शीतल पी सिंह-
घबरा गए हैं मोदीजी… हर 68 सेकंड में सोशल मीडिया पोस्ट्स पर एक रोक लगाने का निर्देश।
द इंडियन एक्सप्रेस ने मार्च से जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के आधार पर बताया कि इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर सामग्री रोकने के लिए सरकार से जुड़े लगभग 1.95 लाख निर्देश जारी किए गए। इनमें से करीब एक लाख निर्देश केवल इंस्टाग्राम को भेजे गए। इन पांच महीनों में परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर छात्रों के विरोध प्रदर्शन भी हुए। अखबार से एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि इन विरोध प्रदर्शनों के बढ़ने के दौरान इन निर्देशों का “काफी बड़ा हिस्सा” जारी किया गया।
यहां एक बात साफ समझना जरूरी है: 1.95 लाख निर्देशों की संख्या है। यह हटाई गई पोस्टों की पक्की संख्या नहीं है और न ही इससे यह साबित होता है कि हर निशाना बनाई गई पोस्ट सरकार की आलोचना कर रही थी। कुछ सामग्री सचमुच कानून के खिलाफ हो सकती है। लेकिन इसी वजह से इन निर्देशों की सार्वजनिक जांच और भी जरूरी हो जाती है। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मेटा ने अपने सिस्टम को सरकार के सहयोग पोर्टल से जोड़ दिया था। इससे चिन्हित सामग्री कंपनी की अलग से मानवीय जांच के बिना अपने-आप हटाई जा सकती थी। अखबार की रिपोर्ट प्रकाशित होने तक मेटा, गूगल और संबंधित मंत्रालयों ने उसके सवालों का जवाब नहीं दिया था।
ऐसी घटनाएं दूसरे ऐसे देशों में भी देखने को मिली हैं जहां लोकतंत्र सिर्फ़ नाम के लिए है । 2025 में इस्तांबुल के मेयर एकरेम इमामोग्लू की गिरफ्तारी के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान तुर्की के अधिकारियों ने प्लेटफॉर्मों को विरोध से जुड़ी सामग्री रोकने का आदेश दिया और सोशल मीडिया की पहुंच धीमी कर दी। पाकिस्तान में ऑनलाइन राजनीतिक भाषण पर बड़ी कार्रवाई के बीच फरवरी 2024 से मई 2025 तक एक्स पर रोक लगी रही। बांग्लादेश की पिछली सरकार ने 2024 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया पर पाबंदियां लगाईं। संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि लगभग पूरी तरह इंटरनेट बंद किए जाने से सूचना का प्रवाह गंभीर रूप से प्रभावित हुआ। ये सभी देश और कदम अलग-अलग हैं, लेकिन खतरा एक जैसा है: जब जनता का विरोध बढ़ता है, तो सत्ता में बैठे लोग लोगों तक जानकारी पहुंचने और उस पर चर्चा होने की जगह को सीमित करने की कोशिश कर सकते हैं।
इस संदर्भ में यूरोपीय संघ का तरीका भी ध्यान देने लायक है। वहां प्लेटफॉर्मों को प्रभावित उपयोगकर्ताओं को बताना पड़ता है कि उनकी सामग्री पर रोक क्यों लगाई गई। उन्हें इस फैसले की जानकारी एक सार्वजनिक पारदर्शिता डेटाबेस में भी देनी होती है। इस व्यवस्था में भी कमियां हैं, लेकिन इसकी शुरुआत एक लोकतांत्रिक सिद्धांत से होती है: लोगों को यह जानने और चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए कि उन्हें चुप कराने वाला फैसला क्यों लिया गया।
भारत को अब केवल स्पष्टीकरण नहीं, सार्वजनिक जवाबदेही की व्यवस्था चाहिए। किस अधिकारी या संस्था ने कौन-सा निर्देश जारी किया, किस कानूनी आधार पर जारी किया, किस सामग्री को निशाना बनाया गया और कितने आदेशों पर स्वतंत्र समीक्षा हुई—इन सबका पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। हर प्रभावित व्यक्ति को कारण बताने, फैसले को चुनौती देने और समयबद्ध अपील का अधिकार मिलना चाहिए। बिना मानवीय समीक्षा, लिखित कारण और स्वतंत्र निगरानी के स्वचालित रोक लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं, प्रशासनिक अंधेरा पैदा करती है।
सरकार को यह तय करने का अधिकार हो सकता है कि कानून-विरोधी सामग्री पर कार्रवाई कैसे की जाए, लेकिन उसे यह अधिकार नहीं हो सकता कि वह बिना कारण बताए सार्वजनिक बहस को चुप करा दे। पारदर्शिता कोई औपचारिकता नहीं, सत्ता के इस्तेमाल की पहली शर्त है; जवाबदेही कोई बाधा नहीं, लोकतंत्र की सुरक्षा है। नागरिकों का सूचना पाने, असहमति जताने और शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार किसी पोर्टल या बंद कमरे में जारी आदेश से खत्म नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में सवालों को हटाया नहीं जाता—उनका जवाब दिया जाता है।


