
हेमंत शर्मा-
राय साहब जिनमें कभी कोई साहिबी नहीं रही.
‘अस्सी के राय साहब’ पुस्तक का लोकार्पण शुक्रवार को दिल्ली के अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में संपन्न हुआ. अग्रजश्रेष्ठ और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के व्यक्तित्व और कृतित्व के जरिए पत्रकारिता और राजनीति का इतिहास बताती इस किताब का विमोचन रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने किया. पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव भी इस मौके पर अतिथि थे. अध्यक्षता जाने माने संपादक बनवारी जी ने की और कार्यक्रम का संचालन प्रभात ने. इस मौके पर बड़ी संख्या में राय साहब के प्रशंसक मौजूद थे. चिंतक विचारक गोविंदाचार्य जी, अयोध्या से पधारे आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण,
ब्रजेश पाठक, उपमुख्यमंत्री-उत्तर प्रदेश. मंत्री अनिल राजभर, दयाशंकर दयालू, जयपुर से आए राजस्थान पत्रिका के स्वामी संपादक गुलाब कोठारी, पत्रकार नीरजा चौधरी, हरीश खरे,पद्मश्री सोमा घोष,पद्मश्री अशोक भगत, पद्मभूषण नृपेन्द्र मिश्र, महेश चंद्र शर्मा जी जैसे कितने ही लोग देश के कोने-कोने से इस कार्यक्रम में आए. उन सभी का आभार.


कार्यक्रम की उपलब्धि सभी पुराने जनसताईयो का जमावड़ा था. उनसे मेल मिलाप मेरी उपलब्धि थी. ओम थानवी, कुमार आनंद, देवप्रिय अवस्थी, राजेश जोशी, अनंत मित्तल, ब्रजेंद्र पांडे, आर्येंद्र उपाध्याय ओमप्रकाश, कुमार संजय सिंह, प्रदीप श्रीवास्तव शंभूनाथ शुक्ल, मनोज चतुर्वेदी, नीलम गुप्ता, प्रेमाशुं शेखर, श्याम लाल यादव, प्रताप सोमवंशी, सुनील पाण्डेय आदि मौजूद रहे.
यह किताब राय साहब के जीवन के आठ दशकों की कहानी है. लगभग सवा सौ लेख इस पुस्तक का हिस्सा हैं. और ये लेख राय साहब के साथ समाज के अलग-अलग हिस्सों का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों का अनुभव बयान करते हैं. किताब प्रभात प्रकाशन से छपी है. पत्रकारिता, राजनीति और समाज के ६५ वर्षों का इतिहास बयान करती यह पुस्तक संग्रहणीय और पढ़ने योग्य है. इसे मौक़ा मिलते ही पढ़ें. कार्यक्रम की कुछ झलकियां और इस पुस्तक में छपा अपना संपादकीय आप सब से साझा कर रहा हूं. देखें और पढ़ें.
जरूरी क्यों है यह किताब
यह किताब क्यों? कई मित्रों का सवाल है. राम बहादुर राय में ऐसा क्या है कि उनके योगदान पर सौ विद्वान अपनी राय रखें. संपादक और पत्रकार तो बहुतेरे हुए. फिर उन पर क्यों नहीं? अस्सी बरस के तो कई और संपादक हैं. फिर राय साहब में ऐसा क्या है? कौन-सा सुर्खाब का पर है? ख़ुद राय साहब का सवाल भी यही है. अंदर भी और हमसे भी. मुझपर किताब क्यों. राय साहब पर किताब का अगर कोई सबसे असहमत चेहरा होगा, तो वो ख़ुद राय साहब होंगे. तो मित्रों, राय साहब पर लिखना इसलिए जरूरी है कि उनका कोई निजी जीवन नहीं है. जो कुछ है वह सार्वजनिक है. उनका जीवन 70 के बाद की राजनीति का इतिहास है. जन आंदोलनों का दस्तावेज है. यह राष्ट्रवादी राजनीति के गर्भ से निकले एक ऐसे नेता/पत्रकार के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय है, जिसके विचारों में ‘गांधी’ का ‘हिंदी स्वराज’, ‘लोहिया’ की ‘सप्त क्रांति, ‘जेपी’ की ‘संपूर्ण क्रांति, ‘अम्बेडकर’ का ‘जातिमुक्त भारत, ‘दीनदयाल उपाध्याय’ का ‘अंतिम आदमी’ और ‘आचार्य कृपलानी’ के ‘गांधीवादी समाजवाद’ के सूत्रों की विरासत है. जिसके व्यक्तित्व में तमाम विरुद्धों का सामंजस्य है. वे जिस विचार के विरोधी हैं उसे भी बहस में लाने की कोशिश करते हैं. उनके लेखन में सावरकर के ‘राष्ट्रवाद’ पर गांधी का ‘हिंद स्वराज’ भारी पड़ता है. इन सभी विचारधाराओं से जो थोड़ा-थोड़ा नवनीत निकलता है, उससे एक ‘राम बहादुर राय’ बनते हैं. उनका प्रेरक और प्रोत्साहक व्यक्तित्व समकालीन हिन्दी पत्रकारिता का ‘लाइट हाउस’ है.
