सत्येंद्र तोमर-
बात कोई 2002-03 की रही होगी। उन दिनों मैं मुरैना में दैनिक जागरण के ब्यूरो कार्यालय में बतौर रिपोर्टर काम करता था। एक दिन दफ्तर में कामकाज के बीच कंधे पर कैमरा बैग टांगे एक युवक ने प्रवेश किया। पहली ही नजर में उनकी शख्सियत में एक खांटी पत्रकार की झलक दिखाई देती थी। हमारे लिए वे बिल्कुल अजनबी थे। हम कुछ पूछ पाते, उससे पहले ही उन्होंने सहजता से अपना परिचय दिया— “मेरा नाम महेश शिवहरे है। मुझे यहां ई-टीवी के लिए रिपोर्टिंग करने भेजा गया है।”

यह महेश भाई साहब से हमारी पहली मुलाकात थी, लेकिन उनके व्यवहार में न कोई औपचारिकता थी, न अपरिचय का कोई संकोच। वे इस तरह मिले, मानो वर्षों पुराना कोई रिश्ता हो। पहले ही दिन उन्होंने जिस आत्मीयता से अपनापन दिया, वह धीरे-धीरे एक ऐसे रिश्ते में बदल गया, जिसमें हमपेशा होने से कहीं अधिक बड़े भाई का स्नेह था।
उन दिनों मुरैना में किसी भी न्यूज चैनल का अपना कार्यालय नहीं हुआ करता था। लिहाजा, महेश भाई साहब रोज ग्वालियर से ट्रेन में अप-डाउन करते और मुरैना स्टेशन पर उतरते ही सीधे हमारे कार्यालय चले आते। वहीं बैठकर खबरों की योजना बनती, घटनाओं की पड़ताल होती और फिर शुरू होता फील्ड रिपोर्टिंग का सिलसिला। रिपोर्टिंग के बाद भी उनका ठिकाना हमारा वही दफ्तर होता। देखते-देखते वह कार्यालय उनके लिए भी अपने घर जैसा हो गया था।
जब भी थोड़ा वक्त मिलता, भाई साहब अपना लंच बॉक्स खोल लेते। लेकिन ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि उन्होंने अकेले बैठकर टिफिन खत्म किया हो। उनके खाने में भी अपनापन बंटता था। भोजन की चंद रोटियों के साथ वे रिश्तों की मिठास भी बांटते थे। कुछ लोग अपनी मौजूदगी भर से किसी जगह को घर बना देते हैं। महेश भाई साहब उन्हीं लोगों में से एक थे।
वे महज पेशे से पत्रकार नहीं थे, बल्कि उनकी आत्मा में पत्रकारिता बसती थी। उनकी देहभाषा, उनकी सक्रियता और हर घटना को देखने का नजरिया बताता था कि उनका मन चौबीसों घंटे खबरों में ही रमता है। खबरों की तलाश, तथ्यों की तह तक पहुंचने की जिज्ञासा और अपने काम के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता विरले ही देखने को मिलती है। उनका मिजाज फक्कड़ था और पत्रकारिता के प्रति जुनून ऐसा कि एक बार पोस्टमार्टम हाउस पर कवरेज के दौरान ही वे लंच करने बैठ गए। उनके लिए खबर केवल काम नहीं, एक धुन थी; एक ऐसा जुनून, जिसके आगे समय, सुविधा और औपचारिकताएं बेमानी हो जाती थीं।
उनके साथ बिताए वे दिन हमारे लिए पत्रकारिता की पाठशाला के दिन थे। उनसे बहुत कुछ सीखा—खबरों को देखने का नजरिया, तथ्यों के पीछे छिपी कहानी तलाशने का हुनर और सबसे बढ़कर, पत्रकारिता के प्रति ईमानदार बने रहने का सलीका।
करीब एक दशक तक मुरैना में सक्रिय रहने के बाद वे ग्वालियर लौट गए। भौगोलिक दूरी जरूर बढ़ी, लेकिन हमारे बीच का आत्मीय रिश्ता कभी दूर नहीं हुआ। बातचीत होती रही, मुलाकातें होती रहीं। मुरैना से उनका लगाव और हम सबके प्रति उनका स्नेह उन्हें अक्सर इस शहर की ओर खींच लाता था। वे जब भी आते, लगता ही नहीं था कि बीच में कोई अंतराल रहा है। वही अपनापन, वही सहजता, वही बड़े भाई वाला स्नेह!
फिर कुछ महीने पहले उनके कैंसर से पीड़ित होने की खबर मिली। मन बेचैन हो उठा। भीतर कहीं उम्मीद थी कि बेहतर इलाज होगा, बीमारी पराजित होगी और महेश भाई साहब फिर उसी पुरानी ऊर्जा के साथ खबरों पर काम करते नजर आएंगे।
लेकिन नियति ने हमारी उम्मीदों को तोड़ दिया, महेश भाई साहब चले गए! उनकी हंसी, उनका सहज व्यवहार, उनका फक्कड़ अंदाज, खबरों के लिए उनकी बेचैनी और वह बेपनाह अपनापन—सब कुछ अब यादों की धरोहर बनकर रह गया है।
अखबार के ऑफिस में न सही, यादों के पुराने दफ्तर में आप हमेशा मिलते रहेंगे, भाई साहब! भावभीनी विदाई, महेश भाई साहब! विनम्र श्रद्धांजलि।


