अनिल भास्कर-
मीडिया से जुड़े साथियों की आम शिकायत क्या रही है? बेगार। यानी बिन पैसा काम। पर यहां बेगार से आशय है तय पगार में काम के बेहिसाब घंटे। 24 घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनल हों या फिर 24 घंटे में एक बार प्रकाशित होने वाले अख़बार, दोनों जगह सेवाएं देने वाले साथियों का यह साझा दर्द रहा है। खासकर रिपोर्टिंग से जुड़े साथियों का। उनके लिए न काम के घंटे तय होते हैं, न दिन-रात की सीमा। वे आमतौर पर 24 घंटे के सिपाही होते हैं। वर्क लाइफ बैलेंस के फलसफे से कोसों दूर। मगर इस बिरादरी को शायद यह जानकर शायद थोड़ी तसल्ली हो कि बेगार करने वाले वे अकेले नहीं।
द सीएसआर जर्नल द्वारा हाल ही जारी ‘पीपल एट वर्क 2026’ रिपोर्ट कहती है कि भारत में बिना पैसे के काम करने वाले कर्मचारियों का अनुपात सबसे ज़्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार 24 प्रतिशत लोग हर हफ़्ते ऐसे कामों में सामान्य से 16 घंटे या उससे भी ज़्यादा समय बेगार करते हैं।
इसके अलावा 40 प्रतिशत कर्मचारी हर हफ़्ते छह से 15 घंटे बिना पैसे वाले कामों में बिताते हैं। इससे पता चलता है कि भारत के कर्मचारियों का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी मेहनताने के अतिरिक्त समय दे रहा है। ऐसा भी नहीं कि बेगार का यह आलम सिर्फ अपने देश में है। बाकी दुनिया में भी यह चलन खूब है। फर्क सिर्फ घंटों का है। रिपोर्ट कहती है कि दुनियाभर में 62 प्रतिशत कर्मचारी हर हफ़्ते पांच घंटे तक बिना पैसे वाला काम करते हैं। वहीं, 26 प्रतिशत कर्मचारी बिना पैसे वाले कामों में छह से 15 घंटे लगाते हैं और 12 प्रतिशत कर्मचारी ऐसे कामों में 16 घंटे या उससे ज़्यादा समय देते हैं।
दुर्भाग्य से बेगार का यह चलन किसी खास तरह के कार्यक्षेत्र तक सीमित नहीं है। नतीजों से पता चलता है कि हाइब्रिड या ऑफिस में काम करने वाले साथियों की तुलना में रिमोट वर्कर्स के बिना पैसे के काफी ज़्यादा काम करने की संभावना होती है। यह ट्रेंड बताता है कि रिमोट वर्क का तरीका अलग-अलग सेक्टर में बिना पैसे वाले काम के घंटों में बढ़ोतरी की वजह हो सकता है।
इसके अलावा युवा कर्मचारियों में बिना पैसे के काम करने की संभावना ज़्यादा देखी गई है, जो काम के प्रति नज़रिए और व्यवहार में पीढ़ीगत अंतर को दिखाता है। यह वर्ग काम की ज़िम्मेदारियों को प्राथमिकता दे सकता है या अतिरिक्त कोशिशों के लिए पैसे की मांग करने में खुद को कमज़ोर महसूस कर सकता है।
लेकिन रिपोर्ट से एक खास बात यह पता चली है कि बिना पैसे वाले काम के घंटों में बढ़ोतरी का मतलब हमेशा प्रोडक्टिविटी बढ़ना नहीं होता है। जिन कर्मचारियों ने बताया कि वे बिना पैसे के ज़्यादा घंटे काम करते हैं, उन्होंने कहा कि उन्हें अक्सर ऐसा महसूस होता था कि वे अपनी क्षमता के हिसाब से कम प्रोडक्टिव हैं। इनमें से कई कर्मचारियों ने तनाव महसूस करने और अपनी मौजूदा नौकरी छोड़ने की इच्छा भी ज़ाहिर की। मीडिया संस्थानों को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। खासकर उन्हें जिनके लिए काम की गुणवत्ता अब भी महत्व रखती है।