राय साहब पर किताब इसलिए ज़रूरी है क्योंकि राय साहब आज की पत्रकारिता और तमाम पत्रकारों को शर्मिंदा करते हैं. वे सत्ता में रहते हुए भी सत्ता की मैगिनेटिक फील्ड से बाहर हैं. वे तमाम प्रभावशाली लोगों, अवसरों और आमंत्रणों के बावजूद एक सुचिता, दूरी और निश्चेष्टता बनाए रखने का व्रत-सामर्थ्य रखते हैं. एक शिवलिंग की तरह वो अपने ऊपर कोई भी रंग राग चढ़़ने नहीं देते. उनको बहुत अच्छे से पता हैं अपनी सीमाएं, इच्छाएं और इनके अतिक्रमण को रोकने का तरीका भी. सादगी, शराफ़त और संघर्ष के बारे में बड़े से बड़े लोगों के विचार और व्यवहार में फर्क मिल जाता है, राय साहब के पास ये दोनों एक ही हैं. किसी भी पत्रकार या राजनीतिक व्यक्ति के जो स्वाभाविक मोह हैं, राय साहब उस मायामंडल से मुक्त हैं. ये व्यक्तित्व राय साहब को हमारे समय की धरोहर बनाता है.
जब राजनीति और पत्रकारिता व्यक्ति केंद्रित और एकतरफा हैं, ऐसे दौर में राय साहब संवादी पत्रकार हैं. आज संवाद पर सबसे बड़ा संकट है. समाज में उसकी गुंजाइश कम होती जा रही है. संवाद को विवाद के पीछे धकेल दिया गया है. ऐसे में राम बहादुर राय ने बुनियादी मुद्दों पर समय से संवाद किया है. वह संवाद जिसमें बोलना कम, सुनना ज्यादा हो. अगर बोले तो उसमें उत्तेजना के तत्व कम विवेक की गहराई ज्यादा हो. संवाद की इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने तीन किताबें, “रहबरी के सवाल”, “मंजिल से ज्यादा सफर” और “भारतीय संविधान: अनकही कहानी” लिख दी. जो भारत के समाज, इतिहास और राजनीति का प्रामाणिक इतिहास हैं. संवाद की परम्परा ही हमारी सनातन परम्परा है. इसलिए राय साहब संघर्ष में भी प्रतिपक्षी से संवाद जारी रखते हैं.
राम बहादुर राय पर किताब इसलिए भी जरूरी है कि वह पत्रकारिता के ‘प्रभाष परम्परा’ के वारिस हैं. वे राजनीति की किसी एक धारा से बंधे नहीं हैं. उनके विचार नहीं आचरण सिखाते हैं. विचार और सरोकार को वे अपने व्यवहार में साकार करते हैं. वे सत्ता में ‘राज’ नहीं ‘नीति’ की तलाश में रहते हैं. उनमें वैचारिक संकीर्णता नहीं है. राष्ट्रवाद से लेकर साम्यवाद और समाजवाद तक सभी का अद्भुत समन्वय है. उनकी टोली में कार्ड होल्डर नक्सली भी रहते रहे. इसलिए उनकी स्वीकार्यता परस्पर विरोधी खेमों में भी गजब की है. अपनी प्रतिबद्धताओं के प्रति सचेत रहते हुए विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों के साथ बेहतर रिश्ता बनाए रखना उनका हुनर है. ईर्ष्या से उनका वही संबंध है जो मलेरिया से ‘कुनैन’ का. चंद्रशेखर, वीपी सिंह, चितरंजन सिंह और संघ राजनीति के चार छोर हैं. राय साहब सबके प्रिय रहे.
लंदन में मार्क्स की कब्र पर बोलते हुए कभी उनके प्रिय मित्र फ्रेडरिक एंगेल्स ने कहा था, “तमाम पीड़ा और पीड़ादायकों की आलोचना को यूं तो मार्क्स अनदेखा करते थे. जवाब तभी देते थे जब बहुत जरूरी हो. उनकी जिंदगी में उनके हजारों विरोधी थे पर शत्रु एक भी नहीं था.” राय साहब से भी आपको असहमत लोग मिलेंगे. पर उनका शत्रु कोई नहीं मिलेगा. असहमति भी उनसे नहीं होगी. उनके साथ रहने वाली ‘शिव की बारात’ से होगी. जिसमें ढेर सारे अवांछित लोग होते हैं. जो राय साहब को घेरे रहते हैं. पर “चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग”.
