अजय कुमार-
लखनऊ। वृंदावन के चर्चित संत प्रेमानंद महाराज को लेकर चल रहे विवाद ने अब डिजिटल पत्रकारिता की सीमाओं और सोशल मीडिया पर सवाल उठाने के तौर-तरीकों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विवाद के केंद्र में जाने-माने पत्रकार और यूट्यूबर शुभांकर मिश्रा का वह वीडियो है, जिसमें उन्होंने प्रेमानंद महाराज के आश्रम से जुड़े घटनाक्रम पर सवाल उठाते हुए इसे “आश्रम 2.0” की संज्ञा दी। इसके बाद सोशल मीडिया पर शुभांकर मिश्रा को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं और बड़ी संख्या में यूजर्स ने उनके वीडियो पर आपत्ति जताई।
विवाद बढ़ने के बाद शुभांकर मिश्रा ने सफाई भी दी। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कहा कि प्रेमानंद महाराज उनके लिए पूजनीय और सम्माननीय हैं, लेकिन उनके आसपास घट रही घटनाओं पर सवाल उठाना अलग विषय है। यानी मिश्रा ने अपने सवालों को संत के प्रति व्यक्तिगत असम्मान से अलग रखने की कोशिश की।
मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा। प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी की मौत और आश्रम की व्यवस्थाओं से जुड़े सवालों को लेकर सोशल मीडिया पर पहले से ही तरह-तरह की चर्चाएं चल रही थीं। ऐसे माहौल में शुभांकर मिश्रा का वीडियो सामने आया तो विवाद और तेज हो गया। समर्थकों की ओर से जहां मिश्रा पर संत की छवि को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया गया, वहीं उनके समर्थक सवाल उठा रहे हैं कि किसी प्रभावशाली आध्यात्मिक संस्थान की व्यवस्था पर सवाल उठाना पत्रकारिता के दायरे से बाहर कैसे हो सकता है।
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम प्रश्न है– क्या किसी संत, संस्था या प्रभावशाली व्यक्ति से असहज सवाल पूछना अपने आप में गलत है, या सवाल पूछने के लिए इस्तेमाल की गई भाषा और प्रस्तुति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?
शुभांकर मिश्रा के मामले में आलोचना का बड़ा केंद्र उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया “आश्रम 2.0” वाला संदर्भ है। आलोचकों का कहना है कि किसी वास्तविक घटना की जांच-पड़ताल और उससे जुड़े सवालों को चर्चित विवादास्पद वेब सीरीज के संदर्भ में पेश करना पूरे मामले को सनसनीखेज बना देता है। दूसरी ओर, मिश्रा का तर्क यह है कि पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है और किसी व्यक्ति की लोकप्रियता उसे सवालों से ऊपर नहीं कर देती।
दिलचस्प यह भी है कि प्रेमानंद महाराज को लेकर शुभांकर मिश्रा का नाम इससे पहले भी चर्चाओं में आ चुका है। 2025 में उनके पॉडकास्ट में जगद्गुरु रामभद्राचार्य की प्रेमानंद महाराज को लेकर की गई टिप्पणी के बाद भी विवाद खड़ा हुआ था। बाद में संत समाज के दूसरे प्रमुख लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं।
ऐसे में मौजूदा विवाद को केवल “एक यूट्यूबर बनाम एक संत” के रूप में देखना शायद पूरे मामले को छोटा कर देना होगा। असली सवाल डिजिटल दौर की उस पत्रकारिता का है, जहां एक वीडियो लाखों लोगों तक कुछ ही घंटों में पहुंच सकता है और उसकी हेडलाइन, थंबनेल तथा शब्द चयन स्वयं एक बड़ा नैरेटिव तैयार कर सकते हैं।
सवाल पूछने की आजादी बनाम सनसनी की सीमा
