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‘अस्सी के रामबहादुर’ का विमोचन और ‘मोदी मार्ग’ की चापलूसी!

An elderly man speaks at a podium next to a large poster showing his portrait on a book cover.

रामानंद राय-

‘अस्सी के रामबहादुर’ का विमोचन और ‘मोदी मार्ग’ की चापलूसी!

दिल्ली में पिछले सप्ताह ‘अस्सी के रामबहादुर’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम में एक खास वैचारिक समूह की मौजूदगी चर्चा का विषय रही। पुस्तक का संपादन हेमंत शर्मा ने किया है और रामबहादुर राय स्वयं उसी वैचारिक धारा के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं।

लेकिन कार्यक्रम में जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है, वह है….गांधी के समानांतर मोदी को खड़ा करने की कोशिश।

जिस देश में ‘गांधी मार्ग’ एक नैतिक और लोकतांत्रिक विचार का प्रतीक माना जाता है, उसी के समानांतर ‘मोदी मार्ग’ का जुमला उछालना क्या महज शब्दों का प्रयोग है?

या फिर यह उस राजनीतिक सत्ता के सामने अपनी जगह बनाने की कोशिश है, जिसके प्रति अत्यधिक प्रशंसा दिखाना आजकल सार्वजनिक जीवन में एक अलग ही योग्यता बन चुका है?

रामबहादुर राय का सार्वजनिक जीवन भी सवालों से अछूता नहीं रहा है। इतिहास में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जहां सत्ता और प्रभावशाली लोगों के साथ उनके संबंधों तथा कुछ खास राजनीतिक-सामाजिक शक्तियों के समर्थन को लेकर बहस होती रही है। जनता की आवाज और सत्ता के गलियारों की आवाज,इन दोनों में से उन्होंने किसे अधिक महत्व दिया, इसका फैसला इतिहास के पास सुरक्षित है।

और फिर आता है राजघाट स्थित सर्व सेवा संघ परिसर का प्रसंग।

करीब 8 एकड़ में फैले उस परिसर में लगभग 50 आवासों के अलावा गांधी विद्या संस्थान, पुस्तकालय, प्रकाशन और संग्रहालय जैसी संस्थाएं थीं। परिसर को लेकर हुए विवाद और उसके ध्वस्तीकरण की कार्रवाई ने गांधीवादी संस्थाओं और सार्वजनिक जीवन में गंभीर सवाल खड़े किए। इस पूरे प्रकरण में रामबहादुर राय की भूमिका और जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

विडंबना देखिए….एक तरफ गांधी के नाम और मार्ग की विरासत, दूसरी तरफ उसी गांधीवादी संस्थागत विरासत के उजड़ने का विवाद।

और अब उसी मंच से ‘गांधी मार्ग’ के सामने ‘मोदी मार्ग’ खड़ा करने की कोशिश! इतिहास बड़ा निर्मम होता है।

वह न पद देखता है, न प्रतिष्ठा, न सत्ता के करीब होने का तमगा। आज कोई चाहे जितनी प्रशंसा बटोर ले, कल इतिहास पूछेगा,आप सत्ता के साथ खड़े थे या उस समाज के साथ, जिसकी आवाज सत्ता तक पहुंचनी चाहिए थी?

रामबहादुर राय को इतिहास किस रूप में याद करेगा,गांधी के रास्ते के सहयात्री के रूप में,‘मोदी मार्ग’ के प्रवक्ता के रूप में, या सत्ता के गलियारों में अपनी जगह तलाशते एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने समय के साथ अपनी भूमिका बदली?

इसका फैसला आज नहीं, समय करेगा।

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