राम बहादुर राय पर यह किताब इसलिए भी जरूरी है कि उनके बारे में कम कहा और लिखा गया है. वह खुद कुछ बताते नहीं. अपने होने को जताते नहीं. जीवन में खुद कुछ पाने का कभी प्रयास नहीं किया. राजनीति में जगह बनाई लेकिन पत्रकारिता में मन रमा लिया. उनकी पेशेवर पत्रकारिता हम सबके लिए मिसाल ही नहीं ‘मशाल’ भी है. पद्म सम्मान के प्रति उनकी निस्पृहता इसका उदाहरण है. राय साहब सम्मानित होने के लिए राष्ट्रपति भवन नहीं गए. हर बार सम्मान चलकर उनके पास आया. राय साहब फोटोग्राफिक समृति के वाहक, अनंत जिज्ञासु, निरभिमानी, सर्वसमावेशी, जन आंदोलनों के पोषक और सच के साथी हैं. राजनीति, समाजशास्त्र, संविधान, संचार, पत्रकारिता और भारतबोध पर उनका अध्ययन बेमिसाल है. ऐसे में राय साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आप विचार कर समकालीन राजनीति और समाज को समझ सकते हैं. उनके बहाने किया गया यह विमर्श इस कालखंड का ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक विमर्श होगा. जिसे जानने के लिए राय साहब को जानना जरूरी होगा. अपने प्रति उदासीनता का आलम यह है कि राय साहब इस किताब के विचार के ही खिलाफ थे. बार-बार कहने के बावजूद उन्होंने किताब के कवर के लिए फोटो नहीं खिंचवाई.
मनुष्य को समझने के दो तरीके होते हैं. पहला- उसकी उपलब्धियों की सूची बनाकर. दूसरा- उसके प्रभाव को समझकर. पहला काम इतिहास करता है और दूसरा स्मृति. इतिहास आपको बता देगा कि किसी व्यक्ति ने क्या किया? कहाँ रहा? किन पदों पर रहा? कौन-सी पुस्तकें लिखीं? लेकिन स्मृति यह बताती है कि उस व्यक्ति की उपस्थिति ने दूसरों के जीवन में क्या बदला. रामबहादुर राय के बारे में लिखते हुए मुझे हमेशा लगता है कि उन्हें उपलब्धियों की सूची में समेटना उनके साथ अन्याय होगा. क्योंकि कुछ लोग अपने काम से बड़े होते हैं, कुछ अपने विचारों से, और कुछ अपने व्यक्तित्व से. वे धीरे-धीरे एक मूल्य में बदल जाते हैं, एक परम्परा में बदल जाते हैं. एक नैतिक संदर्भ में बदल जाते हैं. मैं राय साहब को इसी श्रेणी में रखता हूँ.
भारतीय परंपरा में एक शब्द है- ‘ऋषि’. ऋषि सिर्फ धार्मिक परिधि से बंधा शब्द नहीं है. कबीर संत हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य को किसी संस्था का बंधक नहीं बनने दिया. नानक संत हैं, क्योंकि उन्होंने मनुष्य को उसके मूल रूप में देखने का साहस किया. महात्मा गांधी को भी इसी अर्थ में संत कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने राजनीति को नैतिकता से जोड़ने का प्रयास किया. ऋषि वह है जो अपने समय को देख सके, लेकिन उसकी धूल से अपनी दृष्टि को धुँधला न होने दे. जो समाज के बीच रहे, लेकिन समाज की क्षणिक उत्तेजनाओं से संचालित न हो. जो सत्ता को समझे, लेकिन उससे मोहित न हो. पत्रकारिता की भी अपनी एक ऋषि-परम्परा पं. बाबूराव विष्णु पराड़कर से शुरू होती है. ऐसे पत्रकार, जो समाचारों के व्यापारी नहीं थे; जो घटनाओं के पीछे छिपे हुए नैतिक प्रश्नों को पहचानते थे. जिनके लिए पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, लोकधर्म थी. राम बहादुर राय उसी ऋषि-परम्परा के प्रतिनिधि हैं. राय साहब इसी संत परम्परा के साधक हैं. आप इस नैतिकता का पालन करने वाले भावी पत्रकारों को राय साहब की परम्परा का वाहक मान सकते हैं.
राम बहादुर राय की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि उन्होंने क्या लिखा? उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने जीवन को कैसे जिया. आज के समय में जब ज्ञान अक्सर प्रदर्शन बन जाता है, तब रामबहादुर राय को देखकर लगता है कि ज्ञान का एक दूसरा रूप भी है- जो विनम्र बनाता है. उनसे मिलने वाला व्यक्ति पहले उनके ज्ञान से नहीं, उनकी सहजता से प्रभावित होता है. और यह कोई साधारण बात नहीं है. सहज होना जीवन की सबसे कठिन साधनाओं में से एक है. बच्चा सहज होता है क्योंकि वह दुनिया को नहीं जानता. ज्ञानी सहज होता है क्योंकि वह दुनिया को जान चुका होता है. इन दोनों के बीच का पूरा जीवन मनुष्य को असहज बनाने में बीतता है. महान यहूदी दार्शनिक मार्टिन बूबेर ने कहा था कि मनुष्य का सबसे बड़ा द्वंद है.“ मैं और तुम” का संबंध है. जहाँ सामने वाला व्यक्ति वस्तु नहीं, व्यक्ति बना रहता है. हम पदों से भर जाते हैं, परिचयों से भर जाते हैं, उपलब्धियों से भर जाते हैं. धीरे-धीरे हमारे भीतर का मनुष्य पीछे छूट जाता है. रामबहादुर राय को देखकर लगता है कि उन्होंने अपने भीतर के मनुष्य को बचाकर रखा.
