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तरुण तेजपाल को दुनिया का दुर्दांत बलात्कारी बनाए जाने का अभियान चल रहा है!

Male speaker with gray beard on a dark stage, hands raised in a gesturing pose while talking.

खबरों के अनुसार मुझे लगता है कि कुलदीप सेंगर का अपराध तरुण तेजपाल के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। सत्ता तरुण के खिलाफ है – क्योंकि तरुण के संपादन में भाजपा के खिलाफ पत्रकारिता हुई है।

संजय के सिंह-

सुप्रीम कोर्ट जनता के लिए है, सरकार की सहायता के लिए नहीं…

अब कोई शक नहीं है कि तरुण तेजपाल का मामला राजनीतिक है। उनके खिलाफ बलात्कार का नहीं, दुष्कर्म का मामला है। कानून की नजर में स्थिति क्या है मैं नहीं जानता लेकिन आरोप पांच सितारा होटल की चलती लिफ्ट में छेड़छाड़ / बलात्कार या दुष्कर्म का है। निचली अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने 10 साल की सजा दी है। निचली अदालत के खिलाफ अपील राज्य यानी सरकार को करना होता है और सरकार का निर्णय राजनीति से प्रेरित होता है। पीड़िता करे तो अलग बात है। मैं नहीं जानता और खबरों में नहीं बताया जाता है कि अपील किसने की।

दूसरी ओर भाजपा नेता कुलदीप सेंगर का मामला है। राज्य यानी सरकार ने किन मामलों में क्या किया और क्या नहीं किया, सबको पता है। बात सिर्फ बलात्कार की नहीं है, राज्य यानी सत्ता को सक्रिय करने की भी है। सरकार कब कैसे सक्रिय हुई और जब हुई तो क्या-क्या हुआ वह भी सार्वजनिक है। उन्हें सजा के बाद राहत मिल गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने (शायद) स्वतः संज्ञान लिया। सरकार ने तो मोटा-मोटी बचा ही लिया था। मैं जानबूझकर शायद लिख रहा हूं, चेक कर सकता हूं पर नहीं कर रहा हूं क्योंकि खबरें ऐसे ही हुई हैं कि सत्ता ने बचा लिया था, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने जेल भेज दिया।

तेजपाल को दुनिया का दुर्दांत बलात्कारी बनाए जाने का अभियान चल रहा है। निचली अदालत से बरी किए जाने के बाद हाईकोर्ट ने जो सजा दी उससे बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती थी। अगर राजनीतिक मामला होने के कारण किसी (नागरिक या पत्रकार को) फंसाया जाए तो उसके पास अपील करने और लड़ने की आर्थिक ताकत कहां है और किसके पास हो सकती है। खबरों के अनुसार तरुण तेजपाल से पहले सरकार ने अपील की – सजा बढ़ाने के लिए, कम है। यह कानून की नहीं, बोलचाल की भाषा में है।

इसके बाद खबर आई कि तेजपाल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है। अब तो मजबूरी भी हो गई होगी। हालांकि हाईकोर्ट के आदेश से राहत के लिए ही होनी थी। तेजपाल पर जो आरोप हैं उसमें सरकार को लगता है कि हाईकोर्ट ने सजा कम दी जबकि निचली अदालत ने बरी कर दिया। सरकार जनता के खर्च पर नागरिक के खिलाफ अपील करती है। वह दुर्दान्त अपराधी नहीं है। इस सरकार ने अजमल कसाब को फांसी दिलाने की सरकारी नौकरी करने वाले अधिवक्ता उज्जवल निकम को राज्यसभा की सदस्यता का पुरस्कार दिया है। तेजपाल को सजा दिलाने वाले को क्यों नहीं देगी?

ऊपर की अदालत में अपील और हाईकोर्ट के फैसले के मामले में अरविन्द केजरीवाल के साथ जो हुआ और उन्होंने बताया या उससे संबंधित जो खुलासे हुए उसे याद करें तो साफ है कि सरकारी कार्रवाई राजनीतिक बदले के लिए हो रही है। मैं कोर्ट के आदेशों-फैसलों के बारे में नहीं जानता, कानून मेरा विषय नहीं है लेकिन जो खबरें छपी हैं उससे साफ है कि सरकार यह संदेश देने में कामयाब रही है कि हमारे साथ रहो तो सौ खून माफ, नहीं तो किसी ना किसी तरह फंसा ही दिये जाओगे। सत्येन्द्र जैन हों या तरुण तेजपाल।

आज छपी खबरों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने तेजपाल से तीन हफ्ते के अंदर समर्पण करने के लिए कहा है और यह शर्त है। इसके बाद ही बांबे हाईकोर्ट द्वारा 10 साल की सजा को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई की जाएगी। मुझे लगता है कि यह शर्त राज्य सत्ता की जीत है। मैं आरोप के बारे में नहीं जानता उसपर टिप्पणी नहीं कर रहा हूं। मैं दो मामलों की तुलना कर रहा हूं। खबरों के अनुसार मुझे लगता है कि कुलदीप सेंगर का अपराध तरुण तेजपाल के मुकाबले कई गुना ज्यादा है। सत्ता तरुण के खिलाफ है – क्योंकि तरुण के संपादन में भाजपा के खिलाफ पत्रकारिता हुई है।

सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट की सजा को बढ़ाने की अपील है और सजा कम करने की भी। दोनों पर जल्दी सुनवाई कर शीघ्र अंतिम निर्णय करने की बजाय समर्पण करने के लिए मजबूर करना मुझे लगता है कि अपील की प्रक्रिया के बावजूद सत्ता की ताकत स्थापित करना है। राहुल गांधी के मामले में यही हुआ था। अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला समय पर आता तो सदस्यता नहीं जाती, बंगला खाली नहीं करना पड़ा आदि और अकेला सब पर भारी स्थापित नहीं होता। पर हुआ, अब भी हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट जनता के लिए है, सरकार की सहायता के लिए नहीं।

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