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सियासत

सरकार के GDP आंकड़ों पर सवाल उठाने वाले भारत के पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव को निशिकांत दुबे ने भेजा नोटिस, अब जवाब पढ़िए!

शीतल पी सिंह-

लेखक: सुभाष चंद्र गर्ग (Subhashgarg1960), भारत के पूर्व वित्त और आर्थिक मामलों के सचिव। पोस्ट की तारीख: 27 सितंबर 2026।

“मैंने nishikant dubey के मानहानि के नोटिस का जवाब दे दिया है। 26 सितंबर को आपके वकील अमित अवस्थी को भेज दिया।”

सुभाष गर्ग ने लिखा है कि उन्होंने पहले क्विंट में लेख लिखकर सरकार के जीडीपी आंकड़ों (7.8% ग्रोथ) पर सवाल उठाए थे। निशिकांत दुबे ने इसका जवाब देते हुए 2018 का एक पुराना पत्र शेयर किया, जिसमें उन्होंने गर्ग की आर्थिक नीति की आलोचना की थी।

बाद में एक पॉडकास्ट में गर्ग ने कहा कि:

  • दुबे ने एक बार उनसे LIC चेयरमैन से किसी ट्रांसफर या काम के लिए सिफारिश करवाने को कहा था।
  • उन्होंने मना कर दिया।
  • इसके बाद दुबे ने संसदीय समिति की बैठक की बात को प्रधानमंत्री कार्यालय में गलत तरीके से बताकर और पीएम को पत्र लिखकर उनके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की।
  • इसी वजह से उन्होंने दुबे को “ब्लैकमेलर/बुलिंग टाइप” का व्यक्ति कहा।

इस पर दुबे ने मानहानि का नोटिस भेजा और माफी माँगने व पोस्ट हटाने की माँग की। गर्ग ने जवाब में कहा कि उनकी बातें सच हैं, अच्छे इरादे से कही गई हैं और मानहानि के कानून के अपवादों के अंतर्गत आती हैं। इसलिए नोटिस गलत है और माँगें मानने योग्य नहीं हैं।


कथित मानहानि को लेकर निशिकांत दुबे के नोटिस का जवाब

स्पीड पोस्ट/कूरियर/ईमेल के जरिए

26 सितंबर 2026

सेवा में,

अमित वी. अवस्थी, अधिवक्ता
(निशिकांत दुबे की ओर से)
43, हेमकुंट कॉलोनी, ग्रेटर कैलाश-I,
नई दिल्ली-110048
ईमेल: [email protected]

मामले के तथ्य

  1. मैंने ‘India’s 7.8% GDP Growth: Is the Government’s Data Really What it Seems?’ शीर्षक से एक विचार लेख लिखा था, जो 2 सितंबर को ‘द क्विंट’ में प्रकाशित हुआ। मैंने उसी दिन दोपहर 2.29 बजे इसे X पर इस टिप्पणी के साथ पोस्ट किया था—‘मैं अपने निष्कर्ष के विश्लेषणात्मक आधार की व्याख्या करता हूं कि 2026-27 की पहली तिमाही में मौजूदा कीमतों पर जीडीपी वृद्धि 2.6 प्रतिशत और वास्तविक अर्थों में करीब शून्य है। क्षेत्रवार प्रदर्शन में अभी भी और अधिक गड़बड़ियां हैं, जिसमें विनिर्माण और खपत में नकारात्मक वृद्धि देखने को मिल रही है।’ अगले कुछ दिनों में इस पोस्ट को 8 लाख से अधिक व्यू मिले।
  2. निशिकांत दुबे ने 2/3 सितंबर 2026 को X पर मेरी उपरोक्त पोस्ट का मजाक उड़ाने और उसे नीचा दिखाने के लिए लिखा—“बौरा गए हैं, वित्त सचिव के पद से रातों-रात इसी अज्ञानता के कारण हटाए गए थे, उस सदमे से उबर नहीं पाए।” उन्होंने 3 मार्च 2018 को उनके द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए पत्र को भी साथ में पोस्ट किया।

इस पत्र में निशिकांत दुबे ने मेरे आर्थिक नीति संबंधी दृष्टिकोण को भारत के विकास और वृद्धि के व्यापक हित में तत्काल पुनर्विचार योग्य बताया था। उन्होंने प्रधानमंत्री से लिखा था—“मैं आपका ध्यान वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव श्री सुभाष चंद्र गर्ग द्वारा अपनाए जा रहे आर्थिक नीति दृष्टिकोण से संबंधित कुछ गंभीर चिंताओं की ओर आकर्षित करना चाहता हूं, जिसके बारे में मेरा विचार है कि देश की वृद्धि और विकास के व्यापक हित में तत्काल समीक्षा की आवश्यकता है।”

निशिकांत दुबे ने विशेष रूप से राजकोषीय घाटे को लेकर मेरे कथित अत्यधिक प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने प्रधानमंत्री को उसी पत्र में लिखा था—“इसलिए राजकोषीय समेकन को टिकाऊ समृद्धि और आर्थिक स्थिरता हासिल करने का साधन बने रहना चाहिए, न कि अपने आप में एक लक्ष्य।”

निशिकांत दुबे ने 2003 के राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM) के तहत अधिक लचीलेपन की वकालत की थी। उनका तर्क था कि असाधारण बुनियादी ढांचा जरूरतों, कमजोर निजी निवेश, वैश्विक अनिश्चितता और रणनीतिक प्राथमिकताओं के चलते कई बार राजकोषीय घाटे के रास्ते में अस्थायी लचीलापन जरूरी हो सकता है।

निशिकांत दुबे ने लिखा था—“उद्देश्य केवल कागज पर राजकोषीय घाटे का एक निश्चित प्रतिशत हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह तय करना होना चाहिए कि सरकारी खर्च उत्पादक, विकास पैदा करने वाला और दीर्घकालिक राष्ट्रीय परिसंपत्तियां बनाने में सक्षम है या नहीं।”

सरकार की बुनियादी ढांचा योजनाओं से अपनी चिंताओं को जोड़ते हुए उन्होंने औद्योगिक कॉरिडोर, भारतमाला, सागरमाला, रेलवे निवेश, उड़ान, हवाई अड्डों, राजमार्गों, बंदरगाहों और अंतर्देशीय जलमार्गों जैसी परियोजनाओं और कार्यक्रमों का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था—“ये कार्यक्रम केवल खर्च नहीं हैं। ये उत्पादक पूंजी निर्माण का हिस्सा हैं, जो लॉजिस्टिक्स लागत कम करेंगे, कनेक्टिविटी में सुधार करेंगे, उद्योगों को आकर्षित करेंगे, निवेश पैदा करेंगे और दशकों तक भारत की उत्पादक क्षमता बढ़ाएंगे।”

इन परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर सार्वजनिक पूंजीगत व्यय की जरूरत बताते हुए और यह तर्क देते हुए कि सरकारी निवेश निजी निवेश को आकर्षित करने में मदद कर सकता है, निशिकांत दुबे ने लिखा था—“इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि वित्त मंत्रालय अत्यधिक प्रतिबंधात्मक राजकोषीय दृष्टिकोण अपनाकर आपकी सरकार के विकास एजेंडे के क्रियान्वयन को धीमा न होने दे।”

निशिकांत दुबे ने कहा था कि उनकी चिंताएं मेरे साथ हुई बातचीत पर आधारित थीं। उन्होंने लिखा था—“आर्थिक मामलों के सचिव के रूप में मेरे साथ हुई बातचीत से मेरे मन में गंभीर आशंका पैदा हुई है कि उनका दृष्टिकोण आपके और हमारी सरकार द्वारा परिकल्पित आर्थिक परिवर्तन के पैमाने, तात्कालिकता और महत्वाकांक्षा के अनुरूप पर्याप्त रूप से नहीं है।”

अंत में निशिकांत दुबे ने प्रधानमंत्री मोदी से राजकोषीय घाटे की नीति, FRBM ढांचे, तरलता और पूंजी की लागत, निजी निवेश, विदेशी और घरेलू पूंजी निर्माण तथा सरकार के बुनियादी ढांचा कार्यक्रम के वित्तपोषण को लेकर मेरे विचारों की व्यक्तिगत रूप से समीक्षा करने का आग्रह किया था।