चालिस बरस के अपने पत्रकारीय जीवन में मैंने अनेक संपादकों को देखा है. कुछ अपने ज्ञान से प्रभावित करते हैं. कुछ अपने अधिकार से. कुछ अपनी कठोरता से. लेकिन रामबहादुर राय का प्रभाव एकदम अलग है. वे आपको स्वतंत्र कर देते हैं. यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन उनके व्यक्तित्व का सबसे गहरा प्रभाव यही है. उनके साथ काम करते हुए कई बार लगता था कि न्यूजरूम में अनुशासन कम है और स्वतंत्रता अधिक. एक ‘डेमोक्रेटिक न्यूजरूम’ जिसमें कभी-कभी स्वतंत्रता अराजकता जैसी दिखाई देती थी. लेकिन बाद में समझ में आता है कि सृजनता और अराजकता का संबंध पुराना है. ब्रह्मांड भी व्यवस्था से नहीं, विस्फोट से बना था. बीज भी अनुशासन से नहीं, फटने से वृक्ष बनता है. हर नई खोज पहले स्थापित व्यवस्था को थोड़ा-सा अस्थिर करती है. राय साहब अपने सहयोगियों को वही अस्थिर होने की अनुमति देते थे. वे केवल काम करने की आज़ादी नहीं देते थे, गलती करने की भी आज़ादी देते थे. और किसी पत्रकार के लिए इससे बड़ा उपहार कोई नहीं हो सकता. अयोध्या विवाद पर मेरी किसी रिपोर्ट से राय साहब सहमत नहीं थे. मुझे फोन किया “आपकी रिपोर्ट देखी. संघ की सोच इस मामले में अलग है. आप सुधार सकते हैं.” मैंने कहा राय साहब मेरी सूचना तो यही है. “जी ठीक रहेगा. हम आपकी सूचना पर चलते हैं.” यह थी रिपोर्टर को दी जाने वाली संपादकीय आजादी. राय साहब न्यूज सर्विस के संपादक थे. मुझे बिना बताए खबर को एडिट कर सकते थे. पर यही तो राय साहब हैं.
मैंने स्वयं उस स्वतंत्रता को महसूस किया है. मैंने अपने साथियों को भी उस स्वतंत्रता में विकसित होते देखा है. ऐसे क्षण आए जब हम सफल हुए, ऐसे भी जब हम असफल हुए. लेकिन यह भरोसा कभी नहीं टूटा कि विचार रखने का अधिकार सुरक्षित है. पत्रकारिता में यह विश्वास उतना ही महत्वपूर्ण है जितना लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता. शायद यही कारण है कि उनके आसपास काम करने वाले लोग केवल बेहतर पत्रकार नहीं बनते, स्वतंत्र इंसान भी बनते हैं.
वे कटुता और संघर्ष के इस दौर में भी हमेशा प्रतिपक्षी से संवाद जारी रखने के हिमायती रहे. व्यक्ति केंद्रित राजनीति की बजाय विचार केंद्रित सार्वजनिक विमर्श के लिए वह प्रयासरत रहते हैं. इसलिए राय साहब सबके हैं. उनसे सहमत और असहमत, सब उनका सम्मान करते हैं. राय साहब भी अक्सर ईर्ष्या का गरल कंठ में रख लेते हैं. गांठ नहीं बांधते. जनसत्ता के दो संपादक ऐसे हुए जिनसे राय साहब की कई मुद्दों पर नहीं पटी. पटना-पटाना क्या होता है? उन्होंने राय साहब की खबरें रोकीं. जनसत्ता में ऐसा पहली दफा हुआ. पर राय साहब को कोई मलाल नहीं था. प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा से राम बहादुर राय का इंटरव्यू इसलिए संपादक राहुल देव ने रोक दिया कि संपादक की जानकारी के बिना यह इंटरव्यू हुआ कैसे? प्रधानमंत्री का यह इंटरव्यू कभी छपा नहीं. पर राय साहब ने इसे मुद्दा नहीं बनाया. राहुल देव से उनके संबंध वैसे ही सहज रहे. बाद में संपादक अच्युतानंद मिश्र हुए. राय साहब ने सुषमा स्वराज पर एक खबर लिखी. खबर यह थी कि रोमेश शर्मा नाम का एक नटवरलाल था. जिसे राजनीति का चस्का लगा. उस दौर में एक हेलीकॉप्टर खरीद, उससे दौरे शुरू किए. राजनैतिक दल बनाया. इस राजनैतिक दल के पीछे सुषमा जी थी. ऐसी खबर थी. सुषमा जी के दफ्तर से फोन आया. अच्युतानंद जी ने खबर रोक दी. राम बहादुर राय नहीं माने उन्होंने रोमेश शर्मा की जालसाजी पर फिर खबर लिखी. वह खबर छपी. इस खबर के छपने के बाद रोमेश शर्मा गिरफ्तार हो गए. अच्युतानंद जी के वक्त ही एक दूसरी घटना हुई इस बार खबर रक्षामंत्री मुलायम सिंह यादव के मंत्रालय में गड़बड़ी पर थी. संपादक ने फिर इसे रोक दिया. खबर नहीं छपी. इस बार भी राय साहब बुद्ध बन गए. इन तीनों घटनाओं में प्रभाष परंपरा का संपादकीय विवेक नहीं था. पर राम बहादुर राय तीनों घटनाओं से एकदम निस्पृह रहे. जब भी इन दोनों संपादकों से मिले तो लगा कुछ हुआ ही नहीं. कोई कटुता और विद्वेष नहीं. तीसरे संपादक ने कुछ लोगों के भड़काने पर राय साहब का कॉलम ही बंद कर दिया. पर राय साहब उनसे जब मिले तो दोगुने उत्साह से. उनके व्यवहार से बाद में संपादक जी को भी अपने किए पर ग्लानि हुई.
