शोभित मिश्रा-
एक मोबाइल, कुछ सपने और 50 हजार लोग… 18 साल की पत्रकारिता का सफर… कभी-कभी जिंदगी में कोई संख्या सिर्फ संख्या नहीं होती, उसके पीछे वर्षों की मेहनत, संघर्ष, असफलताएं, विरोध, उम्मीदें और अनगिनत रातों की बेचैनी छिपी होती है।
आज मेरे लिए 50 हजार फॉलोअर्स की संख्या भी ऐसी ही है। मेरे फेसबुक पेज Fast News Hardoi पर आज 50 हजार लोग जुड़ चुके हैं। यह मेरे लिए सिर्फ सोशल मीडिया का एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन लोगों का भरोसा है, जिन्होंने मेरी पत्रकारिता को पढ़ा, देखा, परखा और फिर मेरे साथ खड़े हुए।
वर्ष 2008 में पत्रकारिता की शुरुआत की थी। पिछले जून महीने में पत्रकारिता के सफर के 18 वर्ष पूरे हो गए। पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि यह सफर जितना लंबा रहा, उतना ही कठिन भी।
बड़े-बड़े अखबारों में मेरे लेख नहीं छपे। राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रकारिता का बड़ा ज्ञान होने का दावा भी नहीं है। बड़े संस्थानों की चमक-दमक और बड़े संसाधनों का हिस्सा भी नहीं बन सका। लेकिन एक चीज हमेशा मेरे पास रही, अपने आसपास के समाज को देखने और उसकी आवाज बनने की कोशिश।
मैंने हमेशा महसूस किया कि पत्रकारिता का असली मतलब सिर्फ बड़ी खबरों तक पहुंचना नहीं है। उस गरीब की आवाज भी खबर है, जिसकी सुनने वाला कोई नहीं। वह स्थानीय समस्या भी खबर है, जिसके समाधान के लिए कोई अधिकारी तक बात पहुंचाने वाला नहीं। वह पीड़ा भी खबर है, जो किसी बड़े चैनल के कैमरे तक नहीं पहुंचती।
इसी सोच के साथ पत्रकारिता करता रहा। आज संसाधनों की भरमार का दौर है। बड़े संस्थानों के पास कैमरे हैं, स्टूडियो हैं, बड़ी टीमें हैं, गाड़ियां हैं, तकनीकी सुविधाएं हैं। मेरे पास इन सबके नाम पर कुछ नहीं है।
मेरे पास है तो सिर्फ एक मोबाइल, इसी मोबाइल से डिजिटल दौर में मैंने अपना कदम रखा। इसी मोबाइल को अपना कैमरा बनाया, इसी को अपना माध्यम बनाया और इसी के सहारे Fast News Hardoi नाम का अपना एक छोटा-सा मंच खड़ा किया।
न अखबार निकालने के लिए पूंजी है, न चैनल चलाने का माद्दा, लेकिन खबर कहने की इच्छा है और शायद यही इच्छा अब तक मुझे आगे बढ़ाती रही है।
मेरी कोशिश हमेशा यही रही कि स्थानीय स्तर पर जनहित से जुड़ी खबर सबसे पहले लोगों तक पहुंचे और आम आदमी की बात शासन-प्रशासन तक पहुंचे।
पत्रकारिता शुरू करते समय मेरे बताया गया था कि खबर कब, कहां, क्यों और कैसे पर आधारित हो।
लेकिन समय के साथ मेरी पत्रकारिता का नजरिया इन सवालों से आगे बढ़ गया। अब मेरे लिए खबर का सबसे बड़ा आधार सिर्फ एक है- सत्य दिखाओ और सबसे पहले दिखाओ।
शायद इसी सोच की वजह से कुछ लोगों का साथ और सहयोग मिला। कुछ लोगों ने भरोसा किया, हौसला बढ़ाया और मुश्किल समय में साथ खड़े रहे।
लेकिन दूसरी तरफ विरोध भी कम नहीं मिला। बहुत से लोगों के निशाने पर हूं। कई बार अपनी बात कहने की कीमत भी चुकानी पड़ी, कई बार लगा कि रास्ता आसान नहीं है, उलझनें आईं, परेशानियां आईं। लेकिन अब इनकी परवाह करना छोड़ दिया है। क्योंकि खबरों के लिए जीने की आदत हो गई है।
दूसरों के संस्थानों में काम करते हुए कई बार महसूस हुआ कि अपनी बात पूरी तरह और खुलकर लिखने की आजादी नहीं है। पत्रकारिता अगर किसी मजबूरी के आगे झुक जाए तो फिर वह पत्रकारिता नहीं रह जाती।
इसीलिए अब अपना एक ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करने की कोशिश कर रहा हूं, जहां आम आदमी की बात खुलकर कही जा सके। जहां किसी कमजोर की आवाज दबे नहीं। जहां स्थानीय समस्या सिर्फ इसलिए छोटी न समझी जाए कि वह राष्ट्रीय सुर्खी नहीं बन सकती।
जहां खबर किसी व्यक्ति विशेष को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाने के लिए की जाए।
मेरे पास संसाधन आज भी सीमित हैं, चुनौतियां आज भी बहुत हैं। लेकिन विश्वास आज भी उतना ही मजबूत है कि अगर नीयत साफ हो, मेहनत ईमानदार हो और खबर के पीछे जनहित हो, तो एक मोबाइल से भी आवाज दूर तक पहुंचाई जा सकती है।
50 हजार फॉलोअर्स मेरे लिए मंजिल नहीं हैं। बल्कि यह एक नई जिम्मेदारी की शुरुआत है।
इन 50 हजार लोगों ने मुझे सिर्फ फॉलो नहीं किया है, बल्कि मेरी पत्रकारिता पर भरोसा किया है। इस भरोसे को बनाए रखना किसी भी संख्या से कहीं बड़ी चुनौती है।
18 साल पहले पत्रकारिता की जिस राह पर कदम रखा था, आज भी उसी राह पर हूं। न कोई बड़ा संस्थान है, न बड़ी पूंजी, न बड़ा नेटवर्क, न बड़े संसाधन।
बस एक मोबाइल है, कुछ सपने हैं, समाज के प्रति जिम्मेदारी का एहसास है और सच को सच कहने की जिद है। किसी के आगे झुकना नहीं है। किसी के दबाव में रुकना नहीं है और सबसे जरूरी- सच को छिपाना नहीं है।
आज जब Fast News Hardoi परिवार 50 हजार का हुआ है, तो मैं उन सभी लोगों का दिल से आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने इस सफर में मेरा साथ दिया, मेरी खबरों को पढ़ा, साझा किया, अपनी समस्याएं बताईं और मुझ पर भरोसा किया।
यह 50 हजार लोग मेरे लिए सिर्फ फॉलोअर्स नहीं हैं, यह मेरी 18 साल की पत्रकारिता के साक्षी हैं, सफर अभी लंबा है। मुश्किलें अभी बहुत हैं। संसाधन अभी भी कम हैं, लेकिन हौसला कम नहीं हुआ है।
कल भी कोशिश थी कि सच दिखाऊं और सबसे पहले दिखाऊं, आज भी यही कोशिश है और जब तक कलम, कैमरा/यह मोबाइल साथ हैं। कोशिश जारी रहेगी। क्योंकि पत्रकारिता मेरे लिए सिर्फ पेशा नहीं है। यह जीने की आदत बन चुकी है।