  1. यह उल्लेखनीय है कि यह पत्र 3 मार्च 2018 को प्रधानमंत्री को तब लिखा गया था, जब वित्त मंत्री अरुण जेटली 1 फरवरी 2018 को बजट 2018-19 पेश कर चुके थे, वित्त मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति बजट प्रस्तावों की समीक्षा कर चुकी थी और निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली एक उप-समिति ने फरवरी महीने में राजकोषीय घाटे के मुद्दे पर मुझसे पूछताछ की थी।

यह उल्लेखनीय है कि आर्थिक नीति संबंधी फैसले तब भी और अब भी वित्त मंत्रालय में वित्त मंत्री के स्तर पर अंतिम रूप से लिए जाते हैं। 2018 में वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी अत्यंत अनुभवी और उच्च कद वाले व्यक्ति अरुण जेटली के पास थी।

निशिकांत दुबे का 3 मार्च 2018 का यह पत्र सरकार में मेरी सेवा के दौरान मेरे संज्ञान में नहीं आया। न ही प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव ने इस पत्र के संदर्भ में मेरे प्रदर्शन की कोई समीक्षा की।

मैंने निशिकांत दुबे का यह पत्र पहली बार 3 सितंबर 2026 को देखा, जब उन्होंने इसे अपनी X पोस्ट के साथ साझा किया। मैंने X पर निशिकांत दुबे की पोस्ट या 3 मार्च 2018 के उनके पत्र पर कोई प्रतिक्रिया या टिप्पणी नहीं की।

  1. मैंने 7 सितंबर को क्विंट में एक और विचार लेख लिखा, जिसका शीर्षक था—‘Subhash Garg Writes: Centre’s FAQs on GDP Revision Lack Crucial Supporting Data’। मैंने इसे उसी दिन दोपहर 1.52 बजे X पर इस टिप्पणी के साथ पोस्ट किया—‘पुरानी सीरीज पर 25-26Q1 के उसी डेटा के नाटकीय इस्तेमाल ने 26-27Q1 की वास्तविक जीडीपी वृद्धि को 7.8 प्रतिशत से शून्य कर दिया। इससे 2024-25 में भारत की जीडीपी, वृद्धि और 12.7 ट्रिलियन रुपये के जीडीपी नुकसान का मुद्दा सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया। इस लेख में मैं सरकार की व्याख्या को खारिज करता हूं और सच्चाई पूछता हूं।’ इस पोस्ट को कुछ ही दिनों में 2 लाख से अधिक व्यू मिले। मुझे इस X पोस्ट पर निशिकांत दुबे की कोई पोस्ट नजर नहीं आई।
  2. शालिनी कपूर तिवारी और दीपक तिवारी ने 3 सितंबर 2026 को मुझसे जीडीपी के आंकड़ों और संबंधित मुद्दों पर पॉडकास्ट करने का अनुरोध किया था और मुझे नोएडा स्थित अपने स्टूडियो में रिकॉर्डिंग के लिए आमंत्रित करना चाहते थे। मैंने रिकॉर्डिंग के लिए 22/23 सितंबर का सुझाव दिया। वे इसे इससे पहले करना चाहते थे। अंततः 12 सितंबर को मेरे होम ऑफिस में पॉडकास्ट रिकॉर्ड करने पर सहमति बनी।

इस पॉडकास्ट में शालिनी तिवारी ने निशिकांत दुबे की X पोस्ट और 3 मार्च 2018 के पत्र का मुद्दा उठाया। उनके सीधे सवालों के जवाब में मैंने मूल रूप से निम्न बातें कहीं:

क. मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री या सरकार ने निशिकांत दुबे के 3 मार्च 2018 के पत्र पर कोई विचार किया। यह पत्र मुझे नहीं दिया गया था। मेरी समझ में सरकार ने इसे नजरअंदाज कर दिया।

ख. निशिकांत दुबे मेरे पास आए थे या उन्होंने मुझसे बात की थी और मेरे पद का इस्तेमाल भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के चेयरमैन पर किसी अधिकारी की नियुक्ति या तबादले अथवा खरीद से जुड़े किसी मामले में दबाव बनाने के लिए करना चाहते थे। जुलाई 2017 से 2019 की शुरुआत तक मैं LIC के बोर्ड में सदस्य था। चूंकि LIC का प्रशासनिक विभाग वित्त मंत्रालय का वित्तीय सेवा विभाग (DFS) था, जिसका उस समय नेतृत्व राजीव कुमार कर रहे थे और वे झारखंड कैडर के अधिकारी थे तथा निशिकांत दुबे (झारखंड से सांसद) को अच्छी तरह जानते थे, इसलिए मैंने निशिकांत दुबे से राजीव कुमार से बात करने को कहा।

निशिकांत दुबे ने केवल मेरे कार्यालय के जरिए इस मामले में हस्तक्षेप करने पर जोर दिया, इसलिए मैंने LIC चेयरमैन से हस्तक्षेप करने की उनकी मांग और दबाव को अस्वीकार कर दिया। इससे निशिकांत दुबे निश्चित रूप से नाराज हुए।

ग. कुछ दिनों बाद वित्त मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की बैठक में, जिसमें निशिकांत दुबे सदस्य थे, जब मुझसे बजट 2018-19 में घोषित आयुष्मान भारत की सबसे बड़ी योजना के लिए बजट का प्रावधान नहीं किए जाने के बारे में पूछा गया, तो मैंने ईमानदारी से जवाब दिया कि योजना को अंतिम रूप कुछ देर से दिया गया था और इसलिए अलग बजट मद बनाने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा था। इसी कारण बजट 2018-19 में आयुष्मान भारत योजना के लिए कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं किया गया।

मैंने संसदीय स्थायी समिति को यह भी बताया कि पुरानी बीमा योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY), जिसे आयुष्मान भारत से बदला जाना था, में बजट का प्रावधान था। शुरुआती कुछ महीनों में उसी राशि का इस्तेमाल किया जाएगा और सरकार संसद के मानसून सत्र में अनुपूरक अनुदान के जरिए आयुष्मान भारत योजना के लिए विशिष्ट बजट मद बनाएगी।

घ. मुझे लगा कि स्थायी समिति को दिया गया जवाब पूरी तरह सच्चा था और आयुष्मान भारत योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी सभी चिंताओं का समाधान करता था। समिति की प्रतिक्रिया से भी मुझे यही लगा।

हालांकि, जैसे ही मैं अपने कार्यालय पहुंचा, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव का फोन आया। प्रधान सचिव कुछ नाराज लग रहे थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने स्थायी समिति को यह क्यों बताया कि सरकार ने आयुष्मान भारत योजना पर फैसला लेने में देरी की।

मैंने उन्हें समझाया कि मैंने वास्तव में क्या कहा था, उसका संदर्भ क्या था, कारण क्या थे और समिति इससे संतुष्ट थी। प्रधान सचिव संतुष्ट हुए और उन्होंने इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया।

बाद में मैंने प्रधान सचिव से पूछा कि समिति की बैठक में हुई बातों के बारे में उन्हें गलत तरीके से किसने जानकारी दी थी। उन्होंने निशिकांत दुबे का नाम लिया।

ङ. यह उल्लेखनीय है कि स्थायी समिति की बैठक उस समय हुई थी, जब मैंने LIC में किसी अधिकारी का तबादला कराने के लिए निशिकांत दुबे के दबाव और मांग को अस्वीकार कर दिया था। निशिकांत दुबे ने संसदीय स्थायी समिति की बैठक के तुरंत बाद प्रधानमंत्री के कार्यालय जाकर समिति की कार्यवाही के बारे में वरिष्ठतम अधिकारी के मन में मेरे खिलाफ गलत धारणा बनाने की कोशिश की। बाद में उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर प्रधानमंत्री के मन को मेरे खिलाफ करने का प्रयास किया।

च. इसलिए पॉडकास्ट में मैंने निशिकांत दुबे की पूरी गतिविधियों और घटनाक्रम को सामने रखा और उन्हें ‘ब्लैकमेलर किस्म का व्यक्ति’ बताया। उस समय मैं अपने मन में ‘बुली’ शब्द तलाश रहा था। मेरे आकलन में, मेरे अनुरोध को अस्वीकार किए जाने के बाद निशिकांत दुबे के कदम और व्यवहार स्पष्ट रूप से दबाव बनाने और ब्लैकमेल करने की प्रकृति के थे।

