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आशा है कल दैनिक भास्कर अपनी इस हेडिंग के लिए एक क्षमापत्र भी छापेगा!

Facebook post showing a Hindi newspaper front page: a woman hugging a baby with a large headline about a food-related incident affecting 13 children.

निराला बिदेसिया–

यह क्या शीर्षक है? पहले पन्ने का लीड शीर्षक तो कई निगाहों से गुजरता है। पहले पेज के इंचार्ज की नजर से, समाचार संपादक की नजर से, फिर स्थानीय संपादक की नजर से।

अगर सर्वसम्मति से दैनिक भास्कर ने यह शीर्षक लगाया है, तब तो कोई बात ही नहीं। और अगर ऐसा गलती से हो गया, मन में और कोई आशय हो तो अपनी भावना बतानी चाहिए। अखबार भूल सुधार जल्दी छापते नहीं जबकि पत्रकारिता में अखबारों की विश्वसनीयता और साख की एक बड़ी वजह भूल सुधार छापना और क्षमा मांगना भी था।

आशा है कल दैनिक भास्कर यह करेगा। एक क्षमापत्र भी छापेगा। चलन यह भी रहा कि जिस जगह पर यानी जितनी प्रमुखता से अखबार ने गलत चीजें छापी, वहीं और उसी जगह पर क्षमा पत्र भी छपे। चलन रहा था, यह कोई विधान नहीं। लेकिन सब कुछ विधान से नहीं चलता।


ये बौद्धिक दिवालियापन की हद है। इस अखबार के साथ मैंने भी दस सालों तक काम किया है। ये असंवेदनशीलता है। संपादक की बुद्धि-विवेक पर भी सवाल है। ‘भोज’ और ‘भोग’ शब्द की तुकबंदी के चक्कर में सत्यानाश कर दिया। पूरे ‘गैंग’ ने मिलकर बिहार के एक शानदार और ताकतवर अखबार को धीरे-धीरे बर्बाद कर दिया। कमजोर लोगों के हाथ जब संपादकीय की कमान होती है तो यही होता है।
मासूम बच्चे गंगा माता के भोग हैं? शर्म करो।
-राजेश रंजन


आज बिहार में हुई त्रासदी की खबर में लगे हैडिंग का हमें खेद है। इसके लिए मैं माफ़ी चाहता हूँ। भविष्य में विशेष ध्यान रखा जाएगा।

मूल खबर…

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