यशवंत सिंह-
अपने प्रिय पत्रकार और लेखक राजीव नयन बहुगुणा जी की किताब “काजल कोठा” अब बाज़ार में आ गई है। विमोचन समारोह में शिरकत करने आज दोपहर साढ़े बारह बजे नोएडा से चला और ठीक चार बजे देहरादून में कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने वाला पहला नागरिक बना।
रात में थानो के फारेस्ट गेस्ट में किताब का दुबारा विमोचन आचमन के साथ किया गया। राजीव भाई ने इसकी एक प्रति मुझे इस धमकी के साथ भेंट की है कि इसको बिकवाना है ताकि प्रकाशन की लागत वसूल हो जाए।
वैसे राजीव भाई ने आज समारोह स्थल पर बिकी किताब से ही एक चौथाई लागत वसूल लिया है। मुझे उम्मीद है बाजार में सजे “काजल कोठा” पर पहुँचने वाले ग्राहक निराश नहीं होंगे और पूर्ण संतुष्टि हासिल करेंगे। किताब अभी ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है।
काजल कोठा की बिक्री केवल हाथोंहाथ की जा रही है। राजीव भाई के ह्वाट्सऐप नंबर +91 9456502861 पर अपना एड्रेस भेजिए और उनसे दाम पूछिये कितना कहाँ कैसे पेमेंट करना है। मेरा रिकमेंडेशन है, राजीव भाई को पढ़ना सिर्फ पढ़ना ही नहीं होता बल्कि कहन का तरीका और रहन का सलीका जीना होता है। आप डूब जाते हैं। हंसते हैं। सोचते हैं। आह वाह करते हैं।
आख़िर में आपको लेखक से मोहब्बत हो ही जाता है।

नरेंद्र सजवान-
मैं तो उस दिन से हिरासां हूं कि, जब हुक्म मिले,
खुश्क फूलों को किताबों में न रखे कोई,,!!
दिन 29 सितंबर 2026 देहरादून का IRTDA ईसी रोड़ सभागार, प्रख्यात साहित्यकार विधा सागर नौटियाल स्मृति सम्मान और लोकार्पण राजीव नयन बहुगुणा के “काजल कोठे” का,,
मूर्धन्य साहित्यकार समाजसेवी बंधुओं की उपस्थिति और साहित्य की बात, मैं इस विरासत का अदना सा रसिक कोने की सीट पर बैठा बड़े मन से बड़े लोगों की बात सुनता रहा,, लगा साहित्य अभी जिंदा तो है लेकिन अहम पाले हुए है,,
नामचीन शख्सियतों का जमावड़ा हो तो हनक पाले बहुत से लोग भी मिल जाते हैं, अधिकतर लोगों से फेसबुक वॉल से ही अच्छा संबंध है, जब व्यक्तिगत मिलते हैं तो मेरी पहचान का अभाव रहता है और ये अच्छा भी है कि लोग आपको जानते तो हैं लेकिन पहचानते नहीं,, और इस अस्पृश्यता का सबसे बड़ा लाभ ये है कि आप वो ध्यान पूर्वक सुन पाते हैं जिसे आप सुनने आए हैं,,
खैर मैं भाई राजीव नयन बहुगुणा जी के fb वाल पर आमंत्रित था वे मेरे प्रिय लेखक हैं, उनके लेखन में तरूणाई बची है इसीलिए उन्हें भाई संबोधित किया वरना वो पिता की आस पास की उम्र के ही होंगे,,
हमारे हिंदी साहित्य की मेरी नजर में कमी ये है कि हम पाठक वर्ग के लिहाज से रचना नहीं लिखते, कई घोर साहित्यकर्मी तो इतनी क्लिष्ट भाषा का उपयोग करते हैं कि पाठक उनके व्याकरणीय ज्ञान को देख कर ही भाग जाता है,,
भाषा उस संप्रेषण का माध्यम होनी चाहिए जो आसानी से एक आम व्यक्ति की समझ में आ जाए,, मुंशी प्रेम चन्द आज तक भी इसलिए प्रासंगिक बने हुए हैं कि उन्हें पढ़ते हुए आज भी बैलों की घंटियां, टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियां, टाट पट्टी के बिछौने महसूस होते हैं,,
मैंने राजीव जी को कई वर्षो से फॉलो किया है और उनका शब्द लावण्य और संयोजन इतना अच्छा है कि उसे AI कॉपी नहीं कर सकता, क्यूंकि मौलिक चिंतन और लेखन को दुनिया की कोई भी टेक्नोलॉजी कॉपी नहीं कर सकती,,
चैट जीपीटी से कई भारी भरकम शब्दावली वाले प्रकांड विद्वान आज फेसबुक पर बहुतायत में मिल जाएंगे, और जब आप उन्हें पढ़ेंगे यदि सुधी पाठक हैं तो वाक्य विन्यास आपको बता देगा कि ये महानुभाव मोमो चाउमीन वाले हैं,,
खैर भाई राजीव जी को इस पुस्तक के लिए अहेतुक शुभकामनाएं, अभी घर लाया हूं पढ़ी नहीं, चूंकि ये समय मेरा संध्या आचमन का है और इसे में कई वर्षों से कर रहा हूँ, पर चोरी की हुई ककड़ी को खाने सा कौतुक मन में छुपाए किताब टेबल पर रखी है,, प्रणाम
Note — राजीव भाई भी मुझे नहीं पहचानते,, जानते होंगे,!!

संजीव कांडवाल-
अपने हिस्से की काजल..
अपने हिस्से की कालिख..
विद्यासागर नौटियाल स्मृति सम्मान समारोह – 2026 में आज पत्रकार श्री Rajeev nayan Bahuguna की पुस्तक ‘काजल कोठा’ का लोकार्पण हुआ। पुस्तक समीक्षा नहीं कर रहा हूं, यह काम सुधिपाठकों को ही करना चाहिए। यहां श्री बहुगुणा के संबोधन की कुछ बातें रख रहा हूं, जैसा उन्होंने कहा कि –
अखबारी लेखन यानि निकृष्ट लेखन
श्री बहुगुणा ने अखबारी लेखन को, लेखन कार्य का सबसे निकृष्ट स्वरूप करार दिया है। उन्होंने अपनी किताब को भी तकरीबन इसी श्रेणी में रखते हुए कहा कि वो पुस्तक नहीं भी लिखते तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, बहरहाल अब लिख ही दी है।।
टीवी पत्रकारिता और भाषा विहीन शिशु
श्री बहुगुणा ने पत्रकारिता में भाषा के दिनों दिन होते क्षरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भाषा क्षरण के कारण ही, टीवी पत्रकार विषय वस्तु के बजाय अपनी भाव भंगिमा, चीखने चिल्लाने पर जोर देने लगे हैं। ये ऐसा ही है, जैसे कोई भाषा विहीन शिशु अपनी बात पहुंचाने के लिए रोने चिल्लाने का जतन करता है।
जेन जी की छिछोर क्रांति
उन्होंने जेन जी आंदोलन की व्याख्या करते हुए कहा कि इस पीढी ने अपने छिछोरपन वाले तेवर से भी अपने हिस्से का विरोध दर्ज करने का काम किया है। उन्होंने खुद के लेखन को इसी श्रेणी में रखा है (चार दिन पहले मैने अड्डा कान्क्लेव में पधारे श्री राजीव नयन बहुगुणा का परिचय चिर जेन जी तेवर वाले पत्रकार के रूप में किया था।) ‘काजल कोठा’ इस शैली की पहली अधिकारिक कृति के रूप में दर्ज की जानी चाहिए।
शुभकामनाओं के साथ—