  1. शालिनी कपूर तिवारी ने अपना पॉडकास्ट 15 सितंबर को जारी किया, जिसमें निशिकांत दुबे से जुड़ा घटनाक्रम भी था। मैंने इसे 17 सितंबर को X अकाउंट पर इस टिप्पणी के साथ पोस्ट किया—‘शालिनी के साथ यह पॉडकास्ट देखें। मैं निशिकांत दुबे से लेकर CEA और सचिव MOSPI तक सभी को जवाब देता हूं—12.7 लाख करोड़ रुपये की गायब जीडीपी की सच्चाई के बारे में। मोदी सरकार के साथ मेरी पारी के बारे में और भी बहुत कुछ है।’
  2. 20 सितंबर से निशिकांत दुबे ने X और अन्य सोशल मीडिया चैनलों पर लगातार कई पोस्ट कीं। उन्होंने कई समाचार एजेंसियों और चैनलों से भी बात की। उनकी कुछ पोस्ट और टिप्पणियां मैं नीचे दे रहा हूं:

क. 21 सितंबर को X पर निशिकांत दुबे ने लिखा—“ये जो सुभाष गर्ग पूर्व वित्त सचिव की बदजुबानी है, उसे मैंने ठीक करने का फैसला किया है। मैंने उसके ऊपर आपराधिक मानहानि किया है। क्योंकि उसने अपने दफ्तर में मेरे साथ मुलाकात का जिक्र किया है। सुभाष तुम्हारी जानकारी के लिए मैं सन 2009 में सांसद बना, तब से लेकर आज तक मैं भारत सरकार के दफ्तर में नहीं गया हूं, क्योंकि सचिव भारत सरकार प्रोटोकॉल में सांसद से नीचे है। दूसरा, 2009 से लेकर आज तक मैंने कभी भी ट्रांसफर पोस्टिंग की कोई चिट्ठी नहीं लिखी है। तुम्हारा क्या कोई मित्र भी मेरी कोई चिट्ठी या दफ्तर की किसी मीटिंग के संबंध में सूचना दे देंगे तो मैं तुम्हें मर्द की औलाद मानूंगा। देश की अर्थव्यवस्था को डुबोने वाले सुभाष का रास्ता जेल है।”

ख. 21 सितंबर को ANI को दिए इंटरव्यू में निशिकांत दुबे ने कहा—“वह एक छोटा आदमी है। वह कहता है कि मैं 2018 में उसके कार्यालय गया था। मैंने उसे चुनौती दी है कि वह साबित करे कि क्या मैं कभी दिल्ली या रांची में किसी सचिव के कार्यालय गया था। मैंने यह भी कहा कि मैं कभी ट्रांसफर/पोस्टिंग के लिए पत्र नहीं लिखता। ऐसा कोई एक पत्र दिखाइए। जिस समय की वह बात कर रहा है, उस समय मैं लोक लेखा समिति का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का अध्यक्ष था। अध्यक्ष के पास किसी भी सचिव या अधिकारी को बुलाने का अधिकार होता है। मैंने उसके खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दायर किया है। वह झूठ बोल रहा है। उसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी। अगर उसने माफी नहीं मांगी तो वह जेल जाएगा।”

ग. 21 सितंबर 2026 को IANS को दिए इंटरव्यू में निशिकांत दुबे ने कहा—“पूर्व वित्त सचिव अपनी सीमा से बाहर बोल रहे हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि मैं उनके कार्यालय गया था और किसी ट्रांसफर के बारे में बात की थी। मैं कहता हूं, अपना मामला छोड़िए। आज आपके जो भी वर्तमान शिष्य हैं, उन्हें सामने लाइए…”

घ. ANI HindiNews को दिए एक अन्य इंटरव्यू में निशिकांत दुबे ने 21 सितंबर को कहा—“मैंने आपराधिक मानहानि का केस किया है। सारी झूठ निकल जाएगी। अगर खुलेआम माफी नहीं मांगेगा तो ये जेल जाएगा।”

ङ. 22 सितंबर को निशिकांत दुबे ने X पर अपने मानहानि नोटिस के तीन पन्ने पोस्ट किए और साथ में लिखा—“सुभाष गर्ग @Subhashgarg1960 सात दिन में माफी मांगो, नहीं तो सलाखों तक ले जाने की कोशिश करूंगा। मैं खुद PAC में वित्त के सब-कमेटी का अध्यक्ष था, रोज अपने सामने हाजिर कराता था, बदजुबानी नहीं चलेगी। मैंने आज तक वित्त मंत्रालय का कार्यालय नहीं देखा है। मैं अपनी सरकार में भी कभी न अरुण जेटली जी से मिला, न निर्मला सीतारमण जी से वित्त मंत्रालय में मिला, तुम क्या हो?”

च. इस तरह की कई और पोस्ट, इंटरव्यू और टिप्पणियां हैं, जिनमें लगभग इसी तरह की बातें और धमकियां दी गई हैं।

  1. अमित वी. अवस्थी, अधिवक्ता द्वारा 21.09.2026 को भेजा गया ‘भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 के तहत आपराधिक मानहानि का कानूनी नोटिस—डॉ. निशिकांत दुबे, सांसद (लोकसभा) के खिलाफ किए गए झूठे, दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक आरोपों को तत्काल वापस लेने, खंडन करने, हटाने और बिना शर्त सार्वजनिक माफी की मांग’ वाला नोटिस मुझे 23 सितंबर 2026 को प्राप्त हुआ।

कथित मानहानि का नोटिस

  1. उपरोक्त नोटिस में आरोप लगाया गया है कि यह नोटिस मेरे द्वारा शालिनी कपूर तिवारी के साथ 17.09.2026 को किए गए पॉडकास्ट/इंटरव्यू में उनके ‘क्लाइंट के खिलाफ किए गए झूठे, मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण आरोपों’ के संबंध में है।

नोटिस में आगे कहा गया है कि पॉडकास्ट में मैंने ‘एक निर्वाचित सांसद को’ “ब्लैकमेलिंग किस्म का व्यक्ति” बताया और “जनता को बताया कि वह” मेरे “कार्यालय आए थे ताकि” मैं “भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के चेयरमैन पर उनके ‘काम’ को कराने के लिए दबाव डालूं।”

  1. नोटिस में कहा गया है कि “दोनों बयान झूठे हैं” और मेरे पास उनका समर्थन करने के लिए “कोई सामग्री नहीं है” तथा मेरे कथन से मेरे द्वारा लगाए गए विशेषण को भी समर्थन नहीं मिलता। नोटिस में यह भी कहा गया है कि उनके ‘क्लाइंट’ किसी निराधार आरोप से अपनी सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नुकसान नहीं होने देंगे और मुझसे इसका जवाब मांगा गया है।
  2. नोटिस के भाग B में शालिनी कपूर तिवारी के साथ पॉडकास्ट/इंटरव्यू में हुई मेरी बातचीत को हूबहू शामिल किया गया है, जिसे यूट्यूब, फेसबुक और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित और प्रसारित किया गया था। नोटिस में हिंदी में हुई बातचीत का अंग्रेजी संस्करण भी दिया गया है।
  3. नोटिस के भाग C, जिसका शीर्षक ‘आरोप’ है, में दो ऐसे आरोपों पर चर्चा की गई है, जिन्हें अधिवक्ता अमित अवस्थी की राय में स्वतंत्र रूप से मानहानिकारक बताया गया है।

पहला आरोप यह है कि निशिकांत दुबे एक “ब्लैकमेलिंग” व्यक्ति थे, अर्थात जैसा कि अधिवक्ता अवस्थी ने कहा है—‘ऐसा व्यक्ति जो अपना काम निकालने के लिए ब्लैकमेल, दबाव और अनुचित दबाव का सहारा लेता है।’

दूसरा आरोप यह है कि मैंने कहा कि निशिकांत दुबे मेरे कार्यालय आए थे और LIC बोर्ड के सदस्य के रूप में मेरा इस्तेमाल एक माध्यम के रूप में करना चाहते थे, ताकि LIC चेयरमैन निशिकांत दुबे का “काम” कर दें और तबादला कर दें। मैंने उनसे संबंधित अधिकारी यानी DFS के सचिव राजीव कुमार से संपर्क करने को कहा, इसके बावजूद उन्होंने मेरे माध्यम से काम कराने पर जोर दिया।