बोली और व्यवहार में अहिंसक राय साहब वैचारिक प्रतिबद्धताओं के बावजूद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और संघ प्रमुख केसी सुदर्शन के प्रति खड्गहस्त हुए. ‘ऑपरेशन वेस्ट एंड’ रिश्वत कांड के भंडाफोड़ पर राय साहब ने वाजपेयी सरकार पर जमकर प्रहार किया. 3 सितंबर 2000 को अपने कॉलम में वे लिखते हैं- “अटल बिहारी वाजपेयी नैतिक जिम्मेदारी लें और इस्तीफा दे. वाजपेई सरकार इस नए व्याकरण के लिए इतिहास में नफरत से याद की जाएगी.” अपनी इसी बेबाकी के लिए प्रभाष जोशी को राम बहादुर राय पसंद थे. और बाद के संपादकों को नापसंद.
मेरे लिए आज भी यह अबूझ पहेली है कि प्रभाष जोशी से राम बहादुर राय के वैचारिक और निजी रिश्ते इतने गहरे थे. फिर वे जनसत्ता छोड़ नवभारत टाइम्स क्यों चले गए? राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स को जनसत्ता बनाना चाहते थे. इसलिए राय साहब और जनसत्ता के कार्टूनिस्ट काक को ‘नभाटा’ ले गए. प्रभाष जी इससे आहत हुए. उन्होंने राय साहब को वापस लाने के लिए अनेक प्रयास किए. बाद में जब जनसत्ता का चंडीगढ़ संस्करण निकला तो उन्हें संपादक बनने का प्रस्ताव दिया गया. पर राय साहब नहीं गए. 15 अगस्त 1986 को प्रभाष जी ने राम बहादुर राय को एक चिट्ठी लिखी. “नभाटा में आपका वचन पूरा हो गया. अब नया काम करने के लिए घर लौट आइए. यह काम आपको पढ़ने, यात्रा करने और सार्थक खोजबीन की खबरें लिखने की फुर्सत और अवसर देगा. मेरे लिए दस अरुण शौरियों के बजाए एक राम बहादुर राय का घर में स्वागत करना ज्यादा सुखद और स्पूर्तिदायक होगा.” राय साहब नहीं आए. आए तब जब जनसत्ता जैसा माहौल नभाटा में न पा राय साहब खुद घुटन महसूस करने लगे. और 1991 में जनसत्ता वापस लौटे.
राय साहब अपनी प्रशंसा सुनते नहीं हैं. दूसरों की निंदा करने की उनकी आदत नहीं है. वे कुछ पाकर कभी आह्लादित नहीं होते. बल्कि संकुचित हो जाते हैं. पदमश्री और पद्मभूषण सम्मान के प्रति उनका व्यवहार इसे साबित करता है. दोनों बार वह ये सम्मान लेने राष्ट्रपति भवन नहीं गए. गृह मंत्रालय के अफसरों ने एक बार उनके घर जाकर और दूसरी दफा उनके दफ्तर पहुंच इस नागरिक सम्मान से उन्हें नवाजा. सम्मानों के प्रति उनकी याद निस्पृहता उन्हें प्रतिरोध का पत्रकार बनती है.
