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उत्तर प्रदेश

आईएएस रिंकू राही को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि वे कोई काल्पनिक नायक या फैंटम नहीं हैं!

केपी सिंह-

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए — दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों को मैं जिले में तैनात आईएएस अधिकारी रिंकू राही के संदर्भ में याद करना चाहता हूँ। उनकी नीयत पर मुझे कोई संदेह नहीं है। बल्कि मेरी शुभकामनाएँ उनके साथ हैं कि इस जर्जर और सड़ांध मारते तंत्र में वे जितना संभव हो, उतना सुधार ला सकें। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जिस शैली में वे काम कर रहे हैं, उससे व्यवस्था में स्थायी परिवर्तन की संभावना कम और अनावश्यक टकराव तथा अराजकता की आशंका अधिक दिखाई देती है।

आज आम आदमी की बड़ी उम्मीदें उनसे जुड़ गई हैं। ऐसे में उन्हें यह समझना होगा कि हर लड़ाई जीतने के लिए लड़ी जाती है, केवल सुर्खियाँ बटोरने या फ़िदायीन की भूमिका निभाने के लिए नहीं। परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम संस्थागत प्रक्रिया होती है, न कि निरंतर टकराव।

हर प्रशासनिक व्यवस्था का अपना अनुशासन, अधिकार-क्षेत्र और कार्य-व्यवहार होता है। कोई भी अधिकारी, चाहे वह कितना ही ईमानदार और साहसी क्यों न हो, उस व्यवस्था से ऊपर नहीं होता। रिंकू राही भी अपवाद नहीं हैं। वे संप्रभु सत्ता नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढाँचे का एक हिस्सा हैं।

नगर पालिका की जांच के प्रकरण को ही लें। यदि यह मान भी लिया जाए कि उन्हें जांच समिति से पृथक किए जाने का आदेश समय पर प्राप्त नहीं हुआ था, तब भी जिस समिति की अध्यक्षता अपर जिलाधिकारी (नमामि गंगे) कर रहे थे, उन्हें दरकिनार कर सीधे नगर पालिका पहुँचने का औचित्य समझ से परे है। किसी जांच को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया जाना चाहिए।

यदि वे नगर पालिका पहुँचे भी थे तो उन्हें अधिशासी अधिकारी से औपचारिक रूप से सहयोग माँगना चाहिए था। यदि सहयोग नहीं मिलता, तो जिलाधिकारी को लिखित रूप से अवगत कराते। यदि जिलाधिकारी के स्तर पर भी संतोषजनक कार्रवाई न होती, तो शासन को पूरा तथ्य भेजते। यही प्रशासनिक मर्यादा और संस्थागत प्रक्रिया है। लेकिन पूरे लाव-लश्कर के साथ नगर पालिका कार्यालय पहुँच जाना और उस तथाकथित जांच का सार्वजनिक प्रदर्शन होने देना प्रशासनिक गरिमा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

इसमें कोई दो राय नहीं कि उरई नगर पालिका में भ्रष्टाचार के आरोप गंभीर हो सकते हैं। लेकिन क्या उरई अकेली ऐसी नगर पालिका है? प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में अनेक नगर निकायों और पंचायतों में भ्रष्टाचार की शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं। ऐसी स्थिति में यह सोच लेना कि एक उदाहरण प्रस्तुत कर देने से पूरा तंत्र बदल जाएगा, व्यवहारिक नहीं है। फ़िल्मी संवादों में यह अच्छा लगता है कि “एक कौआ मारकर टांग दो, बाकी सारे कौए भाग जाएँगे”, लेकिन वास्तविक प्रशासन इस तरह नहीं चलता। व्यवस्था कहीं अधिक व्यापक, जटिल और धैर्य की माँग करने वाली होती है।

मेरी चिंता केवल इतनी है कि रिंकू राही जैसे अधिकारी प्रशासन में लंबी और प्रभावशाली पारी खेलें। उनकी ऊर्जा, ईमानदारी और संवेदनशीलता व्यवस्था के भीतर रहते हुए अधिक लोगों के काम आ सकती है। यदि वे हर मोर्चे को निर्णायक युद्ध बना देंगे, तो आशंका यही रहेगी कि पहली ही गेंद पर बोल्ड हो जाएँ। तब नुकसान केवल उनका नहीं होगा, बल्कि उन असंख्य लोगों का भी होगा जिनकी उम्मीदें उनसे जुड़ी हैं।

व्यवस्था बदलने का सपना अवश्य देखना चाहिए, लेकिन व्यवस्था के भीतर रहकर उसे बदलने के लिए संयम, धैर्य, रणनीति और संस्थागत मर्यादाओं का पालन भी उतना ही आवश्यक है। टकराव कभी-कभी अपरिहार्य हो सकता है, किंतु उसे ही कार्यशैली बना लेना दूरगामी समाधान नहीं है।

रिंकू राही को यह भी स्मरण रखना चाहिए कि वे कोई काल्पनिक नायक या फैंटम नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रशासनिक व्यवस्था के एक अधिकारी हैं। एक अधिकारी यदि अपने कार्यकाल में कुछ लोगों का जीवन बेहतर बना दे, कुछ संस्थाओं को अधिक जवाबदेह बना दे और व्यवस्था में ईमानदारी की थोड़ी-सी जगह भी बढ़ा दे, तो वह भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।

और यदि उनका लक्ष्य सचमुच व्यापक, आमूलचूल परिवर्तन का है, तो शायद प्रशासनिक सेवा की सीमाएँ उसके लिए पर्याप्त न हों। तब उन्हें उस बड़े आकाश की तलाश करनी होगी, जहाँ से वे पूरे तंत्र को बदलने की भूमिका निभा सकें। फिलहाल आवश्यकता इस बात की है कि वे अपनी ऊर्जा को संघर्ष के साथ-साथ रणनीति में भी रूपांतरित करें, क्योंकि इतिहास केवल साहस से नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण धैर्य से भी लिखा जाता है।

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