  1. नोटिस में आरोप लगाया गया है कि ये ‘आरोप’ महज राय या निष्पक्ष आलोचना की अभिव्यक्ति नहीं हैं। नोटिस के अनुसार ये “तथ्य के विशिष्ट आरोप हैं, जिनके बारे में कहा गया है कि वे” मेरे “व्यक्तिगत ज्ञान में हैं और इस विशेषण के लिए तथ्यात्मक आधार के रूप में एक किस्सा” पेश किया गया है।
  2. नोटिस के भाग D में कहा गया है कि निशिकांत दुबे मेरे आरोपों का “स्पष्ट रूप से खंडन” करते हैं। इसमें कहा गया है कि निशिकांत दुबे “कभी मेरे कार्यालय या कहीं और मुझसे LIC के चेयरमैन या किसी अन्य व्यक्ति से कोई लाभ मांगने नहीं आए” और उन्होंने “कभी मेरे कार्यालय, पद या प्रभाव का किसी निजी, बाहरी या विशेष उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की।”

नोटिस में निष्कर्ष दिया गया है कि “यह पूरा घटनाक्रम शुरू से अंत तक गढ़ा हुआ है।”

  1. नोटिस में यह भी कहा गया है कि निशिकांत दुबे ने पॉडकास्ट के तुरंत बाद X पर एक पोस्ट के जरिए मेरे आरोप का सार्वजनिक रूप से खंडन किया था। नोटिस के पैरा 10 और 11 में आगे कहा गया है कि मेरा अपना विवरण ही मेरे खिलाफ जाता है। मैं इस हिस्से को दोहरा नहीं रहा हूं क्योंकि इसका कथित मानहानि से कोई संबंध नहीं है।

नोटिस के पैरा 12 से 15 में भारतीय न्याय संहिता की धारा 356, उसकी व्याख्या और अपवादों का उल्लेख किया गया है और अधिवक्ता अवस्थी की राय में बताया गया है कि ये प्रावधान मुझे कथित मानहानि से मुक्त नहीं करते।

  1. नोटिस के भाग F में, पैरा 16 से 19 के बीच, अधिवक्ता अवस्थी ने अपने क्लाइंट निशिकांत दुबे की ओर से मुझसे कई कदम उठाने की मांग की है। इनमें विशेष रूप से ‘बिना शर्त और स्पष्ट रूप से आरोप वापस लेना और खंडन करना’ शामिल है, खासकर निशिकांत दुबे को “ब्लैकमेलिंग किस्म का व्यक्ति” बताने वाले आरोप को। साथ ही ‘हिंदी और अंग्रेजी में बिना शर्त और बिना किसी योग्यता के माफी’ मांगने को कहा गया है, जिसका प्रारूप निशिकांत दुबे द्वारा मंजूर किया जाना है। इसके अलावा भी कई मांगें की गई हैं।
  2. अधिवक्ता अमित वी. अवस्थी के नोटिस और निशिकांत दुबे द्वारा X तथा अन्य सोशल मीडिया पर दिए गए विभिन्न बयानों/आरोपों को देखने के बाद मेरी समझ में निशिकांत दुबे के संबंध में मेरे ऊपर दो कथित मानहानिकारक आरोप लगाए गए हैं।

पहला, यह कि निशिकांत दुबे कभी मेरे कार्यालय नहीं आए और यह कि प्रोटोकॉल में सांसद का पद भारत सरकार के सचिव से ऊंचा होता है तथा इसलिए मेरे द्वारा निशिकांत दुबे के मेरे कार्यालय आने का उल्लेख करना कथित रूप से उनकी मानहानि है।

दूसरा, यह कि निशिकांत दुबे ने मुझे LIC चेयरमैन से उस तबादले के लिए बात करने के लिए दबाव डाला, जिसे वह कराना चाहते थे और जिसे मैंने नहीं कराया। इस आधार पर मैंने निशिकांत दुबे को ब्लैकमेलिंग किस्म का व्यक्ति बताया।

कोई मानहानि नहीं हुई

  1. निशिकांत दुबे ने अपनी X पोस्ट में आरोप लगाया कि मैंने पॉडकास्ट में उनके मेरे कार्यालय आने की बात कहकर उनकी मानहानि की। उक्त पोस्ट को नोटिस के साथ भी संलग्न किया गया है। उसका संबंधित हिस्सा इस प्रकार है:

“क्योंकि उसने अपने दफ्तर में मेरे साथ मुलाकात का जिक्र किया है। सुभाष तुम्हारी जानकारी के लिए मैं सन 2009 में सांसद बना तब से लेकर आज तक मैं भारत सरकार के दफ्तर में नहीं गया हूं, क्योंकि सचिव भारत सरकार प्रोटोकॉल में सांसद से नीचे है।”

  1. हालांकि नोटिस में निशिकांत दुबे के मेरे कार्यालय आने या मुझसे बात करने के मेरे कथन का उल्लेख नहीं है। निशिकांत दुबे का कहना है कि चूंकि सांसद का दर्जा भारत सरकार के सचिव से ऊंचा है, इसलिए मेरे द्वारा यह कहना कि निशिकांत दुबे मेरे कार्यालय आए थे, अपने आप में मानहानिकारक बयान था।
  2. यह पूरी तरह सामान्य बात है कि सांसदों सहित जनप्रतिनिधि राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर सरकारी अधिकारियों से मिलने आते हैं। इस मामले में प्रोटोकॉल का कोई मुद्दा नहीं है। सांसद और सचिव दोनों लोक सेवक हैं। यह कहना कि निशिकांत दुबे, जो सांसद हैं, मुझसे मिलने आए या उन्होंने मुझसे बात की, किसी भी दृष्टि से मानहानिकारक बयान नहीं है। इससे किसी भी तरह निशिकांत दुबे की प्रतिष्ठा को नुकसान नहीं पहुंचा।
  3. चूंकि इस मामले को नोटिस में मानहानिकारक नहीं बताया गया है, इसलिए मैं इस पर आगे चर्चा नहीं करूंगा।
  4. मुख्य आरोप जिसे मानहानिकारक बताया गया है, वह यह है कि मैंने निशिकांत दुबे को ब्लैकमेलिंग किस्म का व्यक्ति बताया। मैं पूरे घटनाक्रम और यह बताना चाहता हूं कि मैं इसे मानहानिकारक बयान नहीं बल्कि सत्यपरक वर्णन क्यों मानता हूं।
  5. पूरा घटनाक्रम 2/3 सितंबर को X पर निशिकांत दुबे की पोस्ट से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने लिखा था—‘बौरा गए हैं, वित्त सचिव के पद से रातों-रात इसी अज्ञानता के कारण हटाए गए थे, उस सदमे से उबर नहीं पाए।’ इसका अंग्रेजी अर्थ है कि सुभाष गर्ग ‘पागल हो गए हैं; अज्ञानता के कारण उन्हें एक रात में वित्त सचिव के पद से हटा दिया गया था और वह अब तक उस सदमे से बाहर नहीं आ पाए हैं।’
  6. नोटिस में निशिकांत दुबे की इस पोस्ट का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।
  7. इस पोस्ट में निशिकांत ने मुझे ‘पागल’ बताया और आरोप लगाया कि मुझे ‘अज्ञानता’ के कारण रातों-रात वित्त सचिव के पद से हटा दिया गया था तथा मैं उस ‘सदमे’ से बाहर नहीं निकल पाया हूं। इस एक वाक्य में चार बड़े मानहानिकारक, झूठे और दुर्भावनापूर्ण बयान हैं। मैं रिकॉर्ड स्पष्ट करना चाहता हूं।
  8. पहला, 2 सितंबर 2026 को क्विंट में जीडीपी पर विचार लेख लिखने के कारण मैं पागल नहीं हुआ था। वास्तव में उस लेख में 2025-26 की पहली तिमाही में मौजूदा कीमतों पर 6 लाख करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2024-25 में 12.70 लाख करोड़ रुपये की गायब/लुप्त जीडीपी की ओर ध्यान दिलाकर राष्ट्रीय महत्व का एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया था।

X पर क्विंट के लेख के साथ की गई मेरी पोस्ट ने जीडीपी के पूरे मामले पर राष्ट्रीय, सरकारी और सार्वजनिक स्तर पर व्यापक ध्यान आकर्षित किया। गायब/लुप्त जीडीपी राष्ट्रीय चिंता का विषय बनी और देशभर में टेलीविजन, सोशल मीडिया, कॉलेजों, कैफे और ड्राइंग रूमों में इस पर व्यापक चर्चा हुई और अब भी हो रही है।

