
सुभाष सिंह सुमन-
फ्रेंड्स, विदेश नीति में हम एक और डंकापीटन के करीब हैं। यह डंकापीटन सामरिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है।
ईरान में एक बंदरगाह है। चाबहार पोर्ट। इसकी भौगोलिक स्थिति मजेदार है। मैप देखते ही समझ सकते हैं। भारत के लिए यह पोर्ट खास है। यह भारत को चीन-पाकिस्तान के खिलाफ खड़े होने की ठोस जमीन देता है। यह हमारे व्यापार को पश्चिम एशिया से यूरोप तक जाने का रास्ता देता है। चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के साथ व्यापक युद्ध की स्थिति में इसकी भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है।
अभी बीते दिनों अफगानिस्तान को हमने अनाज समेत काफी मदद भेजी। सब इसी बंदरगाह के रास्ते गया। इसका महत्व और समझना हो, तो चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ पॉलिसी देखकर समझ सकते हैं। चीन की इस पॉलिसी का टारगेट है मेनलैंड चीन से वाया हिंद महासागर-अरब सागर अफ्रीका तक बंदरगाहों की चेन तैयार करना। इस चेन की सबसे अहम कड़ी है पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट। ग्वादर को चीन ने व्यापार और युद्ध दोनों को ध्यान में रखकर डेवलप किया है। वही उसे ऑपरेट भी करता है।
ग्वादर की एकमात्र काट चाबहार है। इसी कारण पिछले ढाई दशक में हमारी हर सरकार ने चाबहार को अपनी विदेश नीति में विशेष स्थान दिया। कई मिलियन डॉलर भारत ने चाबहार पर खर्च किये। अटलजी की सरकार ने इसपर काम शुरू किया। मनमोहन सिंहजी की सरकार ने चाबहार पर काम और आगे बढ़ाया। मोदीजी की सरकार भी चाबहार पर सही दिशा में बढ़ी। तीनों सरकारों का श्रेय है कि ईरान ने हमें चाबहार पोर्ट में सिर्फ एंट्री नहीं दी, बल्कि अपने हिसाब से डेवलप करने और चलाने का भी अधिकार दिया।
हमने चाबहार पोर्ट पर शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल तैयार किया। इसपर टोटल खर्च हुआ 120 मिलियन डॉलर। अपनी करेंसी में 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा। इसकी आखिरी किस्त हमने पिछले साल अगस्त में दे दी। इसके अलावा 250 मिलियन डॉलर क्रेडिट पर ईरान को देने की भी डील हुई। 235 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन पहले ही दी जा चुकी है। अपनी करेंसी में यह हो जाता है करीब 2,250 करोड़ रुपये।
भारत में सरकारें बदलीं, प्रधानमंत्री बदले, लेकिन सबने चाबहार का महत्व समझा। चाबहार से आगे ईरान का महत्व समझा। यह समझा कि भारत के व्यापक हित चाबहार और ईरान से सधते हैं। इस व्यापक हित को साधने में हमारी सरकारों ने कई हजार करोड़ रुपये खर्च किये।
अब ताजा डेवलपमेंट यह है कि 20-25 सालों की हमारी मेहनत और कई हजार करोड़ रुपये का हमारा निवेश कोलैप्स होने की कगार पर है। 3-4 महीने पहले रॉयटर्स ने इसपर स्टोरी की थी। उसने बताया था कि भारत चाबहार से पीछे हटने की तैयारी कर रहा है। हमारी सरकार ने रॉयटर्स की रिपोर्ट का फैक्टचेक करते हुए उसे फेक न्यूज बता दिया था। अभी पिछले महीने खबरें आयीं कि अमेरिका ने ईरान पर हमलों में चाबहार पर भी बम-मिसाइल दागे। हमारी सरकार ने उन खबरों का भी फैक्टचेक करते हुए सबको फेक न्यूज बता डाला। सरकार ने कहा हमारा बनाया टर्मिनल पूरी तरह सुरक्षित है।
कुछ ही दिन बाद अमेरिका की तरफ से ईरान को हुए नुकसान की कई तस्वीरें जारी की गयीं, उनमें कुछ तस्वीरें चाबहार पर हमारे द्वारा बनाये गये टर्मिनल की भी थीं और तस्वीर तबाही की कहानी कह रही थीं। पर यह नयी बात नहीं है। हमारी मौजूदा सरकार को आधिकारिक बयानों में सफेद झूठ बोल देने की महारत हासिल हो चुकी है।

अभी बिजनेसलाइन की एक खबर है। उसमें सरकारी अधिकारी चाबहार पर सरकार की तैयारी बता रहे हैं। सरकार की तैयारी है चाबहार से पूरी तरह निकलने की। भारत सरकार 1,000 करोड़ रुपये से अधिक के अपने प्रत्यक्ष निवेश से बने शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का परिचालन ईरान को सौंपने की बातचीत कर रही है। ईरान से 2 साल पहले ही इसपर डील हुई थी, जिसमें 10 साल के लिए टर्मिनल का परिचालन हमें मिला था।
कारण जानेंगे तो डंके की आवाज और तेज हो जायेगी। कारण हैं ट्रंप और अमेरिका। अमेरिका ने ईरान पर लगे प्रतिबंधों से हमें 2018 में छूट दे दी थी, जिससे हम चाबहार पर काम बढ़ा पाये। ट्रंप चचा ने पिछले साल सितंबर में छूट समाप्त कर दी। फिर कुछ समय के लिए आंशिक छूट दी गयी। अक्टूबर से छूट शुरू हुई। इस अप्रैल में खत्म हो गयी। अब हमारे बहादुर को लग रहा डर। जिन लाल-लाल आँखों की कल्पना पर मंदबुद्धि भक्त मोहित हैं, ट्रंप के सामने वो गुलाबी हो जाती हैं।
दो साल से ट्रंप बिना नागा किये हर हफ्ते एक बार जलील करता है, लेकिन हमारे बहादुर की ठकुरसुहाती बंद होने का नाम नहीं ले रही। हाँ, लीपापोती करने के लिए सरकार सिर्फ एक तर्क मैन्युफैक्चर कर पा रही है कि हम हमेशा के लिए परिचालन नहीं सौंप रहे। जब हालात अनुकूल होंगे, हम फिर से परिचालन अपने हाथों में ले लेंगे। यहाँ हालात अनुकूल होने का अर्थ है जब ट्रंप से अनुमति मिल जायेगी।
खुले दिमाग का कोई भी व्यक्ति डंके की इन आवाजों से माथा पकड़कर बैठ जायेगा। भारत जैसी आर्थिक-सैन्य शक्ति को किसी ने ट्रंप के हाथों में गिरवी रख दिया है। कौन देश हमारा दोस्त होगा और कौन दुश्मन, यह अमेरिका तय कर रहा है। हम अपनी जरूरत के सामान कब, किससे और कितना खरीदेंगे, यह अमेरिका तय कर रहा है। हम डीजल-पेट्रोल शुद्ध यूज करेंगे या मिलावटी, यह भी अमेरिका तय कर रहा है। हम चीनी सस्ता खरीदेंगे या महँगा, यह अमेरिका तय कर रहा है। हम अमेरिका के उपनिवेश हैं क्या, जो हमारा प्रधानमंत्री हमें छोड़कर ट्रंप के प्रति जवाबदेह बना हुआ है? शर्तें तो हम सारी ही पूरी कर रहे हैं।


