नितिन ठाकुर-
कांग्रेसियों के अलग दुख हैं। ये नंबर दो होने की लड़ाई में खपे जा रहे हैं। पहले केजरीवाल से डरते थे कि मुख्य विपक्षी होने की कोई लड़ाई अगर कहीं चल रही है तो वो ना जीत लें। फिर बीच में कभी ममता और कभी अखिलेश के प्रति संशय रहा। अब सीजेपी के आंदोलन को लेकर कंफ्यूज़्ड हैं कि हाथ लगाएं या रहने दें।
इतनी पुरानी पार्टी, इतने धाकड़ नेता, इतना विपुल अनुभव.. कोई रास्ता निकालना है तो आप निकालो। अभी भी वही दरबारी मानसिकता है कि अगला चलकर आएगा तो समर्थन देंगे। नैतिक और रणनीतिक किस हिसाब से ये लोग लाइन लेते हैं किसी को पता नहीं। फिलहाल मोना जी का स्वागत कर रहे हैं। आज कांग्रेस एक अखिल भारतीय आंदोलन खड़ा कर पाने में अक्षम है। यदि कोई यूथ की नब्ज़ समझकर कुछ कर पा रहा है तो उसमें खोट निकाल रहे हैं। आप तो कभी बारह साल में सरकार को उसके सही गलत पर पीछे धकेल ना सके। किसानों ने कानून वापस कराए और सीजेपी की कच्ची लीडरशिप ने इस्तीफा तक करा दिया। ऐसे में मोर्चेबंदी करने के बजाय उत्साही बच्चों को ही घेर रहे हैं।
चौबीस दल साथ लेकर वाजपेयी ने गढ़ गिराया था। कुछ तो सीखिए। इनसिक्योरिटी से बाहर निकल कर देखिए। अंगद के पांव की तरह जमी सरकार के खिलाफ अगर कहीं कोई सही मुद्दे पर लड़ रहा है तो मैनुवरिंग तेज़ कीजिए। फैसला लीजिए कि आपको करना क्या है वरना फिर क्यों ना माना जाए कि आपके बारे में सही कहा जाता है कि आप मान बैठे हैं जनता इनसे अघाकर आपको खुद बैठा देगी!
कांग्रेसियों ने इसका अच्छा बहाना बना रखा है कि अन्ना आंदोलन की तरह ये आंदोलन भी यूज़ हो जाएगा। अगर अन्ना आंदोलन का फायदा उठाकर मोदी जी आ गए तो तुम सीजेपी वाले का फायदा उठाकर सत्ता में आ जाओ। पॉलिटिक्स तो फायदा उठाने का ही खेल है। संघर्ष गांधी ने किया लेकिन सत्ता में नेहरू जी का परिवार आया। संघर्ष जेपी ने किया लेकिन सत्ता में पुराने कांग्रेसी मोरारजी आए। संघर्ष जनता पार्टी ने किया लेकिन फायदा संघ ले गया। संघर्ष उक्रांद ने किया सत्ता किसे किसे मिली। पूरी उम्र शिबू सोरेन लड़े फिर आंदोलन का फायदा किसे किसे मिलता गया। अन्ना का संघर्ष था आनंद केजरीवाल-मोदी जी ले गए। अब सीजेपी के कंधे पर बैठकर यदि रणनीतिक कुशलता हो तो लाभ कांग्रेस ले ले, मगर बार बार अन्ना आंदोलन का नाम लेकर खुद को भोला बच्चा ना बताए।
कांग्रेस और बीजेपी का कोई ठेका थोड़े है देश पर शासन करने का! कांग्रेस को अगली सरकार तो बनानी है लेकिन कहीं कोई आंदोलन हो तो जिसके दम से हो रहा है उससे खुद को “बड़ा भाई” भी मनवाना है। मनवालें फिर। दंभ में तो कोई ऐसा चाह सकता है, रणनीति में तो नहीं। आंदोलन हाईजैक हो जाएँगे, इस डर से लोकतंत्र की प्राणवायु कहे जाने वाले आंदोलन खत्म हो जाने चाहिए? सत्तारूढ़ या वेटिंग पार्टी क्यों विकल्प बनने देगी किसी को? कहीं देखा है ऐसा?

कोई आंदोलन संपूर्ण रूप से सफल नहीं हुआ इसका मतलब ये नहीं कि वो संपूर्ण रूप से असफल भी हुआ। दिल्ली में केजरीवाल विकल्प ही बने थे, किसी को अच्छे लगें या बुरे। हर आंदोलन से सरकार बदलेगी कोई ज़रूरी नहीं। किसानों ने कानून वापस कराए, छात्रों ने शिक्षा मंत्री हो हटवाया। इनका फायदा बीजेपी को मिल गया क्या?
कांग्रेसियों को दुख है कि कांग्रेस को फायदा नहीं मिल सका। वो ये नहीं देख पा रहे कि पब्लिक बाई डिफॉल्ट उनको सत्ता देने के मूड में नहीं है। इन फैक्ट नई पीढ़ी अभी राहुल से उतना आकर्षित नहीं है, कल हो जाए बात अलग है। फिलहाल नए लोग जिनके पीछे हैं उनसे लड़ने के बजाय कोई और तरीका खोजा जाए संवाद का। इतनी बात समझने के बजाय हमारे कांग्रेसी मित्र अन्ना, केजरीवाल से होते हुए आंदोलनों के ही खिलाफ बोलने लगते हैं। अद्भुत समझ है। वैसे, खुद कांग्रेसी जानते हैं कि राहुल अपने मन का नहीं करवा पाते अपनी पार्टी में। बस गनीमत है कि कोई वाचाल इसे अब तक लोकतंत्र के लक्षण नहीं बता दे रहा।
रंगनाथ सिंह-
राहुल गांधी यूपी चुनाव में किसे हराना चाहते हैं? विद्वानों की बात अलग है मगर मुझे समझ नहीं आ रहा है कि राहुल गांधी के निशाने पर अखिलेश यादव हैं या सीएम योगी आदित्यनाथ? ज्यादातर विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिमी यूपी में भाजपा मजबूत है और पूर्वी में सपा। पूरबी अजय राय को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाकर राहुल गांधी पश्चिम में कौन से झण्डे गाड़ने वाले हैं, यह चुनाव के बाद ही पता चल पाएगा।
जब राहुल गांधी ने राजेंद्र गौतम को यूपी का प्रभारी बनाया तब लोगों ने माना कि वह जाटव वोटरों को टारगेट कर रहे हैं। मगर राजेंद्र गौतम साधारण नेता नहीं हैं, वह आम्बेडकरवादी नेता हैं। वह तब विवाद में आए थे जब वह दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों को डॉ. आम्बेडकर की 22 प्रतिज्ञाएँ दिलवा रहे थे। उन प्रतिज्ञा का ‘मैं राम को नहीं मानूँगा, कृष्ण को नहीं मानूँगा’ वाला हिस्सा वायरल हुआ था। उस वीडियो के बाद अरविंद केजरीवाल ने गौतम से किनारा कर लिया और बाद में राहुल गांधी ने उनमें यूपी का प्रभारी नेता देख लिया।
काफी पहले मैंने लिखा था कि कांग्रेस की असली मुश्किल भाजपा नहीं है बल्कि क्षेत्रीय दल हैं। जब तक कांग्रेस सपा-राजद-तृणमूल-राकपा के वोट नहीं हासिल करेगी तब तक वह भाजपा के आगे कृशकाय नजर आएगी। सैद्धान्तिक रूप से यह बात सही है मगर व्यावहारिक रूप से इसे अमली जामा पहनाने का मतलब ये होगा कि कांग्रेस को कुछ चुनाव अपने सहयोगी दलों को हराने के लिए लड़ने होंगे! ताकि वे दल बार-बार हारकर मैदान से बाहर हों और भाजपा-विरोधी जनता की पहली पसन्द कांग्रेस बन सके। क्या यूपी में कांग्रेस इसकी शुरुआत कर रही है?
इमरान मसूद हों या कोई और, उनके किसी पद पर होने का कोई खास मतलब नहीं है क्योंकि उनका समुदाय आज भी उसे ही वोट देगा जो उस सीट पर भाजपा को चुनौती देता दिखेगा। एक्सप्रेस ने खबर की थी कि माई अध्यक्ष का दाँव राजेन्द्र गौतम ने सुझाया था। कांग्रेस ने सीधा रिस्क लेने के बजाय मसूद को कार्यकारी के रूप में बागडोर सौंपी और उसके ऊपर ब्राह्मण की खोल चढ़ा दी। किसी भी विभाग में कार्यकारी का मतलब है जो असल कामकाज देखेगा।
अगर कांग्रेस मसूद की भूमिका को लेकर गम्भीर है तो उनका काम यही बचता है कि वह सपा के प्रभाव वाली सीटों पर माई वोट कांग्रेस की तरफ ले आएँ। भाजपा के पास थोड़े-मोड़े शिया वोट होंगे जो वैसे भी मसूद के कहने पर दायें-बायें नहीं होंगे। हालाँकि भाजपा भी शिया को आगे बढ़ाने के बजाय पूर्वांचल में जुलाहों पर दाँव खेलने का प्रयास कर रही है। पता नहीं दानिश अंसारी अपनी सीट पर 100 माई वोट भाजपा को दिला पाएँगे या नहीं! पता नहीं।
शायद ही कोई ऐसा सोचता होगा कि जाटव वोट मायावती और चंद्रशेखर को छोड़कर कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो जाएगा। यानी कांग्रेस पहले चरण में माई वोटों को कांग्रेस की तरफ लाने में जोर लगाएगी। यूपी में मुख्य विपक्षी दल बनने के बाद आम्बेडकरवादी जाटवों को पार्टी से जोड़ने का रास्ता खुल सकता है मगर जब तक सपा मजबूत है, यह होने से रहा।
राजेन्द्र गौतम ने 150 सीटों की माँग करके सीटों की बोली खोली है। सपा-कांग्रेस के पिछले गठबंधन में कांग्रेस को करीब 105 सीटें मिली थीं। आज ही अखिलेश यादव ने कहा है कि ‘सीट से ज्यादा जरूरी है जीत।’ यानी सीट को लेकर भी कांग्रेस अखिलेश यादव की बाँह मरोड़ने की कोशिश करेगी। मुझे नहीं लगता है कि अखिलेश यादव झुकेंगे मगर कांग्रेस की मंशा सन्देह जरूर पैदा कर रही है कि राहुल गांधी इस बार यूपी में किसके खिलाफ लड़ने जा रहे हैं!