इस राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर पोस्ट लिखने के लिए निशिकांत दुबे ने मुझे पागल कहा। जीडीपी के मामलों को निशिकांत दुबे कितना समझते हैं, यह टिप्पणी का विषय नहीं है, लेकिन उन्होंने इसे अपनी विशेषज्ञता और अधिकार समझते हुए X पर लिखा कि मैं ‘बौरा गया हूं’। मेरे बारे में निशिकांत दुबे का यह चरित्र चित्रण अत्यंत मानहानिकारक, झूठा और उकसाने वाला था।

  1. दूसरा, निशिकांत दुबे ने कहा कि मुझे ‘अज्ञानता के कारण’ वित्त सचिव के पद से हटाया गया था और मुझे ‘अज्ञानी’ बताया। यह भी स्पष्ट रूप से मानहानिकारक और झूठा है।

मैंने भारत को 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के भारतीय सपने पर एक विस्तृत पुस्तक लिखी है। मैंने अपनी 2024 की पुस्तक “The $10 Trillion Dream Dented: The State of Indian Economy and Policy Reforms under Modi 2.0 (2019-2024)” में इस सपने की प्रगति की समीक्षा की है। दोनों पुस्तकें भारतीय अर्थव्यवस्था और नीति सुधारों की स्थिति पर विस्तृत टिप्पणी हैं।

मैंने भारतीय प्रशासन और वित्त में अपने अनुभवों पर दो व्यापक रूप से पढ़ी जाने वाली पुस्तकें भी लिखी हैं—2023 में ‘We Also Make Policy’ और 2025 में ‘No, Minister’। मैं हर साल ‘Subhash Chandra Garg’s Commentary and Explanation on Budget’ शीर्षक से भारत सरकार के बजट पर विस्तृत वार्षिक टिप्पणी लिखता हूं। ये राष्ट्रीय संदर्भ संसाधन हैं।

ऐसे व्यक्ति को निशिकांत दुबे ने 3 सितंबर की अपनी X पोस्ट में ‘अज्ञानी’ बताया। राष्ट्रीय बजट, वित्त और अर्थव्यवस्था के मामलों में निशिकांत दुबे के ‘ज्ञान’ पर मेरी कोई टिप्पणी नहीं है, लेकिन मुझे ‘अज्ञानी’ कहना सीधा-सादा मानहानिकारक, शरारतपूर्ण और झूठा है।

  1. निशिकांत दुबे ने आगे अपनी X पोस्ट में कहा कि मुझे वित्त सचिव के पद से ‘हटा दिया गया’ और वह भी ‘रातों-रात’। मुझे पूरा विश्वास है कि निशिकांत दुबे को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि जुलाई 2019 में वित्त मंत्रालय से बिजली मंत्रालय में मेरे तबादले के पीछे क्या परिस्थितियां थीं। फिर भी उन्होंने लापरवाही और जानबूझकर मेरे तबादले को ‘हटाया जाना’ और ‘रातों-रात’ बताया, ताकि मेरी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता पर हमला किया जा सके।

मैंने अपनी दोनों पुस्तकों—‘We Also Make Policy’ और ‘No, Minister’—में पूरी घटना और परिस्थितियों का वर्णन किया है। यह सरकार और मेरे बीच सहमति से हुआ तबादला था, जब नई मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह मुद्दा बनाया कि वह मेरे साथ काम करने के लिए तैयार नहीं थीं।

सरकार ने मुझे कोई भी पद चुनने की पेशकश की थी। मैंने पूरी तरह स्वेच्छा से सरकार से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का फैसला किया था। सरकार नहीं चाहती थी कि मैं जाऊं। मुझे हटाया नहीं गया था और न ही मेरा तबादला ‘रातों-रात’ हुआ था।

पूरे मामले से पूरी तरह अनजान निशिकांत दुबे ने ऐसा दिखाने की कोशिश की जैसे उन्हें अंदर की जानकारी हो और जैसे वह इसे करवाने में भूमिका निभा रहे थे। यह पूरी तरह झूठा बयान देकर निशिकांत दुबे ने मेरे चरित्र और क्षमता को बदनाम करने की कोशिश की।

  1. निशिकांत दुबे का अंतिम, पूरी तरह गलत, दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक बयान यह था कि वित्त मंत्रालय से ‘रातों-रात’ हटाए जाने के उस ‘सदमे’ से मैं अब तक बाहर नहीं निकल पाया हूं।

निशिकांत दुबे को पता होना चाहिए कि बिजली मंत्रालय के सचिव का पद वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव के पद के बराबर और उतना ही महत्वपूर्ण था और है—वेतन, दर्जे और जिम्मेदारी, सभी मामलों में।

कई अधिकारियों को एक सचिव पद से दूसरे सचिव पद पर स्थानांतरित किया जाता है। अगर कोई अधिकारी तबादले से खुश नहीं होता तो वह प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव से मिलता है या प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी बात रखता है।

मेरे मामले में प्रधानमंत्री के अतिरिक्त प्रधान सचिव ने मेरे तबादले से करीब एक सप्ताह पहले मुझसे पूरी बात की थी और मुझे अपनी पसंद के किसी भी पद पर जाने की पेशकश की थी। मेरी पसंद थी कि मैं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लूं।

जब मैं पूरी तरह अपनी पसंद, प्राथमिकता और इच्छा के अनुसार फैसला ले रहा था, तो मुझे ‘सदमा’ कैसे हो सकता था? शालिनी तिवारी के पॉडकास्ट एपिसोड से सात साल से अधिक पहले मेरा तबादला हुआ था। वह मेरे लिए कभी सदमा नहीं था।

यह केवल निशिकांत दुबे जैसे व्यक्ति के लिए सदमा हो सकता है, जो अभी तक इस मामले को नहीं भूले हैं। क्या यह निशिकांत दुबे को लगा सदमा था, जिससे वह अब तक बाहर नहीं निकल पाए हैं?

निशिकांत दुबे का यह दावा और चरित्र चित्रण पूरी तरह झूठा, मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण है तथा मेरे द्वारा जीडीपी पर लेख लिखने के पीछे दूर की गलत मंशा जोड़ने के लिए किया गया है।

  1. शालिनी कपूर तिवारी निशिकांत दुबे की यह X पोस्ट प्रिंट करके लाई थीं, जिसमें चार स्पष्ट रूप से झूठे, मनगढ़ंत, दुर्भावनापूर्ण और जानबूझकर अपमानजनक आरोप थे। उन्होंने पॉडकास्ट में इस मुद्दे को मेरे सामने मेरी टिप्पणी, स्वीकार या खंडन के लिए रखा। मुझे जवाब देना था। जवाब न देने का मतलब निशिकांत दुबे द्वारा किए गए स्पष्ट रूप से झूठे, शरारतपूर्ण और मानहानिकारक बयानों को मेरी स्वीकृति मान लिया जाता। मैं ऐसा कभी नहीं कर सकता था, खासकर जब मैं उन्हें दबाव और ब्लैकमेल करने वाले व्यक्ति के रूप में जानता था और यह पोस्ट भी उसी प्रकृति की थी।
  2. निशिकांत दुबे की X टिप्पणी को लेकर शालिनी तिवारी के सीधे सवालों के जवाब में मैंने 2018 में निशिकांत दुबे और मेरे बीच हुई दो वास्तविक घटनाओं को याद किया।

पहले मैंने निशिकांत दुबे के मेरे पास आकर LIC चेयरमैन पर किसी तबादले या खरीद संबंधी मामले में दबाव बनाने की कोशिश की घटना बताई।

इसके बाद मैंने निशिकांत दुबे के प्रधानमंत्री कार्यालय जाकर प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के मन में मेरे खिलाफ गलत धारणा पैदा करने की कोशिश की घटना बताई। यह मामला आयुष्मान भारत के लिए 2018-19 के बजट में प्रावधान से जुड़ा था।

मैंने मार्च 2018 के उस पत्र की सामग्री और संदर्भ का भी इस्तेमाल किया, जिसे निशिकांत दुबे ने अपनी X पोस्ट के साथ खुद साझा किया था।

