संजय कुमार सिंह-
अब टाटा संस निशाने पर?
जब मामला सैकड़ों करोड़ का है तो कौन किसके लिए बैटिंग करेगा और कौन किसकी रिपोर्ट करेगा – समझा जा सकता है। लेकिन इस खेल में टाटा समूह को तो नुकसान हो ही रहा है अगर कुछ संभल नहीं पाया तो हजारों-लाखों लोगों का जीवन प्रभावित होगा। मेरा सवाल है कि जबरदस्ती की छेड़-छाड़ क्यों? जैसे चल रहा था वैसे चलने देने में क्या दिक्कत है? हजार-1200 शब्दों के तर्क और कुतर्क अखबारों के लिए कुछ हजार रुपए में लिखवाए जाते हैं और ऐसी खबरों से शेयर बाजार में कोई भी कंपनी पिट सकती है। फिर भी सब होता रहता है। अब बारी टाटा संस की है।
अगर मोदी सरकार सब अच्छा ही कर रही है तो नोटबंदी, जीएसटी से लेकर एफसीआरए कानून तक में सख्ती और शेल कंपनियों पर पाबंदी का क्या लाभ हुआ और नहीं हुआ तो इतनी शर्म क्यों नहीं है कि एक ठीक-ठाक समूह को चैन से काम करने दिया जाए। खास कर तब जब उत्तराधिकार का मामला पहले से है और अच्छा-खासा नुकसान कर सकता है। आज छपी खबरों के अनुसार, टाटा संस में 18.4 प्रतिशत शेयर वाले शपूरजी पलोनजी समूह ने इसकी लिस्टिंग का समर्थन किया है और कहा है कि यह सामाजिक और नैतिक रूप से जरूरी है। (टाइम्स ऑफ इंडिया)।
टाटा संस के एन चंद्रशेखर के लिए शेयर होल्डिंग का गणित ऐसा है कि उनके लिए अपना निदेशक का पद बचाना मुश्किल हो सकता है (हिन्दुस्तान टाइम्स)।
लिस्टिंग पर ऊहापोह… टाटा के शेयरों में 11% की गिरावट। (अमर उजाला)
यह सब तब जब नोएल टाटा ने स्पष्ट किया है कि टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग टाटा समूह के मूल सिद्धांतों और उसकी प्रकृति के खिलाफ है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यापारिक मुनाफे के बजाय समाज कल्याण और लंबी अवधि के निवेश को बढ़ावा देना है, इसलिए इसे सार्वजनिक रूप से लिस्ट करना इसके मूल चरित्र के अनुकूल नहीं है।
इस फैसले और विचार का सम्मान किए बगैर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का क्या होगा? अमर उजाला में यह भी छपा है कि लिस्टिंग की वकालत करने वाले शपूरजी पलोनजी समूह के चेयरमैन ने प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा की थी। मुझे लगता है कि यह प्रधानमंत्री की इच्छा या पसंद का मुद्दा है। चूंकि मामला देश के बड़े समूह, मुनाफे आदि से जुड़ा है इसलिए तमाम लोग बल्लेबाजी करेंगे और डर है कि इसका नुकसान समूह को और फिर कर्मचारियों के साथ आम निवेशकों को होगा।
दैनिक भास्कर में कल छपा था, टाटा संस में टाटा परिवार की ही नहीं चली। इसे सरकार की घोषणा, और उद्योग धंधे के मामले में देश की स्थिति के साथ देखेंगे तो यह ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का सच भी लगता है। दैनिक भास्कर का मुख्य शीर्षक है, नोएल का वीटो खारिज, चंद्रशेखर अपने ही वोट से चेयरमैन। इसके साथ एक खबर है, एक महीने में पूरा मामला ऐसा पलटा। इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है, टाटा में चंद्रशेखरन इसलिए अहम।
यहां उल्लेखनीय है कि जनवरी 2022 में एयर इंडिया के अधिग्रहण के बाद, टाटा समूह ने इल्कर आयसी को एयर इंडिया का मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक नियुक्त करने की घोषणा की थी। इल्कर आयसी तुर्की एयरलाइंस के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच ने इल्कर आयसी की नियुक्ति पर कड़ा ऐतराज जताया था और सरकार से राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में उन्हें सुरक्षा मंजूरी न देने की मांग की थी। अंततः वही हुआ। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के बावजूद।


