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सुख-दुख

ज्ञानेश कुमार को कवर फायर देने के लिए दर्जनों पत्रकार एक्टिव हो गए हैं, रितिका चोपड़ा को हर सच्चा पत्रकार दे रहा बधाई!

अजीत अंजुम-

ज्ञानेश कुमार को कवर फायर देने के लिए दर्जनों पत्रकार एक्टिव हो गए हैं . सूत्रों के कंधे पर बंदूक़ रखकर चलाने में जुटे हैं . इन्हें ड्यूटी दी गई कि है कि दोनों इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे को झूठा साबित करें . ज्ञानेश कुमार की मनमानी पर आपत्ति जताने वाले दोनों चुनाव आयुक्तों को झूठा साबित करें . चुनाव आयोग से इन्हें गुप्त मैसेज आ रहे हैं . ये सब आँख मूंदकर पूरे भक्ति भाव से ज्ञानेश ही सत्य है . बाकी सब मिथ्या है , ये नैरेटिव बनाने में लग गए हैं . चुनाव आयोग को अपनी बपौती समझकर चला रहे ज्ञानेश कुमार की पोल इस बार उनके ही सहयोगी चुनाव आयुक्तों ने खोली है . सूत्रों की दाल नहीं गलने वाली है .

यशवंत सिंह-

आज ये महिला पत्रकार चर्चा में हैं। रितिका चोपड़ा। इंडियन एक्सप्रेस में इन्होंने आज बीजेपी के रिश्तेदार ज्ञानेश कुमार की करतूतों का भंडाफोड़ कर दिया है। ‘केंचुआ’ को मोदी शाह की प्राइवेट जेबी संस्था बना देने का जो महान काम हुआ है, उसका नतीजा ये है कि अब सिर्फ और सिर्फ बीजेपी को लाभ पहुँचाने वाली मशीन बन गया है केंद्रीय चुनाव आयोग उर्फ़ केंचुआ!

Smiling woman in a green sleeveless top leaning on a blue-and-white railing of a courtyard balcony, with arches and a staircase in the background.

रितिका चोपड़ा ने ऐसी सटीक स्टोरी की है कि केंचुआ के लिए खंडन करने का भी स्पेस नहीं छोड़ा है। तस्वीर रितिका जी की सोशल मीडिया अकाउंट से साभार। अंधभक्तों से अनुरोध है प्लीज़ इस तस्वीर में कपड़ा वपड़ा पहनने पर निशाना साधते हुए संस्कार सनातन आदि का ज्ञान देते हुए ट्रोलिंग शुरू कर दें क्योंकि फूफा ज्ञानेश केंचुआ की भारी बेइज्जती को किसी हाल में सहा नहीं जाना चाहिए।

Three women on stage during an award ceremony; an older woman hands a certificate to a smiling young woman while another woman watches.
2017 का लाडली मीडिया अवॉर्ड लेतीं रितिका चोपड़ा

रितिका चोपड़ा : वो पत्रकार जिसकी EC रिपोर्ट पर आयोग चुप रह गया

इंडियन एक्सप्रेस की मुंबई रेजिडेंट एडिटर रितिका चोपड़ा की ताजा जांच रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के अंदरूनी मतभेद को सार्वजनिक बहस का केंद्र बना दिया है। करीब 19 साल के करियर में यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने चुनाव आयोग जैसी संस्था की दीवार के पीछे झांकने की कोशिश की हो। 
सुमित अवस्थी, रवीश कुमार, अजीत अंजुम जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने भी उनकी रिपोर्ट की तारीफ की, क्योंकि आयोग के प्रेस नोट ने कहानी को गलत नहीं ठहराया।

रितिका का जन्म और शुरुआती शिक्षा कोलकाता में हुई। कलकत्ता गर्ल्स हाई स्कूल के बाद उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज (ऑटोनॉमस), कोलकाता से मास कम्युनिकेशन में स्नातक किया (2003–2006)। 

करियर की सीढ़ियां:

  • 2006–2010: सीनियर रिपोर्टर, हिंदुस्तान टाइम्स
  • 2010–2013: प्रिंसिपल करस्पॉन्डेंट, मेल टुडे (इंडिया टुडे ग्रुप)
  • 2013–2015: स्पेशल करस्पॉन्डेंट, द इकोनॉमिक टाइम्स
  • 2015 से: द इंडियन एक्सप्रेस — सीनियर असिस्टेंट एडिटर से नेशनल एजुकेशन एडिटर, फिर नेशनल ब्यूरो चीफ (गवर्नमेंट)
  • 2026 से: रेजिडेंट एडिटर, मुंबई, द इंडियन एक्सप्रेस
    अप्रैल 2026 के एक पोस्ट में उन्होंने खुद लिखा था कि मुंबई नई शहर, नई टीम थी, लेकिन ब्यूरो ने भरोसा दिया और काम ठोस निकला।

बीट: शिक्षा, नीति और चुनाव आयोग

रितिका की पहचान दो क्षेत्रों से जुड़ी है — शिक्षा नीति और चुनावी संस्थाएं। एनसीईआरटी की किताबों में इतिहास संशोधन, नीट पेपर लीक, इंजीनियरिंग डिग्री की गुणवत्ता (“Devalued Degree” सीरीज) जैसी रिपोर्ट्स उनके खाते में हैं। एक रिपोर्ट के बाद शिक्षा मंत्रालय ने एनसीईआरटी से स्पष्टीकरण तक मांगा था।

चुनाव आयोग उनकी लंबी बीट है। 2019 लोकसभा चुनाव में आयोग के अंदरूनी मतभेद और आचार संहिता के मामलों में देरी पर उनकी रिपोर्ट्स ने हलचल मचाई थी। उसी काम पर उन्हें आईपीआई-इंडिया अवॉर्ड मिला। 2021 के रामनाथ गोयनका अवॉर्ड में भी चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर उनकी सीरीज को जगह मिली। 

23 सितंबर 2026 की जांच उसी लाइन की अगली कड़ी है — दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियां, ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर का केंद्रीकरण, फॉर्म-6 में बदलाव और गोवा में 97 पात्र वोटरों का नाम न चढ़ पाना।

पुरस्कार
लाडली अवॉर्ड समारोह में रितिका चोपड़ा (2017):

मुख्य सम्मान:

  • चमेली देवी जैन अवॉर्ड 2024 — शिक्षा, सरकारी नीति और स्वतंत्र संस्थाओं पर जांच रिपोर्ट के लिए; ग्रीष्मा कुठार के साथ संयुक्त। भारत में महिलाओं के लिए सबसे पुराने मीडिया पुरस्कारों में से एक।
  • रामनाथ गोयनका अवॉर्ड 2021 — चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज पर सीरीज
  • आईपीआई-इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म 2020 — 2019 लोकसभा के दौरान आयोग की रिपोर्टिंग
  • यूएनएफपीए-लाडली मीडिया अवॉर्ड — हरियाणा पंचायत चुनाव में निरक्षर उम्मीदवारों पर सुप्रीम कोर्ट फैसले के असर की खबर
  • एसीजे इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म अवॉर्ड में विशेष उल्लेख — इंजीनियरिंग शिक्षा पर सीरीज
  • इकोनॉमिक टाइम्स वर्डस्मिथ अवॉर्ड (2014, 2015)
  • ग्लोबल फ्री मीडिया इंडिया अवॉर्ड 2020 (एक्स बायो में उल्लेख)

क्यों चर्चा में हैं

रितिका की ताकत दस्तावेज और संस्था के अंदरूनी कागजात से कहानी निकालने में है। आईपीआई को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि संस्थाएं पारदर्शी नहीं बनाई जातीं, इसलिए पत्रकार का काम अंदर झांकना है। “शू-लेदर रिपोर्टिंग की जगह कोई नहीं ले सकता।” 

आज वही शैली चुनाव आयोग की नवीनतम जांच में दिखती है। आयोग ने प्रेस नोट में आंतरिक नोट्स को “सामान्य प्रक्रिया” बताया, लेकिन रिपोर्ट के मुख्य तथ्यों — 14 आपत्तियों की तारीखें, फॉर्म-6, सॉफ्टवेयर नियंत्रण — से सीधा इनकार नहीं किया। हिंदी टीवी के सुमित अवस्थी ने इसी बात को “सही खबर की ताकत” कहा। #ritikachopra

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