  1. निशिकांत दुबे द्वारा मुझे अज्ञानी, ‘बौरा गया’, ‘रातों-रात’ वित्त मंत्रालय से हटाया गया और ‘उस सदमे से उबर नहीं पाया’ कहे जाने के संबंध में शालिनी तिवारी के सवालों के जवाब में मैंने जो घटनाक्रम बताया, वह पूरी तरह सत्य है और निशिकांत दुबे की गतिविधियों और घटनाक्रम से पूरी तरह समर्थित है।
  2. घटनाक्रम का पहला हिस्सा निशिकांत दुबे द्वारा मुझे LIC चेयरमैन से किसी ऐसे तबादले के लिए बात करने के लिए इस्तेमाल और दबाव बनाने की कोशिश से संबंधित था, जिसे निशिकांत दुबे चाहते थे और संभवतः LIC चेयरमैन ने मना कर दिया था।

मैं दोहराता हूं कि मैंने जो कहा वह सौ प्रतिशत सत्य है। निशिकांत दुबे ने इस बातचीत के तथ्य को दूसरी दिशा में ले जाने की कोशिश करते हुए कहा है कि उन्होंने मुझे कभी कोई पत्र नहीं लिखा।

मैंने यह नहीं कहा था कि निशिकांत दुबे ने उस तबादले को कराने के संबंध में मुझे कोई पत्र लिखा था। मैंने कहा था और दोहराता हूं कि उन्होंने LIC में वह तबादला कराने के लिए अपने अच्छे कार्यालयी संबंधों का इस्तेमाल करने को लेकर मुझसे बात की थी।

निशिकांत दुबे ने मुझसे यह कहकर बात को अतिशयोक्तिपूर्ण बनाने की कोशिश की है कि मैं अपने सेवा में मौजूद मित्रों से उनके लिखे किसी पत्र को निकलवाकर दिखाऊं, जिससे उन्हें यकीन हो जाए कि मैं ‘मर्द की औलाद’ हूं। मुझे यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि मैं मर्द की औलाद हूं या नहीं। इस तरह की देहाती और दबंग भाषा का इस्तेमाल निशिकांत दुबे ने केवल इस मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए किया है कि उन्होंने मुझसे इस विषय में बात की थी।

  1. यह मामला केवल मेरे शब्द बनाम उनके शब्द का मामला भी नहीं है। निशिकांत दुबे द्वारा LIC चेयरमैन से उनके मनमाफिक तबादले को कराने के लिए मुझ पर दबाव बनाने की घटना फरवरी 2018 की शुरुआत में बजट पेश होने के बाद हुई थी।

निशिकांत दुबे वित्त मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति के सदस्य और लोक लेखा समिति की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर संबंधी उप-समिति के अध्यक्ष थे, जैसा कि उन्होंने अपनी X पोस्ट में खुद कहा है। उन्होंने सोचा कि वह अपनी स्थिति का दुरुपयोग करके मुझ पर दबाव डाल सकते हैं और अपना काम करा सकते हैं।

जब मैंने ऐसा करने से इनकार कर दिया, तो निशिकांत दुबे ने मेरे खिलाफ दबाव बनाने और ब्लैकमेल करने की रणनीति शुरू कर दी।

  1. वित्त मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति के सामने आयुष्मान भारत योजना के लिए विशिष्ट बजट प्रावधान नहीं किए जाने से संबंधित मेरी गवाही और बजट 2018-19 में योजना की घोषणा के बाद उसके अंतिम रूप में देरी के कारण बजट प्रावधान नहीं होने की बात पूरी तरह तथ्यात्मक थी।

यह भी तथ्य है कि निशिकांत दुबे बैठक के तुरंत बाद प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के पास गए और उन्हें यह बताकर मेरे खिलाफ करने की कोशिश की कि मैंने आयुष्मान भारत योजना के अंतिम रूप में देरी को बजट की विशिष्ट मद में प्रावधान नहीं होने का कारण बताकर सरकार की प्रतिष्ठा कम की।

यह दिलचस्प है कि निशिकांत दुबे ने यह धारणा बनाने की कोशिश की है कि उन्होंने LIC में किसी तबादले के बारे में मुझसे बात नहीं की, लेकिन उन्होंने प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के पास जाकर आयुष्मान भारत के मामले में सरकार की प्रतिष्ठा कम करने का आरोप लगाने के मेरे बताए घटनाक्रम का खंडन नहीं किया है। यह बैठक फरवरी 2018 की 10 से 15 तारीख के आसपास हुई थी।

  1. एक बहुत स्पष्ट और महत्वपूर्ण सवाल है कि निशिकांत दुबे प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के कार्यालय में मेरे खिलाफ शिकायत करने के लिए क्यों दौड़े गए।

स्पष्ट रूप से वह LIC में तबादला कराने के लिए उनकी बात न मानने के कारण मेरे प्रति नाराज थे। निशिकांत दुबे ने आयुष्मान भारत के बजट प्रावधान को लेकर मेरे ईमानदार और पूरी तरह तथ्यात्मक बयान को एक अवसर के रूप में देखा और सोचा कि प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव को मेरी कथित अक्षमता/अविवेकशीलता से नाराज कराकर वह मुझ पर दबाव या ब्लैकमेल कर सकते हैं।

इस तथ्य से कि उन्होंने इस घटनाक्रम का खंडन नहीं किया है, यह साबित होता है कि यह बात सत्य थी।

  1. चूंकि निशिकांत दुबे की वह कोशिश भी कोई असर डालने में विफल रही, इसलिए उन्होंने एक और तरीका अपनाया।
  2. 22 सितंबर 2026 की अपनी X पोस्ट में निशिकांत दुबे ने लिखा—“मैं खुद PAC में वित्त के सब-कमेटी का अध्यक्ष था, रोज अपने सामने हाजिर कराता था, बदजुबानी नहीं चलेगी।”

मैंने इन शब्दों पर ध्यान दिया है—“रोज अपने सामने हाजिर कराता था”, जिसका अर्थ है कि वह वित्त की उप-समिति के ‘अध्यक्ष’ होने के नाते मुझे रोज अपने सामने बुलाते थे।

यह निश्चित रूप से एक बड़ा दावा है और दबाव और ब्लैकमेल करने की मानसिकता वाले व्यक्ति के व्यवहार को दर्शाता है।

सरकार के सचिव संसदीय समितियों और उप-समितियों के सामने सरकार की ओर से शपथ के तहत गवाही देते हैं। इसके लिए एक सम्मानजनक और निर्धारित प्रक्रिया होती है। पहले से नोटिस जारी किया जाता है और गवाही के विषय बताए जाते हैं।

संसदीय समितियों और उप-समितियों को सरकार में सभी लोग गंभीरता से लेते हैं। पूरी तैयारी की जाती है और गवाही के दिन सचिव के नेतृत्व में मंत्रालय/विभाग की टीम गवाही देती है।

संसदीय समितियों/उप-समितियों को “रोज अपने सामने हाजिर कराता था” कहकर हल्का बताना न केवल संसदीय प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है बल्कि संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन भी है।

निशिकांत दुबे का यह दावा कि संसदीय उप-समिति के अध्यक्ष के रूप में वह मुझे या किसी भी सरकारी सचिव को रोज अपने सामने उपस्थित होने के लिए बुला सकते थे, निश्चित रूप से संसदीय विशेषाधिकार का दुरुपयोग और उल्लंघन है।

  1. निशिकांत दुबे का यह दावा भी LIC चेयरमैन पर दबाव डालकर किसी अधिकारी का तबादला कराने में उनकी बात न मानने के कारण मेरे प्रति उनके असंतोष से जुड़ा है।

मुझे याद है कि निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली उप-समिति ने मुझसे राजकोषीय घाटे पर गवाही देने को कहा था। फरवरी 2018 में जब इसका नोटिस मिला, तो मैंने इसे राजस्व सचिव को भेजने का अनुरोध किया क्योंकि निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली कराधान उप-समिति की जिम्मेदारी राजस्व सचिव के पास थी, न कि मेरे पास, जबकि मैं आर्थिक मामलों के विभाग का सचिव था।

कराधान संबंधी उप-समिति के पास राजकोषीय घाटे के विषय की जांच करने का प्रथम दृष्टया कोई कारण भी नहीं था। हालांकि निशिकांत दुबे के कार्यालय ने जोर दिया कि निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली उप-समिति केवल मुझसे राजकोषीय घाटे के विषय पर गवाही लेना चाहती है। इसलिए मैं निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली उप-समिति के सामने उपस्थित होने के लिए तैयार हो गया।

