त्रिभुवन-
हमारे प्रिय मित्र, अग्रज और प्रखरतम पत्रकार साथी राजेश जोशी ने रामबहादुर राय पर संस्मरण नहीं लिखा है; उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के एक विचित्र नैतिक द्वंद्व की बड़ी ही ग़ज़ब की शव-परीक्षा की है। वे पत्रकारिता के शिक्षक भी हैं और इतने नायाब ढंग से पढ़ाते हैं कि जिनकी कक्षा न हो, वे भी विद्यार्थी अचंभित होकर उन्हें सुनते हैं। वे हमारे साथ हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में थे। लेकिन अभागे प्रबंधन को यह पसंद नहीं आया कि उन्हें विद्यार्थियों के हित में निरंतर शिक्षण का मौक़ा दिया जाए। प्रख्यात पत्रकार रामबहादुर राय के बारे में उनकी एक फेसबुक पोस्ट नीचे है। उसे आपको अवश्य पढ़ना चाहिए।
जोशी किसी पुराने सहकर्मी को खलनायक बनाकर प्रस्तुत नहीं करते। उलटे वे उन रामबहादुर राय को पूरी गरिमा के साथ हमारे सामने खड़ा करते हैं, जो संघ प्रमुख से तीखा सवाल पूछ सकता था, जैन हवाला डायरी में लालकृष्ण आडवाणी का नाम होने पर भी ख़बर नहीं रोकता था और वाजपेयी सरकार को यह सुनाने का साहस रखता था कि किसी मंत्री को पत्रकारिता का पाठ पढ़ाने का अधिकार नहीं है।
इसीलिए लेख का 2015 वाला दृश्य इतना विस्फोटक हो उठता है। जोशी के अनुसार वही व्यक्ति पत्रकारों को अपनी “औक़ात” और “दायरा” समझने तथा नरेंद्र मोदी को अपना काम करने देने की नसीहत देता दिखाई देता है।
और फिर लेख के आख़िर में जोशी लिखते हैं, “सत्ताधीश हमें हमारे वही पुराने रामबहादुर लौटा दें।”
यहीं राजेश जोशी अद्भुत हैं और शायद यहीं उनसे असहमति भी शुरू होती है।
सत्ताधीश किसी मनुष्य को वापस कैसे लौटा सकते हैं? क्या उसे उन्होंने छीन लिया था? या वह स्वयं उस सत्ता के इतना निकट चला गया कि अपनी पुरानी दूरी खो बैठा? उसके भीतर संतन और सीकरी की वर्जित नज़दीकियों और पवित्र दूरियों का जो सम्यक् बोध था, वह एक ख़ास शासन शैली में नदारद कैसे हो गया?
इसलिए यह लेख बहुत सम्मानित पत्रकार रामबहादुर राय से अधिक पत्रकारिता का आईना है।
वह पूछता है: सत्ता बदलते ही यदि पत्रकार के प्रश्नों का व्याकरण बदल जाए तो हमें उसके पुराने साहस को किस तरह पढ़ना, देखना और समझना चाहिए?
रामबहादुर राय जैसे कोटि के पत्रकार को समझने का सबसे असुविधाजनक तरीका यही है कि हम यह मानने से इनकार कर दें कि कोई एक पुराना रामबहादुर राय था और कोई दूसरा नया रामबहादुर राय पैदा हो गया। संभव है कि रामबहादुर राय तब भी वही थे और आज भी वही हैं; फ़र्क़ केवल इतना है कि तब उनके विश्वासों की सत्ता पूरी तरह सत्तासीन नहीं थी।
राजेश जोशी के लेख से एक कठोर व्याख्या निकलती है। राय ने कांग्रेस-प्रधान सत्ता-व्यवस्था और बाद में वाजपेयी सरकार तक के दौर में असाधारण पत्रकारिता की। जैन हवाला प्रकरण में उन्होंने वैचारिक निकटता की परवाह किए बिना नाम प्रकाशित किए। वाजपेयी सरकार के दौर में उन्होंने व्यक्ति-केंद्रित राजनीति, चाटुकारिता और रीढ़ झुकाने वाली राजनीतिक संस्कृति की तीखी आलोचना की।
लेकिन यहीं प्रश्न पैदा होता है: क्या वह शुद्ध एंटी-एस्टेब्लिशमेंट पत्रकारिता थी या उस प्रतिष्ठान के विरुद्ध पत्रकारिता थी, जिसे वे वैचारिक रूप से अपना प्रतिष्ठान नहीं मानते थे?
यह फ़र्क़ मामूली नहीं है।
पत्रकार की असली परीक्षा तब नहीं होती जब वह उस सत्ता से लड़ता है, जिससे उसकी वैचारिक असहमति पहले से है। परीक्षा तब होती है जब उसके अपने सपनों की सरकार सत्ता में हो, उसके वैचारिक संसार के लोग निर्णायक पदों पर हों और फिर भी उसकी कलम उतनी ही निर्दयता से प्रश्न पूछे। यह संभावना सच के करीब है कि संघ भाजपा में जिन्हें पसंद नहीं करते था, वे जब-जब सत्ता में आए तो संघनिष्ठ पत्रकारों ने उनकी ख़बरें करने में संकोच नहीं किया। ऐसा दलित और महिला नेताओं के साथ भी रहा है। संघनिष्ठ पत्रकारों ने जितना भाजपा की महिला नेताओं या दलित नेताओं को निशाने पर लिया, उतना सवर्ण, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और इतर कुलीनों को नहीं।
इसी कसौटी पर राजेश जोशी उद्धृत “औक़ात में रहने” वाला प्रसंग इतना गंभीर हो जाता है। यदि यह उद्धरण प्रसंग और आशय में ठीक दर्ज हुआ है तो इसे केवल व्यक्तिगत बदलाव कहना शायद पर्याप्त नहीं। इसे एक पुराने भारतीय मीडिया-रोग के उदाहरण की तरह भी पढ़ा जा सकता है: हमारे यहाँ कई बार पत्रकार सत्ता-विरोधी नहीं होते; वे केवल उस सत्ता के विरोधी होते हैं, जो उनकी अपनी नहीं होती।
सरकार बदलती है और अचानक वही निर्भीकता संयम बन जाती है, वही संदेह विश्वास में बदल जाता है, वही प्रश्न “नकारात्मकता” कहलाने लगता है और कभी सत्ता से दूरी बनाकर अर्जित की गई पत्रकारिता की प्रतिष्ठा सत्ता के निकट खड़े होने की वैधता देने लगती है।
इसलिए “सत्ताधीश पुराने रामबहादुर राय लौटा दें” वाक्य बहुत सुंदर है; लेकिन वास्तविक सवाल उससे अधिक कठोर है: कहीं पुराने रामबहादुर राय खोए ही नहीं हैं? कहीं वे आज भी वहीं हैं। बस अब उस सत्ता के सामने खड़े हैं, जिसके लिए वे कभी रात दिन काम करते थे और उसके अस्तित्व में आने का स्वप्न देखते थे। प्रश्न यह नहीं कि रामबहादुर राय बदल क्यों गए; प्रश्न यह है कि सत्ता बदलने के बाद उनकी पत्रकारिता की कसौटी क्यों बदलती दिखाई देती है। इसलिए हर सत्ता प्रतिष्ठान के अपने अपने रामबहादुर राय होते ही हैं। कोई सत्ताप्रतिष्ठान उन्हें न तो तब तक रोक सकता, जब तक वे स्वयं न चाहें और न ही कोई सत्ताप्रतिष्ठान उन्हें भेज सकता, जब तक वे स्वयं न जाना चाहें।
सांख्य दर्शन में सैकड़ों साल से दर्ज है : गुणयोगाद्बंध:शुकवत! (लोग अपनी चारित्रिक विशिष्टताओं के कारण अंतत: उस पिंजरे में चले ही जाते हैं, जिसे वे पसंद करते हैं, जैसे कि शुक पिंजरे में प्रफुल्ल रहता है!)
राम बहादुर राय अगर पत्रकारिता से संन्यास भी ले लेते और वे सत्ताधीशों से नहीं जुड़ते तो कदाचित् उनकी छवि आज नभस्पर्शी होती। लेकिन उन्होंने जो राह ली, उससे अच्छे पत्रकारों को सदैव ही बचना चाहिए। पत्रकारों को भी कुंभनदास की यही बात गांठ बांधनी चाहिए :
संतन को कहा सीकरी सों काम॥
आवत जात पन्हैयाँ टूटीं, बिसरि गयौ हरि-नाम॥
जाकौ मुख देखैं दु:ख लागै, ताको करिबे परी सलाम।
‘कुंभनदास’ लाल गिरधर बिन और सब बेकाम॥
मूल पीस…


