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बीस हजार में 85 दिन, छह स्लॉट : उत्तराखंड में सरकार की पालिसी से पोर्टल वाले दुखी!

Hindi document page with a table of project details. Columns include serial number, subject, channel/film type, duration and cost, total amount Rs 20,400.00, and remarks; several rows reference government film/video postings.
Hindi document page describing standard advertising banner sizes: a table lists pixel dimensions (728×90 Top, 300×250 Top, 300×600 Middle, 970×250 Middle) and durations (5–30 seconds, 30 seconds–2 minutes), followed by a six-point set of instructions about ad policies and website usage.

देहरादून। सूचना एवं लोक संपर्क विभाग ने श्रेणी-क के न्यूज पोर्टलों को साफ संदेश दे दिया है। राज्य सरकार की उपलब्धियाँ और योजनाएँ दिखानी हैं तो दिखाइए, पैसे की उम्मीद मत रखिए। 30 सितंबर 2026 के पत्रांक 447/सू.एवं.लो.सं.वि.(सोशल मीडिया)-42/2015 में 5 अक्टूबर से 28 दिसंबर 2026 तक, पूरे 85 दिन, का आदेश है। छह जगह विज्ञापन चलेगा। दो टॉप बैनर, 728×90 और 300×250। दो मिडिल बैनर, 300×600 और 970×250। और दो वीडियो ऐड, दोनों 30 सेकंड से दो मिनट के। हर स्लॉट की प्रो-राटा दर 3,400 रुपये। जोड़ 20,400 रुपये। ऊपर से 18 प्रतिशत जीएसटी अलग। शब्द भी विभाग ने खुद चुन लिए: रुपये बीस हजार चार सौ मात्र। जीएसटी मिलाकर बिल करीब 24 हजार का। यानी छह स्लॉट, चौबीसों घंटे, 85 दिन, और रोजाना करीब 240 रुपये। एक स्लॉट पड़े तो रोज चालीस रुपये।

यह कोई काट-छाँट नहीं। विभाग की ही दर-तालिका कहती है कि श्रेणी-क में एल-1 के आधार पर हर बैनर और हर वीडियो की मासिक दर 1,200 रुपये है। 85 दिन का हिसाब 1,200 गुणा 85 बटा 30, यानी ठीक 3,400। महीने से कम चलो या ज्यादा, वही दर दिन के हिसाब से कटेगी। मोबाइल पर 320×50 का बैनर भी लगाना है, उसके पैसे अलग से कोई नहीं देगा।

शर्तें रकम से भारी हैं। तय जगह पर 24×7 बैनर या वीडियो रखना है, और उसी स्लॉट पर किसी और ऐड सर्वर से विज्ञापन लेने की इजाजत नहीं। भुगतान गूगल एनालिटिक्स की विजिटर रिपोर्ट पर टिका है। श्रेणी के मानक पूरे न हों तो रकम काट ली जाएगी। रिपोर्ट में गड़बड़ी निकली तो भुगतान ही नहीं। प्रसारण से पहले पोर्टल को अपने विजिटर अंक पूरे करने हैं। बीजक तीन प्रतियों में, 10 रुपये के स्टांप पेपर पर नोटरीकृत शपथ पत्र और स्क्रीनशॉट के साथ 30 दिन के अंदर। बजट आया तब पैसा। विवाद हुआ तो अदालत देहरादून की। सूची एक साल या नवीनीकरण तक। सरकारी कर दर के बाहर।

अगस्त में ही यह दर सड़क पर आ चुकी थी। सोशल मीडिया और वेबसाइट विज्ञापन नियमावली-2015 पोर्टल को मासिक यूनिक विजिटर पर बाँटती है। 3,000 से 9,999 सी श्रेणी, 10,000 से 19,999 बी, 20,000 या ज्यादा ए। दर उसी श्रेणी की सबसे सस्ती निविदा से तय होती है। 1,200 रुपये प्रतिमाह पर सवाल तब भी यही था: साल भर रोज विज्ञापन मिले तब भी एक पोर्टल के खाते में 14,400 रुपये। अब कागज पर वही दर 85 दिन के आदेश में उतर आई है।

प्रिंट वाला खेल अलग है। स्वतंत्रता दिवस 2026 पर विभाग ने सूचीबद्ध दैनिकों में 1,716 वर्ग सेमी का विज्ञापन एक बार छपवाया। मार्च में सरकार के चार वर्ष पर भी दैनिकों को उतना ही आकार मिला। केंद्र की संशोधित दर पर एक लाख प्रतियों वाले अखबार का श्वेत-श्याम रेट 59.68 रुपये प्रति वर्ग सेमी है। रंगीन और लोकल रेट इससे ऊपर चलते हैं। एक मध्यम रंगीन अभियान की एक प्रविष्टि, छोटे पोर्टल के पूरे 85 दिन के पैकेज से बड़ी हो जाती है।

सर्वर, डोमेन, रिपोर्टर, एनालिटिक्स, और 85 दिन तक छह स्लॉट खाली रखकर सरकारी क्रिएटिव चलाना। इसके बदले बीस हजार। विभाग कहेगा एल-1 और विजिटर-लिंक्ड भुगतान। पोर्टल पूछ रहे हैं कि जब अखबार को एक अंक में लाखों मिल सकते हैं, तो डिजिटल की निचली श्रेणी को तीन महीने में बीस हजार क्यों। जवाब फिलहाल आदेश में नहीं है। आदेश में सिर्फ रकम है।

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