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आज के अखबार : बेसमेंट खोदा तो ढह गई 36 साल पुरानी इमारत, भास्कर का शीर्षक बहुत कुछ कहता है

Hindi newspaper clipping with headline 'दिल्ली में साल 2025 से अब तक 6 बड़े हादसे' followed by six bullet points listing dates and summaries of major accidents in 2025.

शायद यह भी कि लोग शीर्षक लगाने में भी डरते हैं या फिर खबर लिखना ही नहीं आता है। अमर उजाला के अनुसार, 16 साल में जर्जर इमारतें 110 जिंदगियां निगल गईं। दिल्ली में तीन साल में 1133 इमारतें ढहीं। एक और खबर के अनुसार दिल्ली में स्नातक की 70 हजार सीटें हैं लेकिन हॉस्टल की क्षमता सिर्फ चार हजार की।

संजय कुमार सिंह

आज दिल्ली में बिल्डिंग गिरने से पांच और मध्य प्रदेश में जहरीली शराब पीने से 11 लोगों की मौत की खबर है। दोनों भ्रष्टाचार और अवैध पैसे कमाने, कानून का शासन न होने के उदाहरण हो सकते हैं। बिल्डिंग दिल्ली में गिरी इसलिए इसकी खबर को ज्यादा प्रमुखता मिली है लेकिन मध्य प्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब पीने से 11 लोगों की मौत हुई है तो यह भी शासन-प्रशासन की नालायकी हो सकती है। दिल्ली में तो बिल्डिंग गिरने का कारण पुरानी इमारत में बेसमेंट खोदना बताया गया है और जाहिर है कि यह अनुमति लेकर की गई हो या बिना अनुमति – गलत आकलन का मामला है। जांच के बाद ही पता चलेगा कि गलती किसकी है। रिश्वत की भूमिका है या नहीं और है तो कितनी-किसकी। लेकिन प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाली सरकार में ऐसी जानकारी मिलना लगभग नामुमकिन है।

दैनिक भास्कर में ही छपी एक और खबर के अनुसार, दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष, देवेन्द्र यादव ने कहा है कि (दिल्ली नगर) निगम ने एक महीने पहले इमारत को खतरनाक घोषित कर सील किया था। अखबार ने यह भी लिखा है कि एमसीडी अफसरों के पास सील करने का रिकार्ड नहीं है। जाहिर है, मामला सिर्फ हादसे का नहीं है। कुछ न कुछ भारी गड़बड़ है। 36 साल पुरानी बिल्डिंग में बेसमेंट खोदा जा रहा था तो यह भी खतरनाक है। ताज्जुब यह कि देश की राजधानी में डबल इंजन वाली सरकार की नाक के नीचे हो रहा था। खबरों से स्पष्ट है कि राहत और बचाव का काम भी धीरे चल रहा है। इसे ऐसे समझिए कि 55 वर्ग गज की पांच मंजिली इमारत के मलबे में कोई नहीं है, यह 12 घंटे बाद भी सुनिश्चित नहीं हो पाया था। डिजिटल इंडिया में यह पता नहीं है कि हादसे के वक्त बिल्डिंग में कितने लोग थे, कितने निकल गए, कितने निकाले गए औऱ कितनों के फंसे होने की आशंका है। कहा जा सकता है कि अखबारों में रिपोर्टिंग की हालत शिक्षा और परीक्षा की हालत से अलग नहीं है।

मध्य प्रदेश में जहरीली शराब पीने से 11 लोगों की मौत की खबर द हिन्दू में सेकेंड लीड है और लीड के बराबर तीन कॉलम में छपी है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है – भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश में सैन्य बातचीत हुई। ब्रिक्स समिट से पहले कोर कमांडर स्तर की यह बैठक हुई है। उम्मीद की जाती है कि इसमें चीनी राष्ट्रपति शामिल होंगे। यह बातचीत एलएसी पर सैन्य तैनाती से संबंधित चिंताओं के बीच हुई। आज मेरे 10 में से आठ अखबारों में दिल्ली में बिल्डिंग गिरने की खबर लीड है। द हिन्दू के साथ द टेलीग्राफ ने भी अरुणाचल प्रदेश में सीमा को लेकर सैन्य वार्ता की खबर को लीड बनाया है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार दिल्ली में जो बिल्डिंग गिरी है उसके मलबे में 40 लोग फंसे हुए हैं। अखबार ने इसे दिल्ली का बॉयज हॉस्टल ही लिखा है।

