प्रेमकुमार मणि-
चापलूसी की भी हद होती है…
मुल्क एक अजीब दौर से गुजर रहा है। कहें तो हमारा देश- काल एक भयावह अराजकता के बीच है। इसे कई स्तरों पर आप अनुभव कर सकते हैं। जिसे जो मन में आता है बोल देता है। अभी एक पोस्ट पढ़ कर पता चला अपने 80 वें जन्मदिन पर पूर्व पत्रकार और भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण कला संस्था के अध्यक्ष स्वनामधन्य रामबहादुर राय ने कहा है कि भारत गाँधी मार्ग से मोदी मार्ग पर आ गया है। आदि…
मैं श्री राय के बारे में कुछ अच्छी राय रखता था। जानता हूँ संघ से जुड़े हैं और मैं इसे कोई अपराध नहीं मानता। व्यक्ति को स्वतन्त्रता होनी चाहिए कि वह कोई भी विचारधारा स्वीकार करे। लेकिन आदमी का एक व्यक्तित्व तो होना चाहिए। अस्सी साल की बुढ़ौती में इस चापलूसी का क्या मतलब! चापलूसी की सीमा होती है। नहीं है, तो होनी चाहिए। निश्चित ही मोदी साधारण आदमी नहीं हैं, इतने बड़े मुल्क के प्रधानमंत्री हैं। लेकिन क्या वह सचमुच गाँधी से किसी तरह तुलना के योग्य हैं?
गाँधी सफल रहे हों या विफल, वह उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय आन्दोलन के नायक थे, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका में वाशिंगटन। वाशिंगटन से किसी राष्ट्रपति की तुलना नहीं होती। गाँधी अनेक अर्थों में किसी राजनेता से ऊपर अपने समय के एक विचारक थे जिनकी दुनिया भर में चर्चा है। मैं गांधीवादी नहीं हूँ,लेकिन उनके महत्व को समझ सकता हूँ। इतना तो वक्तव्य देने वाले को समझना चाहिए था कि मोदी की तुलना प्रधानमंत्रियों से हो सकती है, उसमें भी नेहरू को छोड़ कर।
गाँधी, नेहरू, सुभाष, भगत सिंह ऐसे सितारे हैं जिनसे किसी की तुलना मुश्किल है। गाँधी से आज के किसी व्यक्ति की तुलना करना बालधम्म अथवा बचपना के सिवा क्या हो सकता है!
तुलनात्मक अध्ययन में संयम और मेधा दोनों का होना आवश्यक होता है। लोगों ने सुकरात की तुलना बुद्ध से की है। या कुछ लोगों ने कौटिल्य को अपने समय का मैकियावेली कहा है। अनेक लोगों ने कालिदास को भारत का शेक्सपियर कहा। सुभाष बोस ने गाँधी को भारत का कमाल पाशा कहा था। इसके पीछे कुछ गुण धर्म होते हैं। भारत गाँधी मार्ग से मोदी मार्ग पर आ गया है का अर्थ यह होगा कि मोदी गाँधी के विकसित रूप हैं या भारत ने गाँधी को खारिज कर मोदी को स्वीकार लिया है।
क्या अस्सी साल के रामबहादुर राय मोदी को उपरोक्त दो में से एक भूमिका में देखते हैं? मोदी क्या गाँधी के विकसित रूप हैं या फिर उनके ऐसे विकल्प जिसे गाँधी को खारिज करते हुए स्वीकार लिया गया हो।
पुराने समय से पत्रकारिता के घोषित संघी ‘माननीय’ राम बहादुर राय ने मोदी मार्ग को ही देश का सबसे सुन्दर रास्ता बताया, वहां मौजूद लोगों ने जोरदार तालियां बजायीं, शायद गोविन्दाचार्य ने भी, जिसे कितना बेइज्जत करके भाजपा से निकाला गया है, वह सब जानते हैं. लेकिन संघ का एक भी ‘बौद्धिक’ चमचई के इस परकाष्ठा पर कोई सवाल नहीं उठाया.
कम्युनिस्टों में कोई व्यक्ति ऐसा कह दें तो उसी खेमा के कई कॉमरेड उस चापलूस ‘कॉमरेड’ को सार्वजनिक रुप से नंगा कर देते हैं और करते रहते हैं.
संघ को इतना ही विवेदहीन व्यक्ति और मरा हुआ देश चाहिए, जो कभी कोई सवाल न पूछे.मैं हमेशा से कहता हूंः संघियों से ज्यादा लिजलिजा प्राणी कोई दूसरा नहीं होता है, उसमें गैरत ही नहीं होती है!
-जितेंद्र कुमार
राम बहादुर राय का ज़रूरत से ज़्यादा महिमा मंडन जातिवादी समाजवादियों ने किया, उन्ही का जमावड़ा है इनके इर्दगिर्द. असल में ये मानुवादी मार्ग के हैं. -प्रशांत टंडन
सवाल किसी व्यक्ति की चापलूसी, गैरत और लिजलिजेपन का नहीं है।
अधिक कठिन सवाल यह है कि किसी राजनीतिक संगठन में किन वैचारिक और संगठनात्मक स्थितियों में असहमति या मतभेद पैदा होते हैं, उन्हें किन विशेषताओं के साथ स्वीकार किया जाता है या दबा दिया जाता है।
संघ की संरचना में पावर की हायरकी ऐसी है कि वहां आलोचनात्मक विवेक की जगह समर्पण-भाव को लगभग स्वाभाविक स्तर पर विकसित किया जाता है और किसी व्यक्ति के भीतर वह इसे किस तरह एंजॉय करे, उसका भी एक वैचारिक अवचेतन निहित होता है।
यहां किसी संस्था से इसकी तुलना, मेरे ख्याल में, ज़रूरी नहीं थी। प्रभुत्व की श्रृंखला में चालित प्रत्येक संगठन कमोबेश अपने-अपने व्यावहारिक संचरण में ऐसा ही होता है।
क्या कम्युनिस्ट अपने आलोचनात्मक विवेक के साथ इससे मुक्त हैं!?
वहां भी क्या चापलूस फलते-फूलते नहीं रहते!?-शम्भू यादव
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