यह स्पष्ट रूप से संसदीय उप-समिति के माध्यम से मेरे ऊपर अपना अधिकार जताने और इस तरह मुझे निशिकांत दुबे की बात मानने के लिए मजबूर करने का प्रयास था।

उप-समिति की एक बैठक हुई। आर्थिक मामलों के विभाग के सचिव के रूप में मैं निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली उप-समिति के सामने उपस्थित हुआ। हमने सभी संबंधित सामग्री उपलब्ध कराई और गवाही दी। मैंने इसे सामान्य प्रक्रिया के रूप में लिया। बैठक खत्म होने के साथ ही मेरे लिए मामला समाप्त हो गया।

  1. फरवरी 2018 के अंत में राजकोषीय घाटे के मामले में निशिकांत दुबे द्वारा कराई गई यह असामान्य गवाही अब उस 3 मार्च 2018 के पत्र से पूरी तरह जुड़ती है, जो निशिकांत दुबे ने प्रधानमंत्री को मेरे द्वारा राजकोषीय घाटे के अनुशासन को लेकर कथित अत्यधिक जोर देने की शिकायत करते हुए लिखा था।

यह पत्र उस सामग्री के आधार पर तैयार किया गया था, जो आर्थिक मामलों के विभाग ने निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली उप-समिति की बैठक के लिए उपलब्ध कराई थी और राजकोषीय घाटे के संबंध में मैंने जो गवाही दी थी।

उन्होंने इस सामग्री और गवाही के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल प्रधानमंत्री के मन में मेरे खिलाफ धारणा बनाने के लिए किया। इस प्रयास में भी निशिकांत दुबे सफल नहीं हुए क्योंकि प्रधानमंत्री ने मार्च 2018 से जुलाई 2019 तक कम से कम 16 महीने तक उस पत्र पर कोई कार्रवाई नहीं की।

मार्च 2018 में निशिकांत दुबे जिस तबादले की उम्मीद कर रहे थे, वह ‘रातों-रात’ नहीं हुआ, बल्कि 16 महीने बाद हुआ और वह भी पूरी तरह उन कारणों से, जिनका निशिकांत दुबे के 3 मार्च 2018 के पत्र से कोई संबंध नहीं था।

  1. निशिकांत दुबे ने LIC में तबादला कराने की उनकी बात न मानने के बाद अपनी निराशा में या मुझे मेरी जगह दिखाने के लिए मुझ पर दबाव डालने, डराने और ब्लैकमेल करने के तीन बड़े प्रयास किए।

पहला, उन्होंने आयुष्मान भारत के बजट प्रावधान को लेकर मेरी गवाही को पूरी तरह बेईमानी से पेश करके प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के मन में मेरे खिलाफ धारणा बनाने की कोशिश की।

दूसरा, उन्होंने मुझे ऐसी उप-समिति के सामने उपस्थित होने के लिए मजबूर किया, जिसकी जिम्मेदारी दूसरे विभाग के पास थी और ऐसे विषय—राजकोषीय घाटे—पर गवाही देने के लिए बुलाया, जो उनकी समिति के अधिकार क्षेत्र में नहीं था।

तीसरा, उन्होंने राजकोषीय घाटे से संबंधित आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री और मेरी गवाही का इस्तेमाल प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उन्हें मेरे खिलाफ प्रभावित करने और मुझे वित्त मंत्रालय से बाहर भेजने के लिए किया।

  1. पूरा घटनाक्रम और मामले के तथ्य शालिनी तिवारी के पॉडकास्ट में मेरे द्वारा निशिकांत दुबे की 3 सितंबर की पूरी तरह झूठी, अप्रिय और दुर्भावनापूर्ण पोस्ट के जवाब में बताए गए घटनाक्रम की पुष्टि करते हैं।

चूंकि पूरा घटनाक्रम पूरी तरह सत्य है और घटनाओं का क्रम मेरे बयान की पूरी तरह पुष्टि करता है, इसलिए मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि निशिकांत दुबे दबाव और ब्लैकमेल करने वाली प्रकृति के व्यक्ति हैं।

लगातार दबाव, डराने और मानहानि का प्रयास

  1. अपनी विभिन्न पोस्ट और इंटरव्यू में निशिकांत दुबे ने मुझे डराने, दबाने और बदनाम करने के उद्देश्य से अत्यधिक धमकी भरा और अपमानजनक रवैया अपनाया है। निशिकांत दुबे ने ऐसा व्यवहार किया है जैसे संसदीय और न्यायिक व्यवस्था पर उनका स्वामित्व या नियंत्रण हो।
  2. 21 सितंबर की अपनी X पोस्ट में निशिकांत दुबे ने लिखा—“ये जो सुभाष गर्ग पूर्व वित्त सचिव की बदजुबानी है, उसे मैंने ठीक करने का फैसला किया है।”

एक अन्य पोस्ट में निशिकांत दुबे ने कहा कि उन्होंने मेरे खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दायर किया है। उन्होंने मुझ पर “झूठ बोलने” का आरोप लगाया और आदेश दिया कि मुझे “सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी।” इसके बाद निशिकांत दुबे ने धमकी दी कि अगर मैंने “माफी” नहीं मांगी तो “मैं जेल जाऊंगा।”

फिर उन्होंने कहा—“सात दिन में माफी मांगो नहीं तो सलाखों तक ले जाने की कोशिश करूंगा।”

यह स्पष्ट रूप से धमकाने वाले व्यक्ति की भाषा है। निशिकांत दुबे को मानहानि का मामला दायर करने का पूरा अधिकार है। लेकिन क्या निशिकांत दुबे पुलिस, अभियोजक या न्यायाधीश हैं कि वह इतने विश्वास से कहें कि मैं जेल जाऊंगा और सलाखों के पीछे समय बिताऊंगा? केवल एक दबंग व्यक्ति ही ऐसी धमकियां देता है।

  1. निशिकांत दुबे ने मुझ पर देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने का आरोप लगाया—“देश की अर्थव्यवस्था को डुबोने वाले सुभाष”—और फिर से न्यायाधीश बनते हुए यह फैसला सुनाया कि मेरा भविष्य जेल जाना है—“का रास्ता जेल है।”

क्या निशिकांत दुबे मानते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है? हो सकता है। लेकिन जब मैंने सात साल पहले ही सरकार छोड़ दी थी, तो वह मुझ पर इसे बर्बाद करने का आरोप कैसे लगा सकते हैं?

क्या निशिकांत दुबे बात और व्यवहार में तारतम्य रख रहे हैं? यह बयान झूठा और पूरी तरह मानहानिकारक है।

  1. 21 से 23 सितंबर के बीच कई बार निशिकांत दुबे ने कहा कि मैं जेल जाऊंगा। यह डराने, धमकाने और मानहानि करने का प्रयास है, जिसका उद्देश्य मुझे निशिकांत दुबे द्वारा LIC में अपना काम कराने के असफल प्रयासों के संबंध में की गई सत्य टिप्पणियों को वापस लेने के लिए मजबूर करना है।
  2. मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि 2018 में निशिकांत दुबे की दबाव और ब्लैकमेल करने की रणनीति सफल नहीं हुई। मैंने उनकी बात नहीं मानी।

उन्होंने प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के कार्यालय, कराधान उप-समिति के अध्यक्ष के रूप में अपनी स्थिति और प्रधानमंत्री के कार्यालय का दुरुपयोग करके मुझे नुकसान पहुंचाने और दबाव बनाने की कोशिश की।

निशिकांत दुबे के ये सभी प्रयास फरवरी-मार्च 2018 में विफल रहे। यह महसूस करने के बाद कि वह मेरे ऊपर दबाव बनाकर अपनी बात नहीं मनवा सकते, उन्होंने मार्च 2018 के बाद मुझे परेशान करना बंद कर दिया।

मुझे लगता है कि अब भी निशिकांत दुबे के दबाव, धमकी और बदनाम करने के तरीके का यही हश्र होगा।