कहने की जरूरत नहीं है कि देश भर में शिक्षा की अनुकूल व्यवस्था नहीं होने के कारण बहुत सारे बच्चे दिल्ली में पढ़ते हैं और इनके लिए हॉस्टल की ढंग की व्यवस्था नहीं है। और बात इतनी ही नहीं है, बहुत सारे कोचिंग संस्थान महंगे पर खतरनाक इमारतों में रहते हैं। इनमें भी हादसे हुए हैं पर सरकार ने कोई व्यवस्था नहीं की है। इन हादसों में मुझे राजेन्द्र नगर के एक कोचिंग इंस्टीट्यूट की लाइब्रेरी में पानी भरने से बच्चों की मौत और उसके बाद का हंगामा याद है। तब यह मुद्दा भी उठा था कि कोचिंग के लिए शाम के समय बंद रहने वाले स्कूल कॉलेज की बिल्डिंग क्यों नहीं उपलब्ध कराई जा सकती है। हादसे के बाद बात आगे बढ़ने की कोई खबर नहीं है। आज अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, जिन्दगी बनाने आए थे बच्चे…भ्रष्टाचार के मलबे में दब गए।  

आज के अखबारों में दैनिक भास्कर की लीड का शीर्षक देखने के बाद मुझे सारे शीर्षक कामचलाऊ लग रहे हैं। मुख्य शीर्षक इस प्रकार है – 36 साल पुरानी इमारत में तीन मंजिलें अवैध थीं, बेसमेंट खोदा तो ढह गईं। नवोदय टाइम्स ने तीन बुलेट प्वाइंट हाईलाइट किए हैं। इनमें एक बुलेट है – बेसमेंट में चल रहा था मरम्मत का कार्य। बेसमेंट खोदना और बेसमेंट में मरम्मत का काम करना बहुत अलग है। जो भी हो, यह रिपोर्टिंग की समस्या के साथ सच बताने के डर या सरकार के प्रति सेवा भावना के कारण भी हो सकता है। जहां तक देश में छात्रों की स्थिति का सवाल है, राहुल गांधी ने कहा है – देश में भाजपा सरकार से हर छात्र त्रस्त। यह खबर देशबन्धु में छपी है और इसका फ्लैग शीर्षक है, महाराष्ट्र में छात्रों के आंदोलन पर बोले राहुल।

अंग्रेजी अखबारों में दि एशियन एज में यह खबर लीड है, इस खबर के अनुसार, दिल्ली में पीजी (बिल्डिंग) ढहने से 5 छात्रों की मौत। चार की हालत गंभीर, कई फंसे हुए हैं, मालिक फरार, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ने शोक जताया। अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स की मुख्य खबर के साथ चार और इंडियन एक्सप्रेस की मुख्य खबर के साथ पांच लोगों की बाईलाइन है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर टाइम्स न्यूज नेटवर्क के हवाले से है। तीनों की खबर मोटे तौर पर पांच लोगों की मौत और कइयों के फंसे होने की है। मलबे के नीचे से वीडियो कॉल की खबर भी है लेकिन यह पता नहीं चला कि उसे बताया जा सका या नहीं।

दैनिक भास्कर ने स्क्रीन शॉट के साथ लिखा है, एआरएसडी कॉलेज के छात्र आदित्य मलबे में फंसे। वंहा से वीडियो बनाकर कॉलेज के छात्र समूह में भेजा आदित्य बिहार के हैं। वीडियो में वे संकरी जगह में दबे दिखे। चेहरे पर घूल है। माथे के पास से खून बह रहा है। बचाव दल उनतक नहीं पहुंचा था। दैनिक भास्कर की एक और खबर का शीर्षक है, मलबे में दबे… लोग फोन कर मदद मांग रहे। हर कमरे में 2-3 छात्र, मालिक को बस किराया लेने से मतलब। आप समझ सकते हैं कि 12 साल में सुरक्षित किए गए हिन्दुओं की क्या स्थिति है। भ्रष्टाचार का पता इसी से चलता है कि गुजरात आधार वाली चार अनाम सी पार्टियों को गुजरात में पंजीकृत कुछ गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (आरयूपीपी) को सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये का चंदा मिलने की खबर सुर्खियों में है।

हैरान करने वाली बात यह है कि जिन राजनीतिक दलों के पास न तो कोई बड़ा जमीनी आधार है, न सक्रिय संगठन, और जिनके दफ़्तर रिहायशी फ्लैटों या बंद पड़े कमरों में चलते हैं, उनकी तिजोरियाँ देश की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों से भी ज्यादा तेजी से भर रही हैं। 2024 के आम चुनावों में महज़ गिनती के उम्मीदवार उतारने वाली इन पार्टियों के खातों में करोड़ों रुपये का लेन-देन आखिरकार किस राजनीतिक गतिविधि के लिए हो रहा है?

बीबीसी की फॉलोअप रिपोर्ट से यह साफ़ संकेत मिलता है कि इन गुमनाम पार्टियों के नाम पर मिलने वाला चंदा टैक्स छूट, मनी लॉन्ड्रिंग और ब्लैक मनी को सफ़ेद करने का एक सुरक्षित ज़रिया भी हो सकता है। लेकिन इसकी जांच की कोई चर्चा या मांग भी नहीं है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री होम्योपैथी गोली खिलाने की बात कर रहे हैं और उनके बॉस ने कहा है, असर एलोपैथी वाली हाई एंटीबायोटिक जैसा हुआ। यह ना खाउंगा ना खाने दूंगा के 56 ईंची बड़बोलेपन का विकास है।    

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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