लखनऊ से आज बड़े भाई अनेहस शाश्वत जी का फ़ोन आया। उन्होंने बताया कि उन्होंने कुछ लिख दिया है जिसे सबको पढ़ाया जाना चाहिए। उनके आदेशानुसार पहले मैंने ख़ुद पढ़ा। मुझे अच्छा लगा तो यहाँ डाल रहा हूँ। नेताओं को कॉर्पोरेट चलाता है। कॉरपोरेट ही तय करता है किसे उठाना है किसे गिराना है। मोदी को जिस मक़सद से कॉर्पोरेट लाया था, वो पूरा हो चुका है। इसी पर केंद्रित है वरिष्ठ पत्रकार अनेहस शाश्वत जी का ये विश्लेषण-
अब मोदी रहें या जाएं, उनको जो करना था वो कर चुके!
-यशवंत

अनेहस शाश्वत-
बात होगी सन 1985-86-87 के आसपास की। पूरी दुनिया कैसे नई वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपनाए, इस पर उरुग्वे दौर की बातचीत चल रही थी। हम लोग उस समय अच्छे जॉब के लिए तैयारी कर रहे थे, तो ऐसी चीजों की जानकारी रखना जरूरी था। अब इसी जगह पर ये जानना जरूरी है कि उस समय ऐसा क्यों किया जा रहा था? आइए, जितना मेरा ज्ञान है, उस हिसाब से समझते हैं।
सन 1950 के आसपास दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बहुत सारे देश स्वतंत्र हो चुके थे, यूरोप ध्वस्त हो चुका था और दुनिया रूस और अमेरिका, इन दो देशों के बीच बंट चुकी थी। स्वतंत्र हुए देश तरह-तरह के कंट्रोल लगाकर अपनी इकोनॉमी को उन्नत कर रहे थे, जिससे इन देशों के बाजार में यूरोप और अमेरिका की पहुंच मुश्किल हो रही थी। ऐसे में आवारा पूंजीवाद के इस दौर में व्यापार में दिक्कतें आ रही थीं। इसलिए नई वैश्विक व्यवस्था लाई गई, जो नियंत्रण-मुक्त थी। मोटे तौर पर वैश्विक व्यापार में जो जहां मन हो, व्यापार करे और मुनाफा कमाए।
लेकिन इसके लिए जो चीजें जरूरी थीं, उनमें एक यह भी थी कि ऐसे व्यापार में अग्रणी रहने के लिए औद्योगिक जगत मजबूत होना चाहिए था, जो भारत का नहीं था। यहां के उद्यमी सरकार पर आश्रित थे और वैश्विक स्तर पर कहीं नहीं टिकते थे।
बहरहाल, अब ये काम होना ही था, तो इस पर उस समय एक्सपर्ट्स ने अपनी राय दी। अधिकांश का मानना था कि नई वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत ऐसे उद्योगपतियों के हाथ में चला जाएगा, जो सरकार को अपने अनुकूल कर देश को ही लूट लेंगे। क्योंकि वैश्विक स्तर पर ऐसे उद्यमियों का कोई स्थान नहीं है। और देखिए, वही हुआ भी।
जब ये व्यवस्था लागू हुई, उस समय नरसिंह राव प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे।
इस समय यहीं पर एक बात स्पष्ट कर दें। पहले जनसंघ और बाद की भारतीय जनता पार्टी के पास वैश्विक नजरिए से भारत के लिए कोई स्पष्ट आर्थिक नीति न थी और न है, क्योंकि जिस पूंजीवाद और साम्यवाद के तहत आज की दुनिया संचालित है, उसके बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का ज्ञान शून्य है। इसलिए जब उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने न चाहते हुए वही आर्थिक नीति अपनाई, जो नरसिंह राव के जमाने में थी।
बहरहाल, फिर मनमोहन सिंह की सरकार आई और तब तक हिंदुस्तान के अडानी-अंबानी सरीखे उद्यमियों को समझ में आ गया कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में वो कहीं नहीं खड़े हो पाएंगे।
यही वो प्रस्थान बिंदु बना, जहां से नरेंद्र मोदी की हैसियत बढ़नी शुरू हुई। तब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे और संघ का एजेंडा वहां लागू कर संघ के दुलारे भी हो चुके थे।
फिर वहीं गुजरात में अडानी, अंबानी सरीखे बनियों ने मिलकर तय किया कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाकर भारत के उद्योग जगत पर एकाधिकार स्थापित किया जाए। गुजरात में ही हुई समिट में इसका ऐलान अनिल अंबानी ने किया।
अटल बिहारी की सरकार में सत्ता का स्वाद चख चुका संघ भी फिर से सत्ता चाहता था, किसी भी कीमत पर। सो वहां से भी नरेंद्र मोदी की योजना को क्लीन चिट मिल गई।
इसके बाद जो हुआ, उसे बताने की जरूरत नहीं। पैसा अडानी-अंबानी जैसे बनियों का लगा, योजना और षड्यंत्र संघ के जिम्मे आया और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए।
अति सामान्य मेधा और व्यक्तित्व के मालिक नरेंद्र मोदी की दैत्य छवि गढ़ी गई और उसकी सहायता से मोदी ने देश को उन हाथों में दे दिया, जिन्होंने देश को लूटने के इरादे से नरेंद्र मोदी पर पैसा लगाया था।
देश में समानांतर रूप से चल रहे जाति-धर्म के अंधड़ में लोगों का ध्यान उस बर्बादी की ओर नहीं गया, जो धीरे-धीरे देश को अपने अंदर समाती जा रही थी। जब तक लोग चेते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। साथ में भय, भ्रम और साजिश का जो संजाल देश में था, उसकी वजह से देश को इस स्थिति से निकलने की कोई सार्थक पहल नहीं हो पा रही थी।
कई वजहों से वो सार्थक पहल काकरोच जनता पार्टी के युवाओं ने की। एकाएक पूरा देश उनके साथ आ गया और भय, भ्रम और साजिश से खड़ा किया गया भाजपा और संघ का ताना-बाना टूटने लगा।
अब ये लड़ाई कब तक जीती या हारी जाएगी, ये तो अभी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि लगभग सौ साल की तैयारी के बाद संघ और भाजपा सत्ता में आए हैं। इसलिए सत्ता बची रहे, इसके लिए वो हर संभव कोशिश करेंगे।
लेकिन इस बीच एक काम हो चुका है। मोदी के नेतृत्व में देश के संसाधन चंद क्रोनी कैपिटलिस्ट के हाथों में आ चुके हैं और संघ भी आगे की लंबी पारी खेलने के लिए जरूरत भर का धनी और शक्तिशाली हो चुका है।
इसलिए चाहे वो अडानी-अंबानी सरीखे बनिए हों या संघ, उनके लिए नरेंद्र मोदी अपना काम कर चुके हैं।
अब इस नजरिए से भी देखिए, नरेंद्र मोदी की प्रासंगिकता कब तक और कितनी देर तक बनी रहती है। आप लोग चाहें तो, वरना तमाम तरीके की थ्योरीज़ तो ऑलरेडी देश-विदेश में चल ही रही हैं।
(अनेहस शाश्वत जी लखनऊ में रहते हैं और कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर कार्य कर चुके हैं)