किसी संदर्भ में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था. “जो व्यक्ति परिवार से सटेगा, वह समाज से कटेगा. और जो समाज से सटेगा, वह परिवार से कटेगा” राय साहब ने लोहिया की यह बात गांठ बांध ली. उन्होंने अपने लंबे सामाजिक जीवन में कभी परिवार की कोई परवाह नहीं की. उनके बेटे क्या करते हैं? किसी को पता नहीं. सक्रिय राजनीति के बाद जब उन्होंने पत्रकारिता का रास्ता चुना तो वे लंबे समय तक उत्तर पूर्व में तैनात रहे. वहां से दिल्ली आने तक वह अपने परिवार को साथ नहीं रखते थे. उनकी रोजमर्रा की दिक्कतों को देख बनवारी जी ने एक बार उनसे पूछा, “आप अपने परिवार को दिल्ली क्यों नहीं ले आते.” राय साहब ने संकोचपूर्वक कहा “यह फैसला उनके हाथ में नहीं है. यह परिवार के बड़े लोगों को तय करना है. जब वह कहेंगे तो पत्नी, बच्चों को ले आऊंगा.” बनवारी जी ने कहा, “एक बार बड़ों से पूछ कर देखिए.” राय साहब ने कहा है “यह मैं कैसे पूछ सकता हूं, जब भी ठीक समझेंगे भेज देंगे” यही है उनका संतत्व. उनके जीवन में ऐसे ढेर सारे प्रसंग मिलेंगे जहां पर पारिवारिक अभिलाषा से बहुत दूर दिखाई पड़ते हैं.
सिर्फ परिवार के लिए नहीं राय साहब जीवन में अपने प्रति भी बेहद लापरवाह रहे. उनके दिल की दो धमनियां बंद थी. 2006 में एस्कॉर्ट अस्पताल में पता चला कि उनकी दायीं धमनी सौ फीसद बंद है. बीच की मुख्य आर्टरी 70 प्रतिशत और बायीं 20 प्रतिशत बंद है. जान पर खतरा था. राय साहब अस्पताल से लौट आए. किसी को बताया नहीं. एक डॉ. विमल छाजेड़ के पास गए. जो नेचुरल बाई पास पद्धति से इलाज करते थे. खान-पान और शारीरिक व्यायाम से. उन्हें परेशानी थी. रक्तचाप बेकाबू था. वे दिल की बीमारी को ढोते रहे. किसी से कुछ कहा नहीं. छाजेड़ साहब के जीरो ऑयल और खाने पर नियंत्रण के जरिए बिमारी से लड़ते रहे. मैंने कई बार कहा राय साहब दिल्ली में दिल के कई बड़े डॉक्टर हैं. उनसे परामर्श कर लें. वे टाल जाते. “जी मैं बताऊंगा.” यह कह बात दूसरी और मोड़ देते. मैंने भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. दो साल तक लगा रहा. राय साहब अपने संयम, दृढ़ संकल्प और जड़ी-बूटी से उसका मुकाबला करते रहे. 2019 में एक रोज मामला ज्यादा बिगड़ा. सुबह-सुबह राय साहब का फोन आया. “कुछ मामला गड़बड़ पर लग रहा है. आपकी राय माननी चाहिए. मुझे डॉक्टर के पास चलना चाहिए.” मैंने एम्स में हृदयरोग के प्रोफेसर से बात की. उन्होंने कहा आप फौरन आईए. मैंने राय साहब से कहा, मैं सीधे एम्स पहुंच रहा हूं, आपका कार्डियो फोरेंसिक विभाग में आइए. डॉक्टर से बात हो गई है. मैं नीचे ही मिलूंगा. अस्पताल में जांच हुई. राय साहब की दो धमनियां पूरी तरह बंद थी. स्टंट से काम नहीं चलेगा. बाईपास होगा. मुझे लगा राय साहब शायद सहमत न हों. पर वे मान गए. बाईपास सर्जरी हुई. बीमारी ने उन्हें परास्त करने की कोशिश की. पर उसे राय साहब के दृढ़ संकल्प के सामने हारना पड़ा. मैं सौभाग्यशाली हूं कि इस मामले में राय साहब ने मेरी बात मानी.
राम बहादुर राय को मैं अक्सर साहित्य का वैज्ञानिक कहता हूँ. क्योंकि वैज्ञानिक और लेखक में एक गहरी समानता होती है- दोनों को यथास्थिति से संतोष नहीं होता. वे पूछते हैं- क्या कोई दूसरा रास्ता हो सकता है? क्या किसी बात को समझने का कोई नया तरीका हो सकता है? उनकी पुस्तक ‘रहबरी के सवाल’ और बाद में ‘मंजिल से ज्यादा सफर’ इसी बेचैनी की उपज हैं. जीवनी लिखी जा सकती थी, परंपरागत तरीके से भी लिखी जा सकती थी. लेकिन उन्होंने संवाद को चुना. यह केवल शैली का चुनाव नहीं था. यह एक दार्शनिक चुनाव भी था. क्योंकि संवाद का अर्थ है कि सत्य किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं है. सत्य बातचीत से जन्म लेता है. यह भारतीय सभ्यता का भी मूल विचार है. उपनिषदों में ज्ञान आदेश से नहीं, प्रश्न से पैदा होता है. गीता में भी अर्जुन पहले प्रश्न करता है, तब कृष्ण उत्तर देते हैं. राय साहब ने इस संवाद परंपरा को आधुनिक पत्रकारिता में प्रतिष्ठित किया.
