता और भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हाउस अरेस्ट होने का दावा करें, तो आम जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या नई राजनीति की पहली पहचान यही होगी कि सवाल पूछने वालों को रोक दिया जाए?
क्या राजनीतिक जमीन जनता के बीच संवाद से तैयार होगी या प्रशासनिक ताकत के अहसास से?
और सबसे बड़ा सवाल—
“अभी राजनीतिक सफर शुरू भी नहीं हुआ, लेकिन सवाल पूछने वालों के दरवाजे पर पुलिस पहुंचने लगी—तो यह जनसेवा का आत्मविश्वास है या सत्ता के करीब होने का घमंड?”
यह सवाल अभिनव सिन्हा से ज्यादा उस व्यवस्था से है, जिसमें किसी व्यक्ति के राजनीतिक रूप से सक्रिय होने के साथ ही उसके आसपास की प्रशासनिक गतिविधियों का असर आम नागरिकों की आवाज पर दिखाई देने लगे।
स्वास्थ्य मेले में हजारों लोगों को इलाज मिले, यह स्वागत योग्य है। लेकिन लोकतंत्र में जनता को इलाज के साथ सवाल पूछने की आजादी भी चाहिए।
क्योंकि राजनीति में असली परीक्षा मंच पर लगी भीड़ और बड़े आयोजनों से नहीं होती।
असली परीक्षा तब होती है, जब सामने कोई अपना समर्थक नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाला खड़ा हो।