जोखिम और नुकसान से पूरी तरह अवगत

  1. मैंने ऊपर पूरे मामले के तथ्य और आधार बताए हैं। हालांकि मैं उन गैरकानूनी और गंदे तरीकों से होने वाले जोखिम और नुकसान से पूरी तरह अवगत हूं, जिनका निशिकांत दुबे इस्तेमाल कर सकते हैं, हालांकि यह जरूरी नहीं है कि वे ऐसा करें।
  2. निशिकांत दुबे किसी छोटे और अनजान शहर की अदालत में मेरे खिलाफ पूरी तरह झूठा और निराधार मामला दायर कर सकते हैं और समन तथा नोटिस की प्रक्रिया को इस तरह प्रभावित कर सकते हैं कि मेरे खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हो जाए।
  3. निशिकांत दुबे या उनके लोग मुझे शारीरिक या मौखिक रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं या जब मैं अदालत की कार्यवाही में शामिल होने जाऊं तो मेरी शांति भंग कर सकते हैं।
  4. निशिकांत दुबे मुझे और मेरी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए अन्य तरीकों और हथकंडों का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  5. मैं पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि इस तरह के खतरे, नुकसान और जोखिम से पूरी तरह अवगत होने के बावजूद मैं किसी दबंग, ब्लैकमेलर या व्यवस्था का दुरुपयोग करने वाले व्यक्ति को खुश करना पूरी तरह गलत और अपने मूल्य-तंत्र के खिलाफ मानता हूं।
  6. इसलिए मैं सिद्धांतों और तथ्यों से समझौता करने के बजाय यह जोखिम उठाना पसंद करूंगा।

क्या मैं मानहानि का मामला दायर करूंगा?

  1. जैसा कि ऊपर दिए गए पैराग्राफ में विस्तार से बताया गया है, निशिकांत दुबे ने कई ऐसे कृत्य किए हैं जो स्पष्ट रूप से झूठे, शरारतपूर्ण और मानहानिकारक हैं।
  2. हालांकि मेरा मानना है कि कोई व्यक्ति झूठे बयान, अशिष्ट भाषा, धमकी और मानहानिकारक आरोप लगाकर मेरी मानहानि नहीं कर सकता। मेरे आकलन में ऐसे कृत्यों से मेरी प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं होती।
  3. इसलिए, हालांकि ऊपर दर्ज निशिकांत दुबे के बयान कानून के तहत मेरे आकलन में आपराधिक मानहानि की श्रेणी में आते हैं, मैंने निशिकांत दुबे के खिलाफ कोई मानहानि का मामला दायर नहीं करने का फैसला किया है।

मानहानि कानून और मामले के तथ्यों की मेरी समझ

  1. निशिकांत दुबे द्वारा मुझ पर LIC चेयरमैन से बात करने और उनके इच्छित तबादले को कराने के लिए मेरे कार्यालय का इस्तेमाल करने के लिए दबाव डालने की घटना का मेरा वर्णन पूरी तरह सत्य है।

इसकी पूरी पुष्टि निशिकांत दुबे के उन कार्यों से होती है, जब वह आयुष्मान भारत के मामले में मेरी पूरी तरह सही गवाही का गलत इस्तेमाल करके प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के मन में मेरे खिलाफ धारणा बनाने के लिए उनके कार्यालय पहुंचे, उन्होंने मुझे ऐसी संसदीय कराधान उप-समिति के सामने गवाही देने के लिए मजबूर किया जिसका मेरे आर्थिक मामलों के विभाग के आधिकारिक कार्य से प्रथम दृष्टया कोई संबंध नहीं था और उन्होंने प्रधानमंत्री को मेरे द्वारा राजकोषीय घाटे के अनुशासन का पालन करने की शिकायत करते हुए बिना किसी उचित कारण के पत्र लिखा, जबकि इस अनुशासन का पालन करना मेरा दायित्व था।

सत्य भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 के तहत मानहानि को पूरी तरह खत्म करता है, जो मानहानि को परिभाषित और आपराधिक बनाती है।

  1. धारा 356(1) के तहत कोई आरोप तभी मानहानिकारक है, जब बोले गए शब्दों के जरिए किसी व्यक्ति के बारे में ऐसा आरोप लगाया या प्रकाशित किया जाए, जिसका उद्देश्य उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना हो।

शालिनी तिवारी के पॉडकास्ट में मेरे वर्णन का उद्देश्य निशिकांत दुबे द्वारा 2/3 सितंबर को X पर मेरे बारे में किए गए झूठे और दुर्भावनापूर्ण बयानों का जवाब देते हुए सच्ची कहानी बताना था। निशिकांत दुबे ने मुझे पागल, अज्ञानी बताया था, कहा था कि मुझे रातों-रात वित्त मंत्रालय से हटा दिया गया और मैं उस सदमे से उबर नहीं पाया हूं।

निशिकांत दुबे द्वारा सार्वजनिक रूप से किए गए इन गलत और दुर्भावनापूर्ण बयानों और आरोपों का जवाब देने का मेरे पास पूरा कारण था, खासकर तब जब शालिनी तिवारी ने मुझसे निशिकांत दुबे के गलत बयानों पर सीधा सवाल पूछा था।

शालिनी तिवारी के सवाल के मेरे जवाब से निशिकांत दुबे की प्रतिष्ठा को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। इसमें केवल पूरे मामले की सच्चाई सामने रखी गई। चूंकि सच्चे घटनाक्रम के वर्णन से निशिकांत दुबे की प्रतिष्ठा को कोई नुकसान नहीं पहुंच सकता था, इसलिए कानून के तहत यह मानहानि नहीं है।

  1. इसके अलावा, मेरे शब्द और वर्णन सद्भावना के साथ एक लोक सेवक के अपने सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन से संबंधित आचरण—प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव से बात करना और मेरे खिलाफ प्रधानमंत्री को पत्र लिखना—या इन आचरणों में दिखाई देने वाले निशिकांत दुबे के चरित्र के संबंध में राय व्यक्त करने के लिए थे। यह धारा 356 के अपवाद 2 के अंतर्गत पूरी तरह आता है।
  2. पूरे मामले का मेरा वर्णन भी सद्भावना के साथ निशिकांत दुबे के उस आचरण के संबंध में राय की अभिव्यक्ति था, जो एक सार्वजनिक प्रश्न से जुड़ा था और उससे संबंधित उनके चरित्र को लेकर था। यह धारा 356 के अपवाद 3 के अंतर्गत भी पूरी तरह आता है।
  3. इसलिए निष्कर्ष के रूप में, निशिकांत दुबे के संबंध में व्यक्त मेरी राय पूरी तरह वैध, सत्यपरक है और BNS की धारा 356 में मानहानि से जुड़े अपवादों के अंतर्गत आती है। इसलिए इस मामले में किसी भी तरह की मानहानि नहीं हुई है।

अंतिम बयान

  1. अंत में, निशिकांत दुबे के नोटिस के जवाब में मैं दोहराता हूं कि निशिकांत दुबे द्वारा मुझ पर अपने कार्यालय का इस्तेमाल करके उनके इच्छित और अनुचित तबादले को कराने के लिए अनुचित दबाव डालना, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के मन में मेरे खिलाफ धारणा बनाने का प्रयास करना, संसदीय समिति/उप-समिति की प्रक्रिया का दुरुपयोग करना और प्रधानमंत्री को मेरे खिलाफ प्रभावित करने के लिए पत्र लिखना—ये सभी कार्य मेरी बात न मानने के लिए मुझे सबक सिखाने के उद्देश्य से किए गए दबाव और ब्लैकमेल के प्रयास थे। ये घटनाएं निशिकांत दुबे को दबाव और ब्लैकमेल करने वाले व्यक्ति के रूप में स्थापित करती हैं।

जवाब

  1. यह जवाब आपको स्पीड पोस्ट/कूरियर के जरिए भेजा जा रहा है और आपके नोटिस में दिए गए पते [email protected] पर ईमेल भी किया जा रहा है। आपका नोटिस मुझे 23 सितंबर को मिला था और सात दिनों की अवधि के भीतर, 26 सितंबर को यह जवाब भेजा जा रहा है।

मैं इसे आपके उस नोटिस के जवाब में सोशल मीडिया पर भी सार्वजनिक कर रहा हूं, जिसे निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर साझा किया है।

  1. आपके द्वारा 21.09.2026 को जारी किया गया नोटिस पूरी तरह अनावश्यक और अनुचित है। धारा F में की गई राहत और कार्रवाई की सभी मांगों को पूरी तरह खारिज किया जाना चाहिए।
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