डिजिटल मीडिया ने पत्रकारिता को लोकतांत्रिक बनाया है। अब किसी बड़े मीडिया संस्थान की नौकरी या टीवी स्टूडियो की जरूरत नहीं। एक मोबाइल कैमरा, इंटरनेट कनेक्शन और सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए कोई भी व्यक्ति लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है।
लेकिन इस आजादी के साथ जवाबदेही का सवाल भी जुड़ा है।
खासकर तब, जब मामला करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था से जुड़ा हो। किसी संत या धार्मिक संस्था के बारे में गंभीर सवाल उठाए जाएं तो उन सवालों के पीछे तथ्य, दस्तावेज, प्रत्यक्ष प्रमाण और संबंधित पक्ष का जवाब होना जरूरी हो जाता है। सवाल जितना बड़ा हो, प्रमाण की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है।
यही वह जगह है जहां “कंगारू कोर्ट” वाली प्रवृत्ति भी खतरनाक हो जाती है। सोशल मीडिया पर किसी घटना का वीडियो सामने आया नहीं कि उसके आधार पर आरोपी तय, दोषी तय और फैसला भी तय। न पुलिस की जांच का इंतजार, न न्यायिक निष्कर्ष का। दूसरी तरफ, किसी लोकप्रिय व्यक्ति के खिलाफ आरोप सामने आते ही उसके समर्थक भी सोशल मीडिया पर विरोधी पक्ष को कठघरे में खड़ा करने लगते हैं।
इस तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म एक ऐसे सार्वजनिक न्यायालय में बदल जाता है जहां फैसला तथ्यों और कानून से ज्यादा वायरलिटी, ट्रेंड और भीड़ की प्रतिक्रिया से प्रभावित होने लगता है।
पुतला फूंके जाने का दावा
प्रेमानंद विवाद के संदर्भ में सोशल मीडिया पर शुभांकर मिश्रा के खिलाफ बेहद तीखी प्रतिक्रियाएं दिखाई दे रही हैं। शुभांकर मिश्रा का पुतला फूंका गया।
शुभांकर मिश्रा पत्रकारिता से लंबे समय से जुड़े रहे हैं और अब उनका डिजिटल प्लेटफॉर्म करोड़ों दर्शकों तक पहुंचता है। ऐसे में उनके सवालों की पहुंच सामान्य सोशल मीडिया पोस्ट से कहीं ज्यादा है। यही कारण है कि उनसे तथ्य और भाषा दोनों के स्तर पर ज्यादा जिम्मेदारी की अपेक्षा भी की जाती है।
सवाल पूछना पत्रकारिता का मूल अधिकार है। लेकिन सवाल को इस तरह पेश करना कि वह पहले से ही किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ फैसला सुनाता हुआ दिखाई दे, पत्रकारिता और डिजिटल सनसनी के बीच की रेखा को धुंधला कर सकता है।
दूसरी तरफ प्रेमानंद महाराज के समर्थकों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि लोकप्रियता या आध्यात्मिक प्रतिष्ठा आलोचना से ऊपर होने का प्रमाण नहीं है। किसी भी सार्वजनिक संस्था, आश्रम या प्रभावशाली व्यक्ति से सवाल पूछे जा सकते हैं और पूछे जाने चाहिए। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि सवाल तथ्य आधारित हैं या नहीं और उनका जवाब देने का अवसर संबंधित पक्ष को दिया गया या नहीं।
प्रेमानंद विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक संत और एक डिजिटल पत्रकार के बीच का विवाद नहीं रह गया है। यह उस नए मीडिया दौर की तस्वीर है जहां एक तरफ सवाल पूछने की अभूतपूर्व आजादी है और दूसरी तरफ सवाल को सनसनी में बदल देने की अभूतपूर्व ताकत भी।
अब जरूरत इस बात की है कि न तो पत्रकारिता सवाल पूछना छोड़े और न ही सोशल मीडिया की भीड़ अदालत बन जाए।
सवाल भी हों, प्रमाण भी हों और जवाबदेही भी, यही डिजिटल पत्रकारिता की असली परीक्षा है।

