निराला बिदेसिया-
Vijay Pathak भइया प्रभात खबर से सेवानिवृत्त हो गये. अभी सेवानिवृत्ति के समारोह का सिलसिला चल रहा है. झारखंड के गुमला से स्ट्रिंगर/कंट्रीब्यूटर के तौर पर पत्रकारिता में कैरियर की शुरुआत कर के उसी अखबार में पहले रांची एडिटर और फिर बाद में स्टेट एडिटर तक का सफर. करीब चार दशकों तक एक ही अखबार का सफर. बिना उकताये, बिना धैर्य खोये, वर्षों तक एक ही जैसा रूटिन. सुबह दस बजे अखबार के दफ्तर पहुंचना, रात दो बजे के बाद घर लौटना. बीच में सुनहरे मौके मिले.
जब हिंदुस्तान अखबार रांची पहुंचा, तो इनके साथ काम करने वाले अनेक साथी गये. विजय भइया के पास मौका सबसे पहले चलकर आया था. द्वंद्व और दुविधा की स्थिति थी. अपने बाबूजी से इन्होंने दुविधा को साझा किया. अखबारी दुनिया से दूर+दूर तक किसी किस्म का रिश्ता-वास्ता नहीं रखने वाले पिता ने कहा, जिस अखबार ने गुमला से रांची लाया, उसी अखबार को ऐसा बनाना चाहिए कि वह भी आगे सबको बेहतर अवसर, बेहतर सुविधा, बेहतर वेतन देने की स्थिति में आये. संघर्ष से क्यों डर रहे हो?
पिता की इस सलाह के बाद फिर कोई दुविधा न रही. उसके बाद से अब तक इसी अखबार के होकर रह गये. बीच में प्रस्ताव आते रहे. जाहिर सी बात है कि रांची में जब भी कोई बड़ा राष्ट्रीय अखबार पहुंचा, उसका हमेशा से पहला टारगेट रहा, प्रभात खबर से टीम को लेना. प्रभात खबर में काम करते हुए विजय भइया को करीब से काम करते हुए देखा. हर शाम तरह-तरह के दर्जनों लोग पहुंचते. किसी की शिकायत रहती कि उनके प्रेस रिलीज को महत्व नहीं मिलता है, किसी की ख्वाहिश रहती कि उन्हें भी स्पेस मिले. सबको उतने ही प्रेम से समय देते. अपने बैठने के स्थान पर सामने बिठाकर.
मेरा अलग किस्म का अनुभव रहा. यादगार. बीएचयू के दिनों से ही पनक्कड़ी की आदत थी. बिन पान खाये काम नहीं कर पाता था. लेकिन मुंह में पान रखे रहने से ना तो किसी से बातचीत में दिक्कत होती थी, न ऑफिस में कहीं पिच पिच मारते रहता था. पान ऐसे नहीं खाता था जैसे हमलोग बिहार या झारखंड में खाते हैं कि पान खाये और तुरंत पीक फेंकना शुरू. बनारस में पान खाने का अपना एक रियाज है. अपनी एक विधि है. पान को खाने के बाद पहला पीक सिर्फ निकाल दिये, उसके बाद वह मुंह में घूलते रहता है. आहिस्ते-आहिस्ते. इस विधि को बीएचयू में हमारे शिक्षक डे बाबू, जो विभाग में क्लर्क भी थे और शिक्षक भी, ने सिखाया था. वे पान खाकर ही पढ़ाते थे और हम पान खाकर ही क्लास करते थे.
वहां से निकलकर दैनिक जागरण में आया तो संत शरण अवस्थी सर जैसे संपादक भी मिले, जो खुद ही बड़े पनक्कड़ थे. उनसे पान को लेकर समझौता हो गया. अवस्थी सर हमसे ही कहते कि पान लेते आना. तब, रांची की हर दिशा में मौजूद पान दुकानों में उधार खाता चलता था. अवस्थी सर से कहा कि आपका भी पान लेते आयें, शर्त यह कि अगर दस लायेंगे तो कम से कम चार मेरा. उन्होंने डन कर दिया था, तो दैनिक जागरण में भी दफ्तर में पान खाकर ही काम करता. प्रभात खबर पहुंचा, तो हरिवंश सर के सामने भी मुंह लाल रहता. वे खुद बनारस के पढ़े हुए हैं, तो उन्हें इससे असुविधा नहीं होती. हां, उनके सामने मुंह में पान दबाये नहीं जाता था. पर, विजय भइया ने रोजाना हमारे टेबल के दराज को देखना शुरू किया. पान मसाला, पान आदि रखा रहता तो वे निकालकर डस्टबिन में फेंक देते. कभी कभी उन्हें हमारे मित्र Zeb Akhtar भाई का सुरती भी उसी में मिलता. वे फेंक भर देते, कुछ कहते नहीं कभी. सिर्फ इतना कहते कि ई ठीक चीज नहीं है निराला बाबू.