राम बहादुर राय की मान्यता है कि ‘इंटरव्यू’ भारत में संवाद का सनातन माध्यम है, केवल एक पत्रकार की राय नहीं, एक सांस्कृतिक दृष्टि है. ये बात सही भी है. भारत की पूरी धार्मिक और पौराणिक ग्रंथ परंपरा को खँगालिए तो लगभग हर जगह आपको दो या उससे अधिक देवों, ऋषियों या दृष्टाओं का संवाद ही मिलेगा. ख़ुद गीता कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद का प्रकटीकरण है. राय साहब ने इसे समझा भी और अपनाया भी. और शायद इसी कारण उनकी पुस्तकों में व्यक्ति बोलता ही नहीं, खुलता भी है. गुरुवर प्रभाष जोशी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह पर लिखी उनकी किताब की भूमिका में लिखा कि “इस किताब में जो विश्वनाथ प्रताप सिंह निकलकर आते हैं, मैं दावा नहीं कर सकता कि मैं उन्हें जानता था” यह किसी लेखक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है- वह परिचित को भी अपरिचित बना दे.
जनसत्ता में उनका स्तंभ- पड़ताल इसी अर्थ में अद्वितीय था. वह समाचारों की व्याख्या नहीं था. वह समय की आत्मा को पढ़ने का प्रयास था.1998 से 2004 के बीच उन्होंने राजनीति, अर्थशास्त्र, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर जो लिखा, वह आज भी पढ़ा जाए तो उस दौर के इतिहास की एक खिड़की सी खुलती है. समाचार क्षणिक होते हैं. विचार दीर्घजीवी होते हैं. राय साहब हमेशा समाचार के भीतर छिपे विचार की तलाश करते रहे. इसीलिए उनकी रचनाएँ पुरानी नहीं पड़तीं.
उनका जीवन हमें एक और बड़ी सीख देता है. सार्वजनिक जीवन में संबंध होना महत्वपूर्ण है, लेकिन संबंधों से स्वतंत्र रहना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है. जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह, गोविंदाचार्य- देश की राजनीति के अनेक बड़े नाम उनके जीवन में आए. वे उनके निकट भी रहे. लेकिन उनकी निकटता ने उनकी दृष्टि को कभी बंधक नहीं बनाया. पत्रकारिता की असली परीक्षा यही होती है. सत्ता से दूरी बनाकर निष्पक्ष होना अपेक्षाकृत आसान है. सत्ता के निकट रहकर स्वतंत्र बने रहना कठिन है. रामबहादुर राय ने यह कठिन काम किया. शायद इसलिए उनके जीवन को केवल पत्रकारिता की कसौटी पर नहीं परखा जाना चाहिए. उसे नैतिकता की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए. और वहाँ भी वह उतना ही उज्ज्वल दिखाई देता है.
उनकी किताब ‘भारतीय संविधान: अनकही कहानी’ संविधान की सबसे सरल व्याख्या और कहानी है. यह किताब केवल संविधान की कथा नहीं है, बल्कि उस बौद्धिक और नैतिक यात्रा की परिणति है जो दशकों पहले शुरू हुई थी. आपातकाल के दिनों में जब वे बांकीपुर जेल में बंद थे, तब उनके सामने एक प्रश्न खड़ा हुआ—आख़िर वह कौन-सी शक्ति है जो नागरिक को राज्य के सामने खड़ा होने का अधिकार देती है? यह प्रश्न उन्हें संविधान तक ले गया. बाद के वर्षों में वही जिज्ञासा एक गहन अध्ययन में बदल गई और अंततः एक ऐसी पुस्तक के रूप में सामने आई, जिसने संविधान-निर्माण के अनेक कम चर्चित प्रसंगों को नए ढंग से देखने का अवसर दिया.
आज जब सार्वजनिक जीवन में शोर बढ़ता जा रहा है, जब विचारों की जगह तेजाबी प्रतिक्रियाएँ लेती जा रही हैं, जब उछलती-कूदती पत्रकारिता कई बार अपने ही उद्देश्य को भूलती हुई दिखाई देती है, तब रामबहादुर राय जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि पत्रकारिता का अंतिम उद्देश्य सत्ता तक पहुँचना नहीं, सत्य तक पहुँचना है. और सत्य तक पहुँचने का मार्ग ज्ञान से होकर जाता है, लेकिन ज्ञान से भी अधिक चरित्र से होकर जाता है. रामबहादुर राय की सबसे बड़ी पहचान शायद यही है कि उन्होंने अपने समय में केवल लेख नहीं लिखे, केवल संस्थान नहीं बनाए, केवल पत्रकार नहीं गढ़े. उन्होंने स्वतंत्र चेतना का संस्कार दिया. और किसी भी लोकतंत्र में इससे बड़ी विरासत कोई नहीं होती.


राय साहब के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व का यह मूल्यांकन समग्र नहीं है. राय साहब के निर्मम असहयोग के बावजूद हम अपने प्रयास में कामयाब रहे या नहीं, यह पाठक तय करेंगे. पर हम अपने-अपने क्षेत्र के उन मूर्धन्य विद्वानों के प्रति जरूर आभार व्यक्त करेंगे, जिन्होंने राम बहादुर राय के योगदान को पूर्वाग्रह रहित और निष्पक्ष रूप से निरूपित किया. उनके व्यक्तित्व को राजनीति, समाजिक जीवन और पत्रकारिता की कसौटी पर कसा. हम रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी, प्रख्यात नृत्यांगना सोनल मानसिंह, साध्वी ऋतंभरा, सुश्री उमा भारती, महाकवि कुमार विश्वास, भारत सरकार के मंत्री भूपेंद्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान, रविशंकर प्रसाद, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा आदि के आभारी हैं. जिन्होंने अपने व्यस्ततम समय के बावजूद राय साहब पर लिखा.
हम कृतज्ञ हैं नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, विचारक केएन गोविंदाचार्य, राजीव शुक्ला, केसी त्यागी, हृदय नारायण दीक्षित, समाजवादी प्रो. आनंद कुमार, प्रो. दिनेश सिंह, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक, केशव मौर्य और राजेंद्र शुक्ल, हर्षवर्धन, ब्रजेंद्र गुप्ता, रघु ठाकुर, राजीव वोरा के जिन्होंने राय साहब की निष्पक्ष और बेबाक पत्रकारिता का गौरववर्धन किया. राय साहब के समकालीन संपादकों बनवारी जी, हरीश खरे, अच्युतानंद मिश्र, एमजे अकबर, ओम थानवी, पुष्पेश पंत, गुलाब कोठारी, संतोष भारतीय, रेहान फजल, यशवंत व्यास, यशवंत देशमुख ने राय साहब के बहाने पत्रकारिता और राजनीति की जो पड़ताल की वह नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए अनुकरणीय होगी. इमरजेंसी में राय साहब के साथ संघर्षों के साथी में शतरुद्र प्रकाश, सुरेंद्र किशोर, सुधेंद्र पटेल, अशोक भगत, राजनाथ शर्मा, जयशंकर गुप्त ने इमरजेंसी के खिलाफ संघर्ष का लेखा-जोखा न रखा होता तो किताब अधूरी रहती. आभार उन जनसत्ताई साथियों का जिन्होंने जनसत्ता के न्यूज़ रूम की उस अराजक आजादी को याद किया, जिसके केंद्र में राय साहब होते थे.
आभार उन महानुभावों का भी, जिन्होंने लगातार तगादों और आग्रहों के बावजूद नहीं लिखा. शास्त्रीय गायिका कलापिनी कोमकली ने कहा, “राय साहब का व्यक्तित्व इतना सौम्य और संवेदनशील है कि मैं उनके लिए गा दूंगी पर लिख नहीं पाऊंगी” संपादक राहुल देव मुझे लगातार आज-कल कहकर टहलाते रहे. पर लिखा नहीं. एक बार तो कहा कि “लिखने की कोशिश की पर जितना लिखा कंप्यूटर ने उड़ा दिया.” उन्होंने यह मुझसे कहा. पर मेरे सहयोगी संपादकों से कहा, “जो मैं लिखूंगा आपको अच्छा नहीं लगेगा इसलिए नहीं लिखूंगा.” लंबे समय तक राय साहब के साथ काम करने वाले प्रवाल मैत्र ने कहा, “वैसे तो मैं राम बहादुर जी पर किताब लिख सकता हूं. पर लेख नहीं लिखूंगा.” राय साहब की कृपा से जनसत्ता में लगातार तलवार भांजते एक हाहाकारी रिपोर्टर ने कहा, “मैं जो लिखूंगा आप छाप नहीं पाओगे.” इन सबका भी धन्यवाद. मेरी समझ को एक नई दृष्टि देने के लिए.
किताब की सज्जा और कवर के लिए चित्रकार माधव जोशी के प्रति कृतज्ञता. लेखकों के रेखाकंन के लिए मनीष खत्री को साधुवाद. किताब की संकल्पना और संपादन में वरिष्ठ पत्रकार पाणिनि आनंद के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं. किताब में मेरे सहयोगी संपादक भाई मनोज मिश्र, संजीव कुमार और संदीप जोशी का आभार. उनके संपादन और मार्गदर्शन के लिए. राय साहब की इस किताब से संबंध होना ही मेरे लिए सम्मान की बात है.
और आख़िर में धन्यवाद राय साहब का. आपके होने से बहुत कुछ हुआ है. आपके होने से आगे भी बहुत कुछ होगा. पीढ़ियों तक चलेगा यह सिलसिला. लाइट हाउस बहुत दूर तक, देर तक लोगों को रास्ता दिखाता रहेगा. यह पुस्तक बस एक झरोखा है. आपका प्रभामंडल और कर्मयोग इससे कहीं विशद है. आप शतायु हों, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ. जय जय.