पान की जबर्दस्त आदत थी पर कभी इस प्रक्रिया में विजय भइया पर गुस्सा नहीं आया. ना कभी झल्लाहट हुई. उनका ऐसा करने अच्छा लगने लगा. मन में यह लगता कि अभिभावकत्व का भाव लिये कम से कम रोक-टोक तो रहे हैं.
असर यह हुआ कि विजय भइया की वजह से प्रभात खबर में पान छूटता चला गया. और छुटा तो कभी फिर वह सिलसिला शुरू नहीं हो सका. वैसे ही जैसे विजय भइया के ही सौजन्य से निर्मल बाबा का कृपा रस बरसाने वाला कारोबार बंद हुआ, तो कभी चढ़ नहीं सका. विजय भइया बतौर संपादक, अपने साथियों से रिपोर्ट करवाने, साथियों को उसका क्रेडिट देने, रिपोर्टरों को आगे रखकर उनकी विश्वसनीयता और ब्रांड वैल्यू को आगे करने में विश्वास रखते. पर, गुमला से आने के बाद, संपादक बनने के बाद एक दफा उन्होंने खुद ही रिपोर्टिंग की. निर्मला बाबा के कृपारस कारोबारी दुनिया पर. तब निर्मल बाबा पीक पर थे. समोसा खाने की सलाह दे के, काला पर्स रखने की सलाह दे के… कृपा बरसाने का उनका कारोबार उस स्थिति में पहुंच गया था, जिसके बाद उन्हें बस कृपा रस प्रोडक्ट की शुरुआत कर के अपना ब्रांड स्थापित करना. उसी दौर में विजय भइया ने निर्मल बाबा पर सीरीज में रिपोर्ट लिखना शुरू किया और निर्मल बाबा जो गिरे, उसके बाद अब तक उठ नहीं सके.
विजय भइया से समय-समय पर बात मुलाकात होती है. रांची जाने पर भी या फिर वे दिल्ली आते हैं, तो भी. रांची के सबसे लोकप्रिय संपादकों में वे रहे हैं. वजह, हर किसी से दोस्ताना संपर्क रखना. हर किसी की मदद करना. सिर्फ प्रभात खबर के पत्रकारों के लिए नहीं बल्कि किसी संस्थान के पत्रकार को कभी सहयोग की जरूरत पड़ी, विजय भइया साथ में रहते हैं. विजय भइया से अपना संपर्क और संबंध तब बना था, जब मैं दैनिक जागरण में काम करता था. रात दो से तीन बजे के बीच रांची में दैनिक जागरण से हम दो लोग यानी मैं और Om Ranjan Malviya भइया, हिंदुस्तान से Anand Kumar भाई और Brijendra Dubey जी मेन रोड में बिरजू की चाय दुकान पर चाय पीने पहुंचते थे. लगभग हर रात.
सुबह चार बजे तक वहीं बैठकी होती. उस बैठकी में अखबार से निकलने के बाद कभी कभी विजय भइया भी पहुंचते. उन्हीं दिनों परिचय हुआ. फिर तबसे अब तक एक समान रिश्ता. घर आने जाने का रिश्ता रहा, फोन पर बतकही, सामने बैठकर बतकही. पर, इतने दिनों में वह अवसर नहीं आया कि मन भर के बैठकी हो सके. पिछले दिनों दिल्ली आये तो थोड़ा जम के बातचीत हुई लेकिन वह भी घंटे भर की बैठकी. कामना है कि उनके इस लंबे अनुभव का लाभ झारखंड की पत्रकारिता को मिले. वे नयी पारी शुरू करें. पर, उससे ज्यादा कामना है कि कुछ दिन ब्रेक लेकर चार दशकों तक निरंतर काम करने की थकान को मिटा लें. खूब बतकही आदि कर लें. उसके बाद नयी पारी शुरू